भगवान का मंगलकारी नाम दुःखियों का दुःख मिटा सकता है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार/ पंकज कौशिक। वस्तु, पदार्थ और प्राप्त संग्रह की नश्वरता-क्षणभंगुरता और उनसे प्राप्त होने वाले सुख-दुःख का अनुभव जगत की अनित्यता और अस्थिरता का परिचय देते हैं। अतः अखण्ड-आनन्द; स्थायी प्रसन्नता, भगवद-भजन एवं अविनाशी स्वरूप के बोध में है…! स्थायी प्रसन्नता ही सभी लक्ष्यों का परम लक्ष्य है और यह चेतनता की वह अवस्था है, जो आपके भीतर पहले से विद्यमान है।

भगवन्नाम अनंत माधुर्य, ऐश्वर्य और सुख की खान है। नाम और नामी में अभिन्नता होती है। नाम-जप करने से जापक में नामी के स्वभाव का प्रत्यारोपण होने लगता है और जापक के दुर्गुण, दोष, दुराचार मिटकर दैवी संपत्ति के गुणों का आधान (स्थापना) और नामी के लिए उत्कट प्रेम-लालसा का विकास होता है। भगवन्नाम, इष्टदेव के नाम व गुरुनाम के जप और कीर्तन से अनुपम पुण्य प्राप्त होता है। संत “तुकारामजी” कहते हैं – नाम लेने से कण्ठ आर्द्र और शीतल होता है। इन्द्रियाँ अपना व्यापार भूल जाती हैं। यह मधुर सुंदर नाम अमृत को भी मात करता है। इसने मेरे चित्त पर अधिकार कर लिया है। प्रेमरस से प्रसन्नता और पुष्टि मिलती है। “गुरुनानक देव” जी कहते हैं कि हरिनाम का आहलाद अलौकिक है। भगवन्नाम ऐसा है कि इससे क्षणमात्र में त्रिविध ताप नष्ट हो जाते हैं। हरि-कीर्तन में प्रेम-ही-प्रेम भरा है। इससे दुष्ट बुद्धि सब नष्ट हो जाती हैं और हरि-कीर्तन में समाधि लग जाती है। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं – नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ…। तथा, नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारू सुजन मन माहीं …। बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू …।

पूज्य “आचार्यश्री” ने कहा – यदि परम ज्ञान अर्थात्, आत्मज्ञान की इच्छा है और आत्मज्ञान से परम पद पाने की इच्छा है तो खूब यत्नपूर्वक श्रीहरि के नाम संकीर्तन करें। सत्ययुग में भगवान श्रीविष्णु के ध्यान से, त्रेता में यज्ञ से और द्वापर में भगवान की पूजा से जो फल मिलता था, वह सब कलियुग में भगवान के नाम-कीर्तन मात्र से ही प्राप्त हो जाता है। भगवन्नाम जप से संसार मे कुछ भी दुर्लभ नहीं। भगवान का मंगलकारी नाम दुःखियों का दुःख मिटा सकता है, रोगियों के रोग मिटा सकता है, पापियों के पाप हर लेता है, अभक्त को भक्त बना सकता है आदि। श्रीभगवन्नाम संकीर्तन की महिमा अनन्त है। नारदजी पिछले जन्म में विद्याहीन, जातिहीन, बलहीन दासीपुत्र थे। साधुसंग और श्रीभगवन्नाम-जप के प्रभाव से वे आगे चलकर देवर्षि नारद बन गये। साधुसंग और भगवन्नाम-जप के प्रभाव से ही कीड़े में से मैत्रेय ऋषि बन गये। परंतु भगवन्नाम की इतनी ही महिमा नहीं है। जीव से ब्रह्म बन जाय इतनी भी नहीं, भगवन्नाम व मंत्रजाप की महिमा तो अनन्त है। सत्वशुद्धिकरं नाम, नाम ज्ञानप्रदं स्मृतम्। मुमुक्षाणां मुक्तिप्रदं कामिनां सर्वकामदम्…। सचमुच, श्रीहरि का नाम मनुष्यों की शुद्धि करने वाला, ज्ञान प्रदान करने वाला, मुमुक्षुओं को मुक्ति देने वाला और इच्छुकों की सर्व मनोकामना पूर्ण करने वाला है। जीव और ब्रह्म का मिलन ही भगवन्नाम जप व संकीर्तन के माध्यम से संभव है। श्रीभगवन्नाम संकीर्तन में जो विलक्षण रस है वह ज्ञान में नहीं होता। ज्ञान में तो अखंड आनंद होता है, जबकि प्रेम में अनंत-आनंद होता है…।

पूज्य “आचार्यश्री” ने कहा – श्रद्धा बहुत ऊँची चीज है। विश्वास और श्रद्धा का मूल्यांकन करना संभव ही नहीं है। जैसे अप्रिय शब्दों से अशांति और दुःख पैदा होता है, ऐसे ही श्रद्धा और विश्वास से अशांति शांति में बदल जाती है, निराशा आशा में बदल जाती है, क्रोध क्षमा में बदल जाता है, मोह-ममता समता में बदल जाता है, लोभ संतोष में बदल जाता और काम राम में बदल जाता है। श्रद्धा के बल से शरीर का तनाव शांत हो जाता है, मन संदेह रहित हो जाता है, बुद्धि में दुगनी-तिगुनी योग्यता आ जाती है और अज्ञान की परतें हट जाती हैं। पूज्य “आचार्यश्री” ने कहा – स्थायी सुख की कुंजी है – अपनी अंतर्रात्मा के अपरिवर्तनीय सारतत्त्व के साथ तादात्म्य स्थापित करना। उसके बाद आप सुख की तलाश नहीं करते, क्योंकि यह आपके भीतर ही है। अन्तःकरण में विवेक और सन्तोष से ही स्थायी सुख-शांति और प्रसन्नता मिलती है। एक बार अहंकार का नाश हो जाने पर कोई भी चीज़ आपको स्थायी प्रसन्नता पाने से नहीं रोक सकती। जब आपका जीवन आपके भीतरी आनंद की अभिव्यक्ति बन जाता है, तब आप स्वयं को इस ब्रह्यांड की रचनात्मक ऊर्जा के साथ एकाकार अनुभव करते हैं और एक बार यह क्रम बन जाए, तो आपको यह आभास होने लगता है कि आप वह सब कुछ पा सकते हैं, जो आप पाना चाहते हैं …।