ईश्वर को मानो और ईश्वर की भी मानो- सुधांशु जी महाराज

नई दिल्ली/ नेहा मिश्रा। श्रीमद्भगवद गीता के चार पात्रों में से श्रीकृष्ण के बाद सबसे महत्वपूर्ण पात्र अर्जुन बड़ा शंकालु है। वह भगवान श्रीकृष्ण का अतीव जिज्ञासु शिष्य है और उन्हें सर्वाधिक प्रिय है। अर्जुन ने भगवान से एक और प्रश्न किया कि मेरे मन में यह शंका जागी है कि हे कृष्ण! मैं आपको अपने सम्मुख प्रत्यक्ष देख रहा हूँ। आप तो अभी हैं, लेकिन आपने कह दिया कि ये ज्ञान मैंने पहले भी दिया था। तब आपने बहुत पहले ये ज्ञान कैसे दिया?

अर्जुन की जिज्ञासा को शान्त करते हुए भगवान उत्तर देते हैं-’’ बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।’’ हे परंतप अर्जुन! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हुए हैं जिनको मैं जानता हूँ, लेकिन तुम नहीं जानते। मैं पहले भी कई बार आया हूँ और अब फिर से आया हूँ। मतलब यह कि पहले भी धरती पर आकर मैंने रूप धारण करके यह ज्ञान दिया है और अब फिर से दे रहा हूँ। यह सम्भावना सदा रहेगी कि मैं फिर से यहाँ आऊँ। पृथ्वीलोक की ज़रूरत पर मुझे फिर से आना होगा।

श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में भगवान ने यह भी कहा कि मुझे आश्चर्य है कि परमात्मा की शक्तियॉं धारण करके परमात्मा के प्यारे लोग संसार में आते हैं और उसका सन्देश अनेकों को देते हैं। सुनने वाले लोग सहमति में गरदनें भी हिला जाते हैं, लेकिन फिर उनका अहंकार आड़े आ जाता है, जिसके कारण वह लोग जानने के बाद भी मानने को तैयार नहीं होते। यह इस धरती का एक बड़ा दुर्भाग्य होता है।

परमात्म शक्ति की अनुभूति और प्रतीति कराने के लिए कोई न कोई शक्ति किसी न किसी रूप में फिर प्रकट होती है। आश्चर्यजनक बात यह रही है कि जब भी उसका सन्देश लेकर कोई भी दुनिया में आया, उसे दुनिया ने अपने जैसा ही साधारण व्यक्ति समझा। क्योंकि उसने कोई खास तरह का भेष धारण नहीं किया था, कोई अलग तरह की पहचान नहीं बनाई थी। फिर भगवान को या किसी महापुरुष को लोग एक ही रूप में देखकर सोच लेते हैं कि ये शायद ऐसे ही हों, शायद साधारण आदमी हों।

प्रभु को सम्पूर्ण रूप में देखना आसान नहीं है लेकिन जिस दिन देख लोगे, उस दिन तुम्हें बड़ा पछतावा होगा। जैसे भगवान कृष्ण ने अपना विराट रूप अर्जुन को दिखाया था और अपना पूर्ण स्वरूप प्रदर्शित किया था। तब अर्जुन की समझ में आया था और उसने कहा था कि प्रभु न जाने मुझसे कितनी गलतियॉं हुई, मैं आपकी अवज्ञा कर गया, मैं आपको समझ नहीं पाया।

प्रभु का जितना-जितना विराट् स्वरूप व्यक्ति जानता जाएगा, उसका सिर झुकता चला जायेगा। भगवान ने इसीलिए अर्जुन से कहा- ’’अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।’’ अर्जुन! मैं अजन्मा हूँ, प्राणिमात्र का स्वामी हूँ, अपनी प्रकृति को और अपनी माया को अपने वश में करके प्रकट हुआ हूँ।

अतएव बहुत ज़रूरी है कि भगवान को अथवा उनके स्थूल प्रतिनिधि यानी गुरु को मानने वाले व्यक्ति उनकी बात को अवश्य मानें।ऐसा करने पर न केवल भक्त-शिष्य का सर्वथा कल्याण होता है, बल्कि भगवान की इच्छा भी पूर्ण होती है। ईश्वर की इच्छा पूरी होने तथा उनकी सन्तुष्टि होने का अर्थ है- इस लोक का कल्याण, सभी का कल्याण।