सूर्य का पूर्व से निकलना एक शाश्वत सत्य है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार/ पंकज कौशिक। परम-शान्ति, सहज-आनन्द और स्थायी-समाधान प्राप्ति की दिशा के आरम्भिक साधन हैं – आत्म अनुशासन और अंतहीन कामनाओं पर नियंत्रण। अतः सत्यप्रकाश और विवेकबल से अनियंत्रित कामनाओं पर विराम चिन्ह लगें और शाश्वत, सनातन नित्यसत्ता-बोध के लिये पुरुषार्थ हो…! कामना साधना में बाधक बनती है। अनियंत्रित कामना साधना में अवरोध पैदा कर सकती है। कामना पर नियंत्रण होता है तभी साधना का विकास हो सकता है। इच्छाएं आकाश के समान अनंत हैं। इनका जितना उपयोग होगा, वे उतना ही बढ़ती जाती हैं। इच्छाओं की पूर्ति से इच्छाओं का शमन नहीं होता है। एक इच्छा को तृप्त करो तो दूसरी सामने मुंह उठाए खड़ी होगी। आग में घी डालने से आग और ज्यादा तेज होगी। अत: इच्छाओं पर अंकुश जरूरी है। आकांक्षाएं समाप्त हो गईं तो समझो संसार की यात्रा सम्पन्न होने में देर नहीं लगेगी। इच्छाओं को हवा देना ही संसार है। संसार को बढ़ाना है तो इच्छाओं को बढ़ाओ और संसार को घटाना है तो इच्छाओं को घटाना आवश्यक होगा। कर्म करते हैं तो फल मिलेगा ही। ऐसा नहीं हो सकता है कि कर्म करो और परिणाम न मिले, वैसे ही इच्छाएं बढ़ेंगी तो संसार भी बढ़ेगा। इसलिए जब इच्छाएं शमित होंगी तो अध्यात्म की यात्रा भी फलित होगी…।

पूज्य “आचार्यश्री” ने सुखी जीवन जीने के लिए जीवन में नियम नीति से रहने की प्रेरणा देते हुए कहा कि जो व्यक्ति धर्म के पथ पर चलकर नियम नीति से जीवन जीता है, सुख स्वयं उसके पीछे दौडे़ चला आता है। बिना नीति के घर, परिवार, राजनीति और अर्थनीति नहीं चल सकती। मन को इंद्रियों पर विषय कषायों का निग्रह और स्वाध्याय यह सब मन को जीतने के साधन हैं। मन को जीतना ही सच्ची साधना है। उन्होंने कहा कि कामनाओं पर नियंत्रण बड़ा कठिन है, लेकिन निरंतर अभ्यास से संसार में दुर्लभ कुछ भी नहीं है। तप दोषों की निवृत्ति का रास्ता है एवं आत्म शुद्धि का मार्ग है। धूप में फल पकते हैं उनमें मिठास आ जाती है, आंच मे भोजन पकता है तो स्वादिष्ट हो जाता है, अग्नि में तपकर स्वर्ण शुद्ध चमकने लगता है, अग्नि में तपकर मिट्टी मंगलमय कुंभ का रुप ले लेती है। जो कुंभ गर्मी में सब की प्यास बुझाता ही है सिर पर धारण किए जाने पर मान-सम्मान भी पाता है। किसान जब बीज बोने जाता है तो खेत को पहले समतल बनाता है। अगर भूमि कठोर हो और समतल आकार में न हो तो क्या किसान उस भूमि में फसल पाने की आशा कर सकता है? इसी प्रकार से साधक को भी ज्ञान और सद्गुण की फसल पाने के लिए पहले अपने हृदय को सरल करना होगा। अभिमान की कठोरता और कषाय (क्रोध, मान, माया एवं लोभ) के कचरे से आत्मा को मुक्त रखना होगा। तभी साधना की यात्रा सफल होगी….।

पूज्य “आचार्यश्री” ने कहा – अगर हम वास्तव में सुख-शाँति से भरा-पूरा जीवन जीना चाहते हैं, तो हमें अपनी आत्मिक उत्कृष्टताओं को उभारना होगा और अपनी सारी बुराइयों से संघर्ष करना होगा। आत्मज्ञान की संपदा प्राप्त किए बिना सुख-शाँति की चाह एक कल्पना मात्र है। जीवन को आत्मिक दिव्यता में ढ़ालने का संकल्प लें, इसके लिए हमें संकीर्णता को त्यागनी होगा। अपने अहं पर आघात करने होंगे। सबमें परमात्मा का ही एक अंश आत्मा की ज्योति प्रज्वलित है, इस सत्य को पहचानना होगा। हम अपनी सत्ता को अहंपोषित इंद्रियों के छोटे और टूटे-फूटे सुख देने के अपेक्षा शाश्वत सुख का आनंद दें। शाश्वत का अर्थ होता है – सनातन; अर्थात्, जो कभी भी न बदले। सूर्य का पूर्व से निकलना एक शाश्वत सत्य है। आयु और शरीर का संबंध शाश्वत है। जो जन्म लेता है, उसकी मृत्यु भी शाश्वत है। महापुरुषों के उच्चतम अनुभवपूर्ण भावों में अपने हृदय को मिला देना एवं उस भाव से स्वयं भावित हो जाना ही असली संग है। यदि ऐसे महापुरुषों का स्थूल सान्निध्य न मिल सके, तो उनके द्वारा रचित सत्साहित्यों का मनोयोगपूर्वक स्वाध्याय भी बहुत लाभदायक होता है। भगवत प्राप्त महापुरुषों के अनुभवयुक्त वचनों में बड़ा प्रभाव होता है और आत्मा को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है। जीवन शाश्वत केंद्र एवं अनादि चैतन्य तत्त्व ‘आत्मा’ ही मनुष्य के सुखों का मूल स्रोत है। जो सुख-शाँति एवं स्थिरता से भरा-पूरा जीवन जीने के अभिलाषी हों, उन्हें अपनी आत्मा को जानने का प्रयास करना चाहिए। जैसे-जैसे आत्मभाव में दृढ़ता आती है, वैसे ही जीवन में आनंद बढ़ने लगता है। आत्मा में ही संपूर्ण विश्व व्यवस्थित है। अतः सर्वत्र एक ही आत्मा का दर्शन करने वाला मनुष्य न तो मोहग्रस्त होता है और न ही शोकाकुल …।