गागरोन किले का दर्द, मैं बूढ़ी हो चुकी हूं, मुझे आसरा चाहिए

देवेश दुबे। झालावाड़ का प्रसिद्ध गागरोन किला यूनेस्को की सूची में विश्व धरोहर के तौर पर आता है. वो किला जिसकी तीन दिशाओं में नदियां बहती हों, वही किला आज बाट जोह रहा है अपने संरक्षण की. किले की दीवार में दरार पड़ चुकी है. प्रशासन कहता है कि सब दुरुस्त कर दिया जाएगा.

झालावाड़ जिला वैसे तो कई प्राकृतिक संपदाओं को अपने इतिहास में समेटे हुए हैं, लेकिन अब लगता है कि इसकी ऐतिहासिकता सिर्फ पन्नों में ही सिमटकर रह जाएगी. झालावाड़ की शान कहा जाने वाला गागरोन जलदुर्ग, जिसे यूनेस्को ने 21 जून 2013 को विश्व धरोहर घोषित किया था.
अब अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. कभी राजशाही का गवाह रहे गागरोन जलदुर्ग के तीनों ओर नदियां बहती है. आहु और काली सिंध नदी के संगम पर यह स्थित है ये प्रसिद्ध जल दुर्ग. जिसकी दीवारों पर पड़ी दरारे ये बता रही हैं, कि हमें इतिहास को सहेजने की आदत को थोड़ा और बेहतर करना होगा. मुकुंदरा टाइगर हिल्स क्षेत्र में बाघों को छोड़े जाने का प्रमुख द्वार भी गागरोन के पास ही बनाया जाना प्रस्तावित है। यानि पर्यटकों को खींचने के लिए कई कोशिशें की जा रही हैं. किले के संरक्षण के लिए बजट प्रस्तावित है, लेकिन बेतरतीब तरीके से किले की प्राचीर और दीवारों पर पेड़-पौधे उगा दिये गए हैं, जिससे किले के एक हिस्से की दीवार में दरार आ गई है
झालावाड़ के अतिरिक्त जिला कलेक्टर राम चरण शर्मा का कहना है कि इसके संरक्षण और पर्यटकों की तादाद बढ़ाने के लिए हर तरह के प्रयास जारी हैं.

कहते हैं कैमरा झूठ नहीं बोलता. इतिहास में भले ही दुर्ग की इन दीवारों ने हर हालातों का डट कर सामना किया हो, लेकिन मौजूदा वक्त में कमजोर हो चुकी ये दीवार चीख चीखकर कह रही है, कि मैं बूढ़ी हो चुकी हूं, मुझे आसरा चाहिए. अगर इस ओर जरूरी कदम नहीं उठाया गया तो प्राचीर का यह हिस्सा कभी भी धाराशाई हो सकता है। सवाल तो ये है कि यूनेस्कों की साइट का ये हाल आखिर क्यों. क्या ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने का यही तरीका होता है, कहां है पर्यटन मंत्रालय और कहां आर्कियोलॉजिकल विभाग जिसकी नजर इस दुर्ग की दीवारों पर पड़ने से पहले ही धुंधली होती जा रही है. कहां गए वो करोड़ों रुपये जो इसके रखरखाव पर खर्च होने की बातें की जाती रहीं हैं.

जानकारी तो ये भी मिली कि पुरातत्व विभाग की टीम ने हालातों का जायजा भी लिया था, लेकिन अब इसकी मरम्मत के लिए आखिर किस मुहुर्त का इंतजार किया जा रहा है. कहीं ऐसा न हो, कि जिन पर्यटकों की संख्या बढ़ाने की कोशिश की जा रही है, दुर्ग की जर्जर दीवार उन्हीं पर्यटकों पर मुसीबत बनकर न टूट पड़े. कम से कम प्रशासन को इस तरफ काम तेजी से करना होगा, बरसात के मौसम में ऐसी इमारतों पर वैसे ही खतरा मंडराता है, और इसकी तो दीवार खुद ही अपनी दास्तां बयां कर रही है.