संगम नगरी में दम तोड़ रही गंगा, केंद्र सरकार की सभी योजनाएं विफल

नई दिल्ली। जैसे ही गर्मी ने दस्तक दी तीर्थराज प्रयाग में गंगा दम तोड़ती नजर आने लगी। मौजूदा हालात में गंगा का जल प्रवाह काफी कम हो गया है। गंगा का पानी सूखने के कारण जगह-जगह डेल्टा नजर आने लगा है जिसकी वजह से नदी की रेत पर सब्जियां उगाई जा रही हैं। पानी कम होने से इलाहाबाद का संगम क्षेत्र भी दो किलोमीटर दूर चला गया है। गंगा स्नान के लिए आए श्रद्धालुओं को संगम तक पहुंचने के लिए काफी पैदल चलना पड़ रहा है। वहीं पर्याप्त जल न मिलने से श्रद्धालुओं को निराशा का सामना करना पड़ रहा है।

मौजूदा हालात में गंगा नदी
पानी की कमी के अलावा गंगा का जल साफ न होने को लेकर भी श्रद्धालुओं में काफी नाराजगी है। गंगा की ऐसी दशा तब है जबकि जनवरी 2019 में प्रयाग में कुम्भ का आयोजन होना है। इस आयोजन में 12 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालुओं के आने का अनुमान लगाया जा रहा है।
गंगा को बांधों से मुक्त कराने और गंगा की जल धारा को अविरल और निर्मल बनाने को लेकर दो दशक से ज्यादा समय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में कानूनी लड़ाई लड़ रहे संत हरि चैतन्य ब्रह्मचारी गंगा की दुर्दशा से खासे आहत है। उनके मुताबिक गंगा की जलधारा पूरी तरह से सूख चुकी है। गंगा में जो जल है वह सीवर, नालों एवं फैक्ट्रियों से छोड़ा गया जल है। उन्होंने कहा है कि गंगा में हमारी आस्था है इसलिए हम गंगा का पूजन करते हैं लेकिन सरकार की ओर से किए जा रहे प्रयास सफल होते नहीं दिख रहे हैं। चैतन्य ब्रह्मचारी ने मांग की है कि 2019 के कुम्भ के मद्देनजर नरौरा और टिहरी डैम से पर्याप्त पानी छोड़ा जाना चाहिए ताकि गंगा की अविरलता और निर्मलता बनी रहे।
श्री राम महेश मिश्र, संरक्षक, ऑल इण्डिया जर्नलिस्ट यूनियन

वहीं धर्मयात्रा संवाददाता ने ऑल इण्डिया जर्नलिस्ट यूनियन के संरक्षक श्री राम महेश मिश्र से इस बावत बात की तो उन्होंने इस पर गहरा खेद व्यक्त किया और कहा कि बड़े दुर्भाग्य की बात है कि देश की आजादी के बाद नदियों के संरक्षण उनकी निर्मलता, सजलता एवं अविरलता के जीवनोपयोगी विषय पर कत्तई घ्यान नहीं दिया गया। एक ओर जहाँ नदियों का भरपूर दोहन किया गया, वहीं दूसरी ओर उनका उपयोग एक ‘गटर’ की भाँति वह सब कुछ डालने के लिए किया गया, जो एक नदी के लिए पूर्णतः वर्जित था।

राजीव गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री

श्री राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में गंगा के लिए चिन्ता की गयी, लेकिन वह चिन्ता तक ही सीमित रही, जो ढेरों राशि खर्चने के बाद आज तक भी चिन्ता तक ही सीमित है। आमजन की उपेक्षा भी गंगा सहित विभिन्न नदियों के लिए कम दोषी नहीं है। जनता भी कभी धार्मिक मान्यता के नाम पर तो कभी अज्ञानतावश नदियों में जल प्रवाह की बेहद कमी की बात से परिचित होते हुए भी बहुत कुछ प्रवाहित करती रही, जिससे नदियों का दम घुटने लगा। श्री राम महेश मिश्र ने बताया कि गंगाजी के प्रति सरकारों की बेरुखी को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सख्ती से अपना दखल दिया था, तब इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अरुण कुमार गुप्ता, श्री मेहता एवं श्री कुलश्रेष्ठ की टीम ने गंगा एक्ट बनाने हेतु उसका ड्राफ्ट सुर्पीम कोर्ट को सौंपा था। सर्वोच्च उदालत द्वारा तत्कालीन भारत सरकार से जवाब तलब करने पर मनमोहन सरकार ने कोर्ट को यह काम सम्पन्न कराने का आश्वासन दिया था और तत्परता बरतते हुए वर्ष 2009 में गंगा को ‘राष्ट्रीय नदी’ घोषित किया। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एन.जी.बी.आर.ए. बनी। लेकिन बैठकों हेतु प्रधानमन्त्री द्वारा समय नहीं दिए जा सकने के कारण वह योजना परवान नहीं चढ़ सकीं।

अरुण कुमार गुप्ता, एडवोकेट
एडवोकेट श्री अरुण कुमार गुप्ता बताते हैं कि उन्होंने तत्कालीन केन्द्रीय जल संसाधन मन्त्री श्री हरीश रावत एवं उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमन्त्री श्री विजय बहुगुणा को भी गंगा एक्ट का ड्राफ्ट सौंपा, लेकिन कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी।
साल 2014 में केन्द्र में नयी सरकार आने के बाद अधिवक्ताओं के इस दल ने एक संशोधित गंगा एक्ट ड्राफ्ट नए प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी को सौंपा। श्री मोदी ने उस पर तत्काल संज्ञान लिया और एक रिव्यू कमेटी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस गिरधर मालवीय की अध्यक्षता में बनायी गयी, जिसमें श्री अरुण कुमार गुप्ता भी सदस्य हैं। यह कमेटी गंगा एक्ट का अन्तिम ड्राफ्ट नमामि गंगे के महानिदेशक, जल संसाधन मन्त्रालय के सचिव तथा पूर्व गंगा शुद्धि मन्त्री सुश्री उमा भारती के माध्यम से प्रधानमन्त्री जी को सौंप चुकी है। बताते हैं कि इस ड्राफ्ट में गंगाजी को सेण्ट्रल सब्जेक्ट बनाते हुए बड़े ठोस एवं सकारात्मक सुझाव दिए गए हैं।
आशा की जानी चाहिए कि मोदी सरकार में भागीरथी मां गंगाजी की सभी समस्याओं का सम्यक् निदान होगा। सन्तोष की बात है कि अब गंगा के प्रवाह क्षेत्र की राज्य सरकारों में पश्चिम बंगाल को छोड़कर शेष 04 सरकारें भाजपा शासित है या भाजपा समर्थित हैं। केन्द्र सरकार अब गंगा के निर्मल, सजल एवं अविरल बनाने के काम को बिना समय गंवाए पूरा करें, यह समय की माँग है और इस देश की भी। आगामी प्रयाग कुम्भ को सफल बनाने के लिए पर्याप्त जल की आपूर्ति करने के सभी उपाय केन्द्र सरकार एवं उत्तराखण्ड सरकार करेगी, यह विश्वास किया जाना चाहिए।
अनुभव खंडूरी, टीवी पत्रकार

टीवी पत्रकार अनुभव खंडूरी बताते हैं कि गंगा किसी एक समुदाय की नहीं बल्कि सभी धर्मो की नदी हैं। गंगा अपने जल से करोड़ो लोगों की जीवन सिंचित करती हैं। गंगा की बदहाल स्थिति किसी से छिपी नहीं है। जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी गंगा के स्वरुप में लगातार गिरावाटें आ रही हैं। उन्होंने बताया कि हम अपने फायदे के लिए सीधे पर्यावरण से खिलवाड़ कर रहे हैं। जबकि देशभर के कुल सिंचित क्षेत्र में से 29 फीसदी क्षेत्र गंगा जल से ही सिंचा जाता हैं। मानव बस्तियों और फैक्ट्रियों से उत्सर्जित 35 हजार लाख टन कचरा सीधे नाले के माध्यम से गंगा में गिरता हैं। इन सभी कारणों से गंगा का जल आचमन के लायक भी नहीं बचा।

गौरतलब है कि तीर्थराज प्रयाग में गंगा की ये हालत तब है जब जनवरी 2019 में संगम की रेती पर कुम्भ का आयोजन होने जा रहा है। केन्द्र और राज्य सरकारें दुनियाभर के देशों में कुम्भ मेले की ब्रांडिंग कर रही हैं। लोगों को कुम्भ में आकर गंगा में डुबकी लगाने का न्यौता भी दे रही हैं लेकिन अगर गंगा में पानी ही नहीं होगा तो फिर आयोजन सफल कैसे होगा यह सोचने की बात है।