संसार के सत्य रहस्यों को जानना व उसका ज्ञान प्राप्त करना ही विज्ञान है

स्वयं को जानने के लिए इस सृजन के सर्वोच्च सत्य को पहचानना है। यह प्रकृति, वस्तुओं और प्रत्येक प्राणी के साथ हमारे अंतर्निहित संबंध को समझना है! सत्य का मार्ग ही जीवन की सफलता का मार्ग है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है? इसके उत्तर में कह सकते हैं कि सत्य को जानना, समझना, उस पर गहनता से विचार करना, महापुरुषों के जीवन चरित्रों व उपदेशों का अध्ययन करना, ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति का सत्य ज्ञान कराने वाले वेद एवं सत्यार्था प्रकाशादि ग्रन्थों को प्राप्त करना व उनका अध्ययन करना, यह सब करके संसार व जीवन विषयक सत्य का निर्धारण करना और उसका पालन करना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य प्रतीत होता है। एक वैदिक प्रार्थना बहुत प्रचलित है ‘असतो मा सदगमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतम् गमय’। इसमें कहा गया है कि ‘हे सृष्टि बनाने वाले, चलाने वाले एवं इसकी प्रलय करने वाले परमात्मन् ! आप सत्य व असत्य को जानते हैं। आप हमें असत्य से हटा कर सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा करें। मैं असत्य का आचरण न करूं और जीवन में सदैव सत्य का ही आचरण करूं, सदा सत्य व प्रकाश के मार्ग पर ही चलूं और जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाऊं।’ इस वैदिक प्रार्थना में जो कुछ कहा गया है, उससे कोई भी मनुष्य असहमत नहीं हो सकता। एक अन्य प्रार्थना जो देश का ध्येय वाक्य भी कह सकते हैं, वह है – ‘सत्यमेव जयते’। इसका अर्थ है कि सत्य की ही सदा विजय होती है। सत्य कभी पराजित नहीं होता। अतः जिसकी सदा विजय हो और जो कभी पराजय को प्राप्त न हो, उसी को हमें मानना चाहिये एवं आचरण में लाना चाहिये।

आचार्यश्री ने कहा जब हम अपने प्राचीन ऋषि-मुनियों व विद्वानों के जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि उनका जीवन सत्य को जानने व उसके आचरण को ही समर्पित था। वह पर्वतों की कन्दराओं, घने वनों में स्थित आश्रमों व कुटियायें बना कर वहां तप की साधना करते थे। तप का अर्थ ही सत्य को जानना व उसका आचरण करना होता है। सत्य अर्थात् ईश्वर के सत्य गुण, कर्म व स्वभाव को जानकर उनका उसके अनुरूप स्तुति व स्तवन करना ही ईश्वर की पूजा कहलाता है। स्तुति का अर्थ स्तोत्य वस्तु के सत्य गुणों को जानकर उसका वर्णन करना होता है। ईश्वर की स्तुति की बात करें तो इसके गुणों सत्य, चित्त, आनन्द, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, निरभिमानी, पवित्र, धार्मिक, पक्षपात रहित होकर न्याय करने वाला, अनादि, नित्य, अमर, अविनाशी, अजन्मा, सृष्टि को बनाने, चलाने, पालन करने व प्रलय करने वाला, सब जीवों को उनके कर्मों का फल देने वाला, जीवात्माओं को जन्म-मृत्यु और पुनर्जन्म देने वाला, अजर एवं अभय आदि गुणों का उच्चारण व प्रशंसा कर अपने गुणों को भी इसके अनुसार बनाना होता है। ईश्वर सबसे महान व सर्वोत्तम सत्ता है जिससे संसार के सभी मनुष्य व प्राणी लाभान्वित हैं। अतः सबको ईश्वर व परोपकारी, स्वार्थशून्य, चरित्रवान महात्माओं की स्तुति करनी चाहिये। महापुरुषों के जीवन में अधिकांश ईश्वर के समान व उसके जैसे न्यूनाधिक गुण होते हैं जिससे संसार के सभी लोग, कोई किसी भी मत का अनुयायी क्यों न हो, उन महापुरुषों का मत-पन्थ की संकीर्ण मान्यताओं से ऊपर उठकर उनका सम्मान करते हैं।

आचार्यश्री ने कहा संसार के सत्य रहस्यों को जानना व उसका ज्ञान प्राप्त करना ही विज्ञान है। इस जाने हुए विज्ञान का उपयोग कर अपनी सुविधाओं की वस्तुओं का निर्माण करना ही आविष्कार है व आविष्कार से निर्मित उत्पाद विज्ञान की देन कहलाते हैं। हम इस संसार को देखते हैं तो इसकी विशालता को जानकर हमारा सिर घूम जाता है। संसार में ऐसे भी सूर्य पिण्ड बतायें जाते हैं जिसका प्रकाश अभी तक हमारी धरती पर नहीं पहुंचा है। प्रकाश की गति प्रति सेकेण्ड 1,86,000 मील है। इससे ब्रह्माण्ड की विशालता का ज्ञान होता है। हम जानते हैं कि कोई भी रचना बिना कर्ता के नहीं होती। अतः इतना विशाल सुव्यवस्थित ब्रह्माण्ड भी बिना एक कर्ता ‘ईश्वर’ के बिना चल ही नहीं सकता। हमें संसार को बनाने वाले उसी ईश्वर की खोज करनी है। उसे अपनी आत्मा में प्राप्त करना है। सच्चे विद्वानों व ज्ञानियों की शरण लेकर उनसे ईश्वर के स्वरूप व गुणों को जानना है। हमें अपनी आत्मा के स्वरूप व उसके अतीत व भविष्य पर भी विचार करने के साथ ज्ञानियों व पुस्तकों से उसका ज्ञान प्राप्त करना है और उसके उत्कर्ष व उन्नति के लिए पुरुषार्थ करना है। और, यह तभी हो सकता है जब हम सत्य की प्रतिष्ठा करेंगे और बुद्धि की जड़ता और अन्धविश्वासों से ऊपर ऊठेंगे। यदि परम्परागत मान्यताओं में बने रहेंगे तो शायद हम सत्य को जान न सकें। हमें धर्म विज्ञानी व सत्य-धर्म शोधार्थी बनना होगा। इससे हमें अनेक नये रहस्यों का ज्ञान होगा, जिससे हम देश व संसार का कल्याण कर सकते हैं। प्राचीन ग्रन्थ, वेद, उपनिषद, दर्शन आदि को भी गम्भीरता से अध्ययन करना चाहिये। इन्हीं ग्रन्थों के क्रम में ही सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि आदि ग्रन्थ भी हैं। इनमें प्राचीन सत्य ज्ञान भरा पड़ा है, ऐसा ऋषि-मुनि व शास्त्रों के ज्ञाताओं का कथन है। सत्य में ही जीवन को लगाना और नये-नये बहुमूल्य मोतियों को प्राप्त करना ही हमारे जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। तो आईये ! हम भी जीवन के लक्ष्य ‘‘सत्य” पर विचार करें और उस को प्राप्त करने के लिए आज से ही सत्य के मार्ग पर चलना आरम्भ कर दें …।