पर्यावरण संरक्षण मानव का दायित्व है – डॉ. सुधीर मिश्र

लखनऊ। पर्यावरण संरक्षण का तात्पर्य, हम अपने चारो ओर के आवरण को सुरक्षा प्रदान करें, उसके घेरे को अभेद्य बनाए तथा उसे अनुकूल बनाए रखे। पर्यावरण और प्राणी एक दुसरे पर आश्रित हैं, सम्बन्ध इतना गहरा है कि एक प्रभावित होगा तो दूसरे पर प्रभाव निश्चित पड़ता है। यदि पर्यावरण संतुलित है यानि वायु शुद्ध है, शोर नहीं है, प्रचुर मात्रा में सर्दी गर्मी, वर्षा व नमी मिलती रहती है तो मानव का स्वास्थ्य भी अच्छा होगा। इसके विपरीत स्थिति होती है तो जीव से लेकर जीवन तक इसके कोपभाजन का शिकार होते हैं। पर्यावरण संरक्षण मानव का दायित्व है
मानव बुद्धि और विवेक द्वारा पर्यावरण के साथ संबध स्थापित करने के अनेक विकल्पों में से उपयोगी व् सर्वश्रेष्ठ का चयन कर सकता अतः विवेकवान होने के नाते मानव से पर्यावरण संरक्षण की अपेक्षा होना स्वभाविक है जिसकी आधुनिक वैज्ञानिक युग में नित नूतन हो रहे उपयोगी प्रयोगों के आयामों से मानव का परिचय करा कर उसकी पर्यावरण को प्रभावित व् नियंत्रित करने की क्षमता में बृद्धि की जाए प्राकृतिक संसाधनों के अतिशोषण और प्रदूषण का दोषारोपण प्रौधौगिकी को दिया जाता है लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष में इनका पूर्ण निषेध संभव नहीं आज अभिष्ट यह है कि “विज्ञान प्राकृतिक व्यवस्था में न्यूनतम व्यवधान और अधिक सामंजस्य के लक्ष्य हेतु प्रयत्नशील रहे पर्यावरण संरक्षण के लिए सरकारी प्रयासों को गंभीरता से लागू करना एवं स्वयं अपने स्तर पर आत्मीयता से धारण कर इस महत्वता पूर्ण जीवन दायिनी शक्ति का संरक्षण करना होगा हमारी अपनी वह मानसिकता जो क्षणिक लाभ के लिए दूरगामी परिणामों की उपेक्षा करने की होती चली जा रही है जैसे अपने सुख सुविधा के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की बनती जा रही है ऐसी प्रवृति पर नियंत्रण करते हुए मानव जाति में भौतिक पदार्थों, वनस्पतियों एवं जीव जंतुओं के प्रति नैतिक आचार संहिता के निर्वाह की अभ्यस्तता विकसित करना अनिवार्य होगा।
मानव तथा प्रकृति के अन्तः संबंधो का अधूरा एकांकी भ्रान्ति पूर्ण ज्ञान और उसका प्रयोग स्थिति तो यह आती जा रही है कि जिससे जीवन चल रहा है और जो प्रकृति प्रदत्त मुफ्त है उसके विषय में हम उपेक्षित भाव रखते जबकि उसी से हूं मैं? के अस्तित्व का बोध होता है। मानव के पर्यावरण विषयक दृष्टिकोण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण नियामक तत्व है संस्कृति खासकर भारतीय क्योकि पाश्चात्य दृष्टिकोण उपभोक्तावादी सकेंद्री संबंध का पक्षधर रही है

अस्तित्व रक्षा के लिए जिज्ञासु प्रवृति मानव ने पर्यावरण के विषय में अपने ज्ञान का उपयोग उसके प्रति अनुकूलन, समायोजन में अपनी उस प्रवृति को ही प्राथमिकता दी जिससे सुविधा व् सुरक्षा पर्यावरणीय परिवर्तन में भी अनुकूलन हो। जीव का जन्म अस्तित्व विकास बृद्धि विनाश सब पर्यावरण पर ही निर्भर होता है अतः पर्यावरण को जीवन की प्रथम शर्त कहा जा सकता क्योंकि पर्यावरण के बिना जीव व जीव के अभाव में पर्यावरण का कोई महत्व नहीं है। पर्यावरण का संरक्षण ही जीव व् जीवन का ही नहीं अपितु सम्पूर्ण ब्रहमांड का संरक्षण है
मैं मानव एवं पर्यावरण को भारतीय संस्कृति के मानवीय मूल्यों के आधार पर भावनात्मक संबंधो को आधुनिक परिप्रेक्ष में जानने की ही नहीं जीने का भी प्रयास किया हूं जो आज की मूलभूत आवश्यकता है।

यह सत्य है कि आज का विज्ञान धरती से मंगल ग्रह तक की यात्रा कर चुका है लेकिन जिस अस्तित्व व पर्यावरण में इतनी सुलभता से ज्ञानार्जन किया उसी के ज्ञान के प्रति उपेक्षात्मक भाव क्यों? अतः आज जब पर्यावरण संरक्षण मानव के अस्तित्व रक्षण की अनिवार्य शर्त बन गया है। ऐसे में हमें विकास के विनाशोंन्मुखी मार्ग पर बिना विचारे बढ़ते जाने से ठिठक कर विकास की गति ही नहीं उस दिशा पर भी ध्यान देना होगा जिसमे मानव व उसके अस्तित्व का सम्पूर्ण विज्ञान सन्नहित हो यानि पर्यावरण संरक्षण।

लेखक डॉ. सुधीर मिश्र लखनऊ विश्वविद्यालय में प्लेसमेंट ऑफीसर हैं।