पर्यावरण को मानव ही सर्वाधिक प्रभावित करता है- डॉ. सुधीर मिश्र

लखनऊ। भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। जिसके संरक्षण एवं विकास पर अपनी संस्कृति पूर्णतया चैतन्य रही है। यहां मानव जीवन को सदैव मूर्त व अमूर्त रूप में पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र, पर्वत, नदी, वृक्ष, एवं पशु पक्षी आदि के साहचर्य में ही देखा गया। पर्यावरण के तत्व हमारे जीवन के आधार हैं जिन्हें संरक्षण प्रदान करना हमारा मूल कर्तव्य है। हमारा जीवन पर्यावरण से सघनता से सम्बंधित है, क्योंकि भारतीय जीवन दर्शन सदैव देह के निर्माण व् उसके उचित संरक्षण व संवर्धन में पञ्चतत्वों की शुद्धता को ही विशेष स्थान दिया।

पर्यावरण यानि परि और आवरण, जिसमें परि का अर्थ चारों तरफ और आवरण का तात्पर्य घेरे हुए, यानि चारो ओर से वरण, आवरण, अधिकार या भरण करना। इस प्रकार पर्यावरण का तात्पर्य उन सबसे ही है, जो किसी वस्तु विशेष को चारों ओर से घेरे हुए हैं, वह उसका पर्यावरण है। यानि मानव के पर्यावरण में उसके चारों तरफ वायु, जल, सूर्य, नमी, वनस्पतियां, जीव जन्तु सब शामिल हैं, जो प्रतिक्षण किसी न किसी रूप में उसे प्रभावित करते हैं। मानव आज जैसा भी है उसमें उसके पर्यावरण का विशेष योगदान है। मानव सहित समस्त प्राणी अपने भोजन के लिए पादपों पर निर्भर करते और अनेक पादप भी प्राणियों पर निर्भर हैं फिर पादप अपने विकास, वृद्धि एवं फलने फूलने के लिए प्रकाश, पानी, नमी, जल, एवं मृदा पर निर्भर है जिससे स्पष्ट होता है कि जीव की अधिकांश उर्जा अपने पर्यावरण की भौतिक स्थितियों के प्रति अनुकूलित होने में जहां व्यय होती रहती, वहीं मानव दूसरे जीव जंतु तथा सभी भौतिक प्रभाव एक दूसरे को येन केन प्रकारेण प्रभावित करते ही रहते हैं। इनके निरंतर चलते आ रहे शाश्वत संबंधो का परिणाम ही जीवन और संसार है, और हमारे चारों तरफ जो कुछ भी उपस्थित है वह पर्यावरण का ही अंश है।

परिभाषिक रूप में पर्यावरण शब्द जीवों की विविध अनुक्रियाओं को प्रभावित करने वाली समस्त भौतिक तथा जैविक परिस्थितियों का योग है। पर्यावरण को हम जीव मंडल (बायोस्फियर) कह सकते हैं जिनका पुनर्विश्लेषण करने पर पता चलता है कि- जीवमंडल एक रचना न होकर जलमंडल (हाइड्रोस्फीयर), स्थलमंडल (लिथोस्फीयर) तथा वायुमंडल (एटमासफियर) का मिला जुला रूप है।

जैवमंडल प्राणी जगत के जीवन के लिए उपयोगी है जहां वह जलमंडल से जल, स्थलमंडल से भोजन एवं निवास तथा वायुमंडल से प्राणवायु ग्रहण करता है। ये तीनो मंडल एक दूसरे के पूरक हैं। इनमें से एक के भी नष्ट होने पर जीव का अस्तित्व सम्भव नहीं है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पर्यावरण एक ऐसी अमूर्त चीज है जो स्थायी नहीं, समय के साथ अनेक घटकों से प्रभावित होकर परिवर्तित होती रहती है। यदि यह सत्य है कि “मानव पर्यावरण के परिवर्तन से प्रभावित होता है, तो वही यह भी कटु सत्य है कि पर्यावरण को मानव ही सर्वाधिक प्रभावित करता है।

(लेखक डॉ. सुधीर मिश्र लखनऊ विश्वविद्यालय में प्लेसमेंट ऑफीसर हैं)