“मनुष्य जैसा कर्म करता है उसे उसके अनुरूप ही फल की प्राप्ति होती है”- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

सीकर। अपने अविनाशी, नित्य, सनातन एवं शाश्वत-स्वरूप का बोध श्रीमद् भागवत से सहज सम्भव है। श्रीमद् भागवत कथा भवतारक साधन है…! श्रीमद् भागवत समस्त उपनिषदों का सार है। इसमें सभी मानवीय गुणों का समावेश है। विश्व में मानवता की स्थापना गीता के उपदेशों को अंगीकृत करने से ही हो सकती है। श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान पर अर्जुन को श्रीमद्भागवत गीता का यह उपदेश दिया था कि फल की इच्छा किए बिना अपना कर्म करते हुए जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहो। श्रीमद्भागवत गीता न केवल धर्म का उपदेश देती है, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाती है। महाभारत के युद्ध के पहले अर्जुन और श्रीकृष्ण के संवाद लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। माया रूपी संसार में पैदा होने के बाद मनुष्य संसारिक बंधन व मोह माया में फंस ही जाता है। भगवान की भक्ति एवं भागवत कथा का श्रवण करने से ही मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। गीता के उपदेशों पर चलकर न केवल हम स्वयं का, बल्कि समाज का भी कल्याण कर सकते हैं। श्रीमद् भागवत कथा श्रवण से जन्म-जन्मांतर के विकार नष्ट होकर प्राणी मात्र का लौकिक व आध्यात्मिक विकास होता है। जहां अन्य युगों में धर्म लाभ एवं मोक्ष प्राप्ति के लिए कड़े प्रयास करने पड़ते हैं, वहीं कलियुग में कथा सुनने मात्र से व्यक्ति भवसागर से पार हो जाता है। सोया हुआ ज्ञान, वैराग्य कथा श्रवण से जाग्रत हो जाता है। कथा कल्पवृक्ष के समान है, जिससे सभी इच्छाओं की पूर्ति की जा सकती है। कथा की सार्थकता तभी सिद्ध होती है जब इसे हम अपने जीवन में, व्यवहार में धारण कर निरंतर हरि स्मरण करते हुए अपने जीवन को आनंदमय, मंगलमय बनाकर अपना आत्म-कल्याण करें। अन्यथा यह कथा केवल मनोरंजन अथवा कानों के रस तक ही सीमित रह जाएगी। कथा मनोरंजन के लिए नही, मनोमंथन के लिए है। भागवत कथा से मन का शुद्धिकरण होता है। इससे संशय दूर होते हैं और शांति व मुक्ति मिलती है। अतः सद्गुरु की पहचान कर उनका अनुकरण एवं निरंतर हरि स्मरण, भागवत कथा श्रवण करने में ही जीवन की सार्थकता है। श्रीमद् भागवत कथा श्रवण करने से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। मनुष्य विषय-वासना में फंसकर मोक्ष का लक्ष्य भूल जाता है। जितने भी धर्म ग्रंथ है उनमें दुःख के कारण के लिए एक ही बात लिखी गई है – आत्मविस्मृति ही दुःख का कारण है। सुख का कारण क्या है? सुख का कारण है – नारायण स्मृति। इसलिए मनुष्य को कर्मयोगी बनना चाहिए और अपने समक्ष परमानंद को पाने का, ब्रह्मानंद को प्राप्त करने का लक्ष्य रखना चाहिए….।

“आचार्यश्री” ने कहा – श्रीमद् भागवत कथा जीवन को नई ऊंचाई देती है। इसके श्रवण मात्र से मनुष्य के भीतर चल रहे विकृत विचारों में बदलाव आने लगता है। विकृत चिंतन ही रोग-शोक का मूलभूत कारण है। प्रकृति के विपरीत कर्म करने से मनुष्य तनाव युक्त होता है। और यही तनाव मनुष्य के विनाश का कारण बनता है। केवल धर्म और सद्कर्म के मार्ग पर ही तनाव से मुक्ति मिल सकती है। इस धरा पर धन्य वे ही हैं जिन्होंने अपने मनोविकार जीत लिए हैं, जिनकी इंद्रियां संयमित और शांत है। मन पर नियंत्रण करना बेहद आवश्यक है। जो व्यक्ति मन पर नियंत्रण नहीं कर पाते, उनका मन उनके लिए शत्रु का कार्य करता है। मुनष्य जिस तरह की सोच रखता है, वैसे ही वह आचरण करता है। अपने अंदर के विश्वास को जगाकर मनुष्य सोच में परिवर्तन ला सकता है, जो उसके लिए कल्याणकारी होगा। व्यक्ति को आत्म-मंथन करना चाहिए। गीता में श्रीभगवान कहते हैं – “मनुष्य जैसा कर्म करता है उसे उसके अनुरूप ही फल की प्राप्ति होती है”। इसलिए सदकर्मों को महत्व देना चाहिए। श्रीमद्भागवत के महात्म्य में कहा गया है कि देवता अमृतकलश लेकर महर्षि व्यास के पास आए। उन्होंने महर्षि से कहा कि वे अमृतकलश ले लें और उन्हें भक्ति रस प्रदान कर उत्कृष्टतम भागवत कथा का पान कराएं। महर्षि ने मना कर दिया। देवताओं ने अमृत के बदले जो कथा सुनने की इच्छा प्रकट की, इससे संकेत मिलता है कि अध्यात्म का पावन रस अमृत से भी ज्यादा मूल्यवान है। अमृत आयु को बढ़ा जरूर देता है, लेकिन मृत्यु के भय को समाप्त नहीं कर पाता। देवताओं को भी अपमान और पराजय रूपी मृत्यु समान कष्ट का भय सदैव बना रहता है। पुराणों में इंद्रादि से संबंधित कथाओं को पढ़ने से इसकी पुष्टि होती है। परीक्षित की कथा जिन्होंने पढ़ी-सुनी होगी, वे भलीभांति जानते हैं कि परीक्षित ने स्वर्गलोक में प्राप्त होने वाले अमृत का पान नहीं किया था, फिर भी वे अमर हो गये। उनमें से मृत्यु का भय सदा-सदा के लिए चला गया। वह परीक्षित, जो मृत्यु से बुरी तरह भयभीत था, कालसर्प तक्षक के समक्ष अपने दाहिने पैर का अंगूठा बढ़ाकर कहता है कि ‘लो, काट लो मुझे, अब तुम्हारे दंश के फलस्वरूप प्राप्त होने वाली मृत्यु का मुझे बिलकुल भी भय नहीं है’। भागवत कथा जीवन जीने के साथ-साथ मरने की भी कला सिखाती है। भव सागर रूपी संसार सागर को पार करने के लिए भागवत कथा जहाज के सामान है। आज के भौतिकवादी युग में मानव शिक्षा, संसाधन और धन जुटाने में लगा हुआ है। परन्तु, यह सब व्यर्थ है, जब तक कि हम अपनी शिक्षा और अपने जीवन को सनातन संस्कृति से नहीं जोड़ते। जीवन का यही मोल हमारी भागवत कथा बताती है। अतः भागवत जीवन जीने की कला का सनातन साधन है…!