दीपावली मुहूर्त जाने ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय से

वाराणसीl पंच महोत्सव पर्व का पहला दिन होता है धनतेरस। हिंदू धर्म ग्रंथों में धनतेरस के बारे में प्रचलित कथा के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन समुद्र मंथन से आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्होंने देवताओं को अमृत का पान करवाकर अमर कर दिया था,इसलिए वर्तमान संदर्भ में भी आयु और स्वास्थ्य की कामना से धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि का पूजन किया जाता है।
धनतेरस के अगले दिन अर्थात कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या रूप चतुर्दशी होती है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने नरकासुर नामक दैत्य का वध करके लोगों को उसकी क्रूरता और अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। इस संबंध में जुड़ी एक अन्य रोचक कथा है कि इस दिन भगवान विष्णु के अवतार वामन देव ने राजा बलि की तीन पग धरती नापी थी।
नरक चतुर्दशी के अगले दिन कार्तिक अमावस्या आती है यह वह पर्व है, जिसका इंतजार काफी दिनों पहले से किया जाता है। अमावस्या के अंधेरे को चीरकर जगमग-जगमग दीपों को जलाने वाला दीपावली का त्योहार हमारे मन को प्रसन्न रखने के साथ ही जीवन से दरिद्रता और मलिनता के अधिकार को मिटाकर समृद्धि का उजियारा फैलाता है।
दीपों का यह प्रकाश पर्व भगवान रामचंद्र जी के 14 वर्ष के वनवास के बाद लंका विजय पर अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाता है । उस समय अयोध्यावासियों ने रामचंद्र जी के आगमन पर आकर्षक दीप मालाएं सजाकर उनका स्वागत किया था। तब से प्रतिवर्ष यह त्यौहार उसी धूमधाम और उमंग से मनाया जाता है।
दीपावली से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने राजा बलि की कैद से लक्ष्मी सहित अन्य देवताओं को छुड़वाया था। बंदी देवताओं का सारा धन धान्य,राजपाट बली ने अपने अधिकार में ले लिया था, तब कैद से छूटने के पश्चात देवी लक्ष्मी ने सभी देवताओं को पुनः समृद्धि और समस्त सुखों से परिपूर्ण कर दिया था। इसलिए इस दिन लक्ष्मी पूजन किया जाता है।
दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन गोवर्धन पूजा की जाती है । गोवर्धन पूजा के बारे में शास्त्रों में यह वर्णन मिलता है कि एक बार श्री कृष्ण गाय चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में जा पहुंचे वहां उन्होंने देखा कि गोपियाँ गोवर्धन पर्वत के पास छप्पन भोग रखकर कोई उत्सव मना रही है । श्री कृष्ण के पूछने पर उन्होंने बताया कि हम मेघों के स्वामी हम इंद्र का पूजन कर रहे हैं,ताकि ब्रज में अतिवृष्टि ना हो जिससे अन्य पैदा हो सके। श्री कृष्ण ने कहा — इंद्र की पूजा से कुछ नहीं होता है असली शक्ति तो हमारे गोवर्धन पर्वत में है, इसकी पूजा करो तब वर्षा होगी श्री कृष्ण से काफी तर्क वितर्क करने के बाद बृजवासी इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लग गए इस बात से क्रुद्ध होकर इंद्र ने ब्रज में मुसलाधार बारिश करना प्रारंभ कर दीया ,भयंकर वर्षा से ब्रजवासियों के खेत और घर बह गए । तब उनकी रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी एक उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाया और उसके नीचे सारे ब्रजवासियों को लाकर वर्षा से बचाया श्री कृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठाने से इंद्र का घमंड चूर हुआ तब से गोवर्धन पूजा प्रारंभ हो गई।
पंच महोत्सव पर्व का अंतिम दिन भाई दूज या यम द्वितीया कहलाता है। इस पर्व के बारे में कहा जाता है कि एक समय काशीपुरी में एक ब्राह्मण रहता था। उसके एक पुत्र और एक पुत्री थी। एक समय जब ब्राह्मण का पुत्र अपनी बहन की ससुराल से लौट रहा था,तब रास्ते में उसे दो दानव मिले। दानवों ने उसे रोका और कहा हम कई दिनों से भूखे हैं और आज तुझे खा कर अपनी भूख मिटाएंगे। ब्राह्मण पुत्र तुरंत तैयार हो गया लेकिन उसने दानवों से कहा कि पहले मेरी प्यारी बहन के हाथ का बना भोजन खा लो फिर मुझे खाना। दानवों ने जैसे ही उसकी बहन के हाथ के पके पकवानों को छूना चाहा ,वे दानव जलकर भस्म हो गए क्योंकि ब्राह्मण की बेटी ने स्वयं अपने भाई के लिए प्यार से पकवान तैयार किए थे। उन्हीं पकवानों से उसके भाई की रक्षा हुई थी इसीलिए तब से यह परंपरा चली आ रही है कि यम द्वितीया के दिन भाई अपनी बहन के घर जाकर उसके हाथों का बना भोजन ग्रहण करते हैं।
पंच महोत्सव पर्व का सबसे मुख्य पर्व है “”दीपावली””।इस दिन घर की साफ-सफाई करके गोबर से आंगन लीपकर उसमे रंग बिरंगी रंगोलियां सजाई जाती है। शाम के समय शुभ मुहूर्त में स्वादिष्ट पकवान और फलों से महालक्ष्मी का पूजन किया जाता है। पूजन के लिए पूर्व की ओर मुख करके एक चौकी पर श्रीगणेश,लक्ष्मी और सरस्वती का चित्र रख कर पूजन सामग्री से विधिविधानपूर्वक पूजन किया जाता है। लक्ष्मी के साथ सरस्वती और श्रीगणेश का पूजन इसलिए किया जाता है क्योंकि सरस्वती ज्ञान की देवी और गणपति बुद्धि के दाता हैं, बिना ज्ञान और बुद्धि के लक्ष्मी ( धन ) की प्राप्ति असंभव है,इसलिए लक्ष्मी, सरस्वती,गणेश का पूजन आवश्यक है। रात्रि में “श्री सूक्त” और “कनकधारा स्त्रोत” का पाठ भी किया जाता है। इस दिन लोग तिजोरी बहीखाता तथा लेखनी का पूजन भी करते हैं। मुख्य बात यह है कि लक्ष्मी का पूजन केवल मात्र ना करके इस दिन भगवान विष्णु का पूजन पूर्व में किया जाना अतिआवश्यक है। बिना भगवान विष्णु की पूजा किए व्यक्ति का लक्ष्मी पूजन करना निरर्थक और निष्फल का होता है। इसलिए सबसे पहले भगवान विष्णुजी का आव्हान अवश्य करें ।
 
धनतेरस के दिन नई चीजें खरीदना पुरानी परंपरा है। इस परंपरा का हिंदू धर्म में खास महत्व है। इसके अलावा इस दिन लक्ष्मी-गणेश – कुबेर और धनवंतरी पूजन का भी विशेष महत्व है। श्री संवत 2074 कार्तिक कृष्ण पक्ष धनत्रयोदशी (धनतेरस) दिनांक 17 अक्टूबर 2017 मंगलवार सायं प्रदोष बेला शुभ मुहूर्त 6:04 से 8:28 रात्रि पर्यंत इस समय में गणपति,सरस्वती, लक्ष्मी पूजन के अलावा भगवान कुबेर व धन्वंतरि की पूजा की जाती है और साथ ही चांदी का पूजन भी की जाती है। दीपावली पर लक्ष्मी पूजन मुहूर्त इस वर्ष कार्तिक कृष्ण अमावस्या दिनांक 19 अक्टूबर 2017 को प्रदोष काल में अमावस्या होने से इसी दिन दीपावली मनाई जाएगी लक्ष्मी पूजन प्रदोष युक्त अमावस्या को स्थिर लग्न व स्थिर नवमांश में किया जाना सर्वश्रेष्ठ होता है । अमावस्या सूर्योदय से मध्य रात्रि 12:41 तक रहेगी दीपावली लक्ष्मी की उत्पत्ति तिथि व लक्ष्मी कुबेर पूजन हेतु स्वयं सिद्ध समय है अतः लक्ष्मी कुबेर से संबंधित मांगलिक कार्य इस दिन शुभ माने गए है।
दीपावली 19 अक्टूबर 2017 को है इस दिन गुरुवार है और हस्त नक्षत्र सुबह 7:26 तक रहेगा। गुरुवार और हस्त नक्षत्र के मिलन से इस दिन राक्षस योग बनता है, लेकिन यह राक्षस योग सुबह 7:26 पर ही समाप्त हो जाएगा। प्रातः 07:26 बाद चित्रा नक्षत्र प्रारंभ हो जाएगा जो कि चर योग होने से कार्यसिद्द योग है। इस दिन एक अशुभ योग और है जिसे हम वैधृति योग कहते हैं,जिसमें सभी शुभकार्य वर्जित कहे गए हैं अर्थात यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वैधृति योग में कोई भी कार्य न करें वैधृति योग इस दिन दोपहर बाद 15:58 अर्थात दोपहर बाद 3:58 तक रहेगा अतः इस समय के बाद ही सभी शुभ कार्य या पूजन संबंधित कार्य करने सभी के लिए शुभ रहेंगे और फलदाई रहेंगे।
दिनांक 19 अक्टूबर 2017 गुरुवार अमावस्या दीपावली के दिन शुभ का चौघड़िया प्रातः 6:38 से प्रातः 8:03 तक रहेगा इसके बाद चर-लाभ-अमृत का चौघड़िया प्रातः 10:55 से दोपहर 3:11 तक रहेगा (यहां एक बात पर ध्यान देवें की गुरुवार को अमृत के चोगड़िये में राहुकाल रहता है अतः दोपहर 01:45 से 03:11 मध्य राहुकाल रहेगा )।।इसके बाद शुभ का चौघड़िया शाम को 4:36 से 6:02 तक रहेगा। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:56 से दोपहर 12 :44 तक रहेगा ।। सर्वश्रेष्ठ समय प्रदोष काल सायं 6:03  मिनट से रात्रि 8:30 तक रहेगा।।
इस दिन रात्रि के श्रेष्ठ चौघड़िया अमृत व चर का चौघड़िया सायं 06:02 से रात्रि 09:11 तक रहेगा।। लाभ का चौघड़िया मध्य रात्रि 12:20 से मध्य रात्रि 01:54 तक रहेगा और शुभ व अमृत का चौघड़िया अंतः रात्रि 03:29 से अंतः रात्रि 06:38 तक रहेगा।।
?सबसे श्रेष्ठ इस दिन स्थिर संज्ञक वृषभ लग्न वेला रात्रि समय 7:33(19:33) से 09:29 (21:29)रात्रि पर्यंत रहेगा तथा अर्धरात्रि स्थिर संज्ञक सिंह लग्न बेला मध्य रात्रि 02:00 बजे से 4:16 मध्य रात्रि शेष पर्यंत एवं इस सिंह लग्न में “कनकधारा स्त्रोत” का पठन पाठ विशेष श्रीकारक सिद्ध होता है।
?दीपावली के दिन गादी स्थापना- स्याही भरना- कलम दवात संवारने हेतु भी ये मुहूर्त शुभ रहेंगे ।।
?विशेष नोट :– दीपावली के दिन यह ध्यान रखें कि इस दिन वैधृति योग दोपहर 3:58 तक है अतः सभी मुहूर्त 3:58 बाद ही करें तो ज्यादा शुभ रहेगा।।
?रोकड़ मिलान लेखन कार्य कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा शुक्रवार दिनांक 20 अक्टूबर 2017 प्रातः 8:10 से 10:58 तक लाभ-अमृत वेला का समय शुभ रहेगा।। इस समय में ही गोवर्धन पूजा भी करें । इस दिन भगवान को नई फसलों व अनाज का भोग लगाया जाता है ।।
सभी मुहूर्त वाराणसी के सूर्योदय अनुसार हैं।
?दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं ?
              ज्योतिर्विद् अभय पाण्डेय
                         वाराणसी
                    9450537461