सृष्टि में नारायण को विष्णु रूप में स्थापना का पर्व, देवोत्थान एकादशी, तुलसी विवाह एवं भीष्म पंचक

संजय तिवारी। कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी हमारी सनातन परंपरा का बहुत ही पवित्र पर्व है। वस्तुतः यह जीवन की साधना की तिथि है। यह सृष्टि को जागृत अवस्था में लाने की तिथि है। आत्मा को ऊर्जा देने की तिथि है। यह केवल कोई सामन्य पर्व भी नहीं है। यही वह तिथि है जिस दिन भगवान् नारायण अर्थात विष्णु की स्थापना इस सृष्टि के पालक के रूप में होती है। देवोत्थान, तुलसी विवाह एवं भीष्म पंचक एकादशी के रूप में मनाई जाती है। दीपावली के बाद आने वाली इस एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं।भगवान विष्णु को चार मास की योग-निद्रा से जगाने के लिए घण्टा, शंख, मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि के बीचये श्लोक पढकर जगाते हैं-

उत्तिष्ठोत्तिष्ठगोविन्द त्यजनिद्रांजगत्पते।

त्वयिसुप्तेजगन्नाथ जगत् सुप्तमिदंभवेत्॥

उत्तिष्ठोत्तिष्ठवाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे

हिरण्याक्षप्राणघातिन्त्रैलोक्येमङ्गलम्कुरु॥
आषाढ शुक्ल एकादशी की तिथि को देव शयन करते हैं और इस कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन उठते हैं। इसलिए इसे देवोत्थान (देव उठनी) एकादशी भी कहते हैं। पुराणों के अनुसार इस संसार में चार युग सतयुग , त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग हुए  हर युग को भगवान ब्रह्मा का एक दिन माना जाता है और भगवान ब्रह्मा का एक दिन लगभग 4 अरब वर्ष होता है हर युग के अंत में भगवान ब्रह्मा सो जाते है  भगवान ब्रह्मा की शक्तियों का सृजन वेदों में बताया गया है  जब भगवान ब्रह्मा सो जाते है तो कोई सृजन नही होता है और दुनिया का अंत हो जाता है | भगवान विष्णु को सरंक्षण का भगवान माना जाता है और जब दुनिया खतरे में होती है तो बुरी शक्तियों से संसार को बचाने के लिए पृथ्वी पर अवतार लेते है  भगवान विष्णु के दस अवतार है और भगवान विष्णु का प्रथम अवतार मतस्य अवतार है |
कहा जाता है कि भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को चार माह के लिए क्षीर सागर में शयन करते हैं। चार महीने पश्चात वो कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। विष्णुजी के शयन काल के चार माह में विवाह आदि अनेक मांगलिक कार्यों का आयोजन निषेध है। हरि के जागने के पश्चात यानी भगवान विष्णु के जागने बाद ही सभी मांगलिक कार्य शुरू किये जाते हैं।
कथा
एक बार भगवान विष्णु से उनकी प्रिया लक्ष्मी जी ने आग्रह के भाव में कहा- हे भगवान, अब आप दिन रात जागते हैं। लेकिन, एक बार सोते हैं,तो फिर लाखों-करोड़ों वर्षों के लिए सो जाते हैं। तथा उस समय समस्त चराचर का नाश भी कर डालते हैं। इसलिए आप नियम से विश्राम किया कीजिए। आपके ऐसा करने से मुझे भी कुछ समय आराम का मिलेगा। लक्ष्मी जी की बात भगवान को उचित लगी। उन्होंने कहा, तुम ठीक कहती हो। मेरे जागने से सभी देवों और खासकर तुम्हें कष्ट होता है। तुम्हें मेरी सेवा से वक्त नहीं मिलता। इसलिए आज से मैं हर वर्ष चार मास वर्षा ऋतु में शयन किया करुंगा। मेरी यह निद्रा अल्पनिद्रा और प्रलयकालीन महानिद्रा कहलाएगी।यह मेरी अल्पनिद्रा मेरे भक्तों के लिए परम मंगलकारी रहेगी। इस दौरान जो भी भक्त मेरे शयन की भावना कर मेरी सेवा करेंगे, मैं उनके घर तुम्हारे समेत निवास करुंगा।
प्राचीन कथाओं के अनुसार एक समय संखासुर नामक राक्षस ने त्रिलोक पर अपना अधिपत्य जमा लिया था जिसके बाद डरे हुए देवतागण भगवान् श्री हरी के पास पहुचे और स्तुति कर उन्हें जगाया,जिसके बाद भगवान् श्री हरी ने सारा वृतांत सुनने के बाद उन्हें आश्वस्त किया,इसी बीच संखासुर ने देवताओं को कमज़ोर करने के लिए देवताओं के शक्ति के स्त्रोत वेद मंत्रो के हरण का प्रयास करने का प्रयास करने लगा जिस से वेद मंत्रो ने स्वयं को जल में सुरक्षित कर लिया लेकिन संखासुर को इस बात की  यह जानकारी मिल गयी की वेदमन्त्र जल में प्रवेश कर गए है तो उसने मछली का रूप धर के जल में वेदमंत्रो को ढूंढना शुरू कर दिया जिसके बाद भगवान् श्री हरी ने दिव्य नेत्रों से संखासुर का पता लगाया और स्वयं भी मत्स्य अवतार धारण कर संखासुर का वध कर दिया और वेद मंत्रो की रक्षा कर देवताओं को उनका वैभव लौटाया चूंकि इसी तिथि में भगवान योग निद्रा से जागे थे इसलिए इस तिथि को देवोत्थानी एकादशी के रूप में भी जाना जाता है |
तुलसी विवाह
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को तुलसी पूजन का उत्सव पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है। कहा जाता है कि कार्तिक मास मे जो मनुष्य तुलसी का विवाह भगवान से करते हैं, उनके पिछलों जन्मो के सब पाप नष्ट हो जाते हैं। तुलसी के पौधे को राजस्थान में इतना पवित्र माना गया है कि इसके बिना घर को पूर्ण नहीं कहा जा सकता। तुलसी का पौधा घर में घर के किसी सदस्य की भाँति रहता है। घर के आँगन में तुलसी के पौधे के लिए विशेष स्थान बना होता है, जहाँ इसकी नित्य प्रतिदिन पूजा की जाती है। यहाँ तक कि घर में हर शुभ मौके, पर्व व त्यौहार पर तुलसी के पौधे को भी नई चुनरी ओढ़ाई जाती है। तुलसी के पौधे के साथ और भी दिलचस्प रीति-रिवाज़, परंपराएँ जुड़ी हैं। यहाँ तुलसी को घर में बेटी की तरह रखा जाता है और एक दिन इसकी भी बेटी की ही तरह घर से डोली भी उठती है। जी हाँ यह शादी बिल्कुल घर की किसी बेटी की ही तरह होती है। फ़र्क इतना होता है कि यहाँ दूल्हे के रूप में गाँव के मंदिर के भगवान आते हैं और उत्साह से सराबोर बाराती होते हैं गाँव के ही बाशिंदे।
कार्तिक मास में स्नान करने वाले स्त्रियाँ कार्तिक शुक्ल एकादशी का शालिग्राम और तुलसी का विवाह रचाती है । समस्त विधि विधान पुर्वक गाजे बाजे के साथ एक सुन्दर मण्डप के नीचे यह कार्य सम्पन्न होता है। विवाह के समय स्त्रियाँ गीत तथा भजन गाती है ।

मगन भई तुलसी राम गुन गाइके मगन भई तुलसी ।
सब कोऊ चली डोली पालकी रथ जुडवाये के ।।
साधु चले पाँय पैया, चीटी सो बचाई के ।
मगन भई तुलसी राम गुन गाइके ।।
दरअसल, तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं। तुलसी विवाह के लिए कार्तिक शुक्ल की नवमी ठीक तिथि है। नवमी,दशमी व एकादशी को व्रत एवं पूजन कर अगले दिन तुलसी का पौधा किसी ब्राह्मण को देना शुभ होता है। लेकिन लोग एकादशी से पूर्णिमा तक तुलसी पूजन करके पांचवे दिन तुलसी का विवाह करते हैं। तुलसी विवाह की यही पद्धति बहुत प्रचलित है। शास्त्रों में कहा गया है कि जिन दंपत्तियों के संतान नहीं होती,वे जीवन में एक बार तुलसी का विवाह करके कन्यादान का पुण्य अवश्य प्राप्त करें। तुलसी की शादी में भेंट देना भी बहुत पुण्य का काम माना जाता है, इसलिए कोई पीछे नहीं रहता। सब इसे अपने घर का ही काम मानते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि धर्म के इस काम में किसी के रूठने-मनाने की कोई गुंजाइश नहीं रहती, इसलिए आम शादियों में अपना रुतबा दिखाने और ख़ास ख़ातिर की इच्छा रखनेवाले रिश्तेदार भी तुलसी की शादी में बर्ताव के मामले में नरम ही नज़र आते हैं।भीष्म पंचकयह व्रत कार्तिक शुक्ल एकादशी से प्रारम्भ होकर पूर्णिमा तक चलता है, लिहाजा इसे भीष्म पंचक कहा जाता है। कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियाँ या पुरूष निराहार रहकर व्रत करते हैं। विधानः ”ऊँ नमो भगवने वासुदेवाय“ मंत्र से भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है । पाँच दिनों तक लगातार घी का दीपक जलता रहना चाहिए। “ ”ऊँ विष्णुवे नमः स्वाहा“ मंत्र से घी, तिल और जौ की १०८ आहुतियां देते हुए हवन करना चाहिए।कथामहाभारत का युद्ध समाप्त होने पर जिस समय भीष्म पितामह सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा मे शरशैया पर  शयन कर रहे थे। तक भगवान कृष्ण पाँचो पांडवों को साथ लेकर उनके पास गये थे। ठीक अवसर मानकर युधिष्ठर ने भीष्म पितामह से उपदेश देने का आग्रह किया। भीष्म ने पाँच दिनो तक राज धर्म, वर्णधर्म मोक्षधर्म आदि पर उपदेश दिया था । उनका उपदेश सुनकर श्रीकृष्ण सन्तुष्ट हुए और बोले, ”पितामह! आपने शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक पाँच दिनों में जो धर्ममय उपदेश दिया है उससे मुझे बडी प्रसन्नता हुई है। मैं इसकी स्मृति में आपके नाम पर भीष्म पंचक व्रत स्थापित करता हूँ । जो लोग इसे करेंगे वे जीवन भर विविध सुख भोगकर अन्त में मोक्ष प्राप्त करेंगे।(लेखक भारत संस्कृति न्यास नई दिल्ली के संस्थापक एवं अध्यक्ष हैं)