उन्नति का, आत्म-कल्याण का एकमात्र सोपान सत्संगति ही है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार। चित्त के स्थायी समाधान का मार्ग है – आत्म-निरीक्षण एवं इंद्रीय संयम। अतः अन्त:करण परिष्कार निमित्त स्वाध्याय, सन्त सन्निधि एवं सत्संग ही कल्याणकारक है…! सत्य तक पहुंचने का मार्ग है – उपनिषद। ये आत्मनिरीक्षण के रास्ते आत्मा की खोज का रास्ता बताते हैं। ये हमें अपने मन की शुद्धि के तौर-तरीके से अवगत कराते हैं। ब्रह्मसूत्र को केंद्र में रखकर वह आत्मा और परमात्मा के संबंध के विभिन्न आयामों और सूत्रों की पड़ताल करते हैं। आत्मनिरीक्षण से मन को पवित्र करें। भगवान बुद्ध की शिक्षा का चरमबिंदु है – आत्मनिरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि। उत्साह, आत्मनिर्भरता और आत्मनिरीक्षण के बिना सफलता नहीं पाई जा सकती है। उत्साह+आत्मनिर्भरता+आत्मनिरीक्षण का परिणाम है – सफलता। पूज्य “आचार्यश्री” जी कहा करते हैं कि सकारात्मक सोच स्वस्थ शरीर की जननी है। यदि कोई व्यक्ति अपने मन पर नियंत्रण कर ले तो उसे आत्मज्ञान का रास्ता मिल जाता है। आत्मसंयम के पथिकों को प्रतिदिन अपना आत्मनिरीक्षण करते रहना आवश्यक है। अपने विचारों तथा कृत्यों के बारे में सदैव सूक्ष्म निरीक्षण करते रहना चाहिए। विचारों तथा कार्यों का परस्पर घनिष्ट सम्बन्ध होता है, जैसे विचार होंगे वे ही क्रिया के रूप में परिणित होंगे। इसलिए बुरी विचारधारा से सदैव बचना चाहिए….।

“आचार्यश्री” ने कहा अनुकूल काल में तो सब अनुकूलता का व्यवहार करते हैं, किन्तु महानता तो तब है जब कोई प्रतिकूल काल में अनुकूलता बनाए रखे। विपरीत परिस्थितियां हमेशा आत्मनिरीक्षण के लिए अवसर प्रस्तुत करती हैं। अगर कोई व्यक्ति अपने मन पर नियंत्रण कर ले तो उसे आत्मज्ञान का रास्ता मिल जाता है। जब आपको आनंद का अनुभव हो तो समझिए कि आप आत्मचिंतन कर रहे हैं और जब डर, चिंता, नाराजगी – जैसे भाव आने लगे, तो समझिए कि आप आत्मचिंतन से बाहर आ गए हैं और आप वस्तु चिंतन कर रहे हैं, क्योंकि इन भावनाओं की उत्पत्ति का कारण ही वस्तु-चिंतन है और वस्तु चिंतन कुंठा एवं मानसिक स्थिति ठीक न होने के कारण होता है। इससे न सिर्फ सफलता की राह में रूकावट आती हैं, बल्कि आपके शरीर को कहीं न कहीं नुकसान भी पहुंचता है। साधना में नियम और संयम होना बहुत जरूरी है। अपनी शारीरिक, मानसिक शक्तियों और संपदाओं का अनावश्यक रूप से जहाँ अपव्यय हो रहा हो वहाँ से उसे रोक कर आत्मिक प्रयोजनों में लगाना संयम का उद्देश्य है। संयम का तात्पर्य यह है कि बची हुई शक्तियों को शारीरिक कार्यों से समेटकर आध्यात्मिक कार्यों में लगाया जाए। जो समय, जो धन, जो बुद्धि संयम के द्वारा बचाई गई है उसे सत्कार्य में, परमार्थ में लगाया जाए तो ही उससे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है…।

“आचार्यश्री” ने कहा जब तक मनुष्य आत्मनिरीक्षण या आत्म-विश्लेषण नहीं करता तब तक वह प्रभु को प्राप्त नहीं कर सकता। ईश्वर प्राप्ति के लिए ईर्ष्या द्वेष आदि कुटिल भावनाओं का त्याग नितांत आवश्यक है। जीवन का प्रत्येक पल अंतहीन संभावनाओं से भरा हुआ है। स्वयं में समाहित अनन्त और विराटता को उजागर करने के लिए स्वयं के प्रति सचेत रहने में ही जीवन की सार्थकता निहित है। स्वर्ग से ऊपर चमकते सूर्य से भी अधिक प्रकाशवान हमारी अंत: प्रज्ञा है। आत्मानुभूति के पश्चात् साधक स्वर्ग की सापेक्ष धारणा से ऊपर उठ जाता है। यदि हम महापुरुषों का जीवन देखें तो स्वीकार करेंगे कि वे सदैव आत्मनिरीक्षण करते थे। उनकी प्रत्येक भूल उन्हें नवीन सुधार की ओर प्रेरित करती थी। यदि हममें महान बनने की चाहत उठे तो दूसरे को कमजोर समझने की भावना त्याज्य करनी होगी। प्रयास हो कि दूसरों की त्रुटियां देखने की अपेक्षा अपनी कमियां तलाशें। प्रभु ने हमें विभूति-विरासत सौंपते समय विश्वास किया था कि इनका दुरुपयोग कभी न होगा। जो शक्ति हमारे भीतर है उससे कहीं अधिक शक्ति पहले से विद्यमान है…।

‘आचार्यश्री” ने कहा – सत्संग, हरि कथा ईश्वर का साकार रूप है… सत्संग से असंगता, असंगता से मोह का नाश, निर्मोह की स्थिति से चित्त की निश्चलता अर्थात स्थिरता और चित्त के स्थिर होने पर जीवन्मुक्ति की प्राप्ति होती है। जीवनमुक्ति ही अध्यात्म की सर्वोच्च स्थिति है। मनुष्य जीवन अनमोल है तथा क्षण मात्र का सत्संग भी संसार में अत्यंत दुर्लभ है। तपस्या अपनी जगह श्रेष्ठ है, परंतु जीवन में दया और सत्संग का अपना महत्व है। मन को विषयों के विष से बचाना चाहिए, क्योंकि हम सभी ऋषियों की संतान हैं। अनेक जन्मों के पुण्य हो तभी महापुरुषों का सत्संग प्राप्त होता है। स्वाध्याय से स्वयं को जानना और मन को रूपांतरित करना ही जीवन की धन्यता अर्जित करना है। ईश्वर में विश्वास और समर्पण से ही जीवन में सुख और शांति बढ़ती है। निर्मल बुद्धि और श्रम में श्रद्धा, यही दो वस्तुएं तो किसी मनुष्य को महान बनाने वाली हैं। अत: उन्नति का, आत्म-कल्याण का एकमात्र सोपान सत्संगति ही है। मानव को सज्जन पुरुषों के सत्संग में ही रहकर अपनी जीवन रूपी नौका संसार रूपी भवसागर से पार लगानी चाहिए। तभी वह आदर और भगवत प्राप्ति के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है….।