देश को सोचने की जरुरत है कि ‘राष्ट्र समर्थ व सषक्त कैसे बने – आचार्य सुधांषु जी महाराज

नई दिल्ली। भारतवर्ष की आजादी की 70वीं वर्षगांठ हम-सब मंगलवार-15 अगस्त को मना रहे हैं। इन 70 सालों में देश ने बहुत कुछ पाया और बहुत कुछ खोया भी। भौतिक क्षेत्र में विकास खूब हुआ लेकिन सांस्कृतिक विकास के मामले में हम खूब पीछे हुए। संस्कृत मद्धिम हुई, संस्कृति कमजोर हुई। व्यक्ति दीर्घजीवी बना लेकिन परिवार कमजोर हुए। परिवारों की कमजोरी ने समाज को रुग्ण बनाया। जब समाज और सामाजिक तानाबाना कमजोर हो तो राष्ट्र मजबूत कैसे बने? मित्रों! राष्ट्र को मजबूती देने के लिए समाज को सुदृढ़ बनाना होगा और समाज को मजबूती देने हेतु परिवार की निर्बलता को सबलता में बदलना होगा। समुन्नत, समृद्ध और सुखी राष्ट्र बनाने के लिए इसके सिवाय दूसरा कोई चारा है ही नहीं। प्रस्तुत स्वाधीनता दिवस पर आइये! थोड़ा ठहरकर इस बात पर विचार अवश्य करें।

व्यक्ति से परिवार बनते हैं, परिवार से समाज का निर्माण होता है और समाज से राष्ट्र का विनिर्माण होता है। सबके मूल में है ‘व्यक्ति’। ढेरों सुधारों की प्रक्रिया एवं विकास की बहुविधि धारणाओं और अवधारणाओं के बीच हमें यह ध्यान रखना होगा कि व्यक्ति का सही निर्माण हुए बिना न तो श्रेष्ठ परिवार का निर्माण एवं विकास सम्भव है और न ही समाज व राष्ट्र का सशक्तिकरण। ‘हम बदलें तो युग बदले’ की अवधारणा के महत्व को नजरअंदाज करने की गलती को अब बिना देर किये ठीक करना होगा।

इसके लिए संस्कार व्यवस्था के साथ-साथ संस्कृति की विविध धाराओं में आ गये विकारों को दूर करने का समय अब आ गया है। साथ ही समृद्ध और सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए देशवासियों को प्रचण्ड पुरुषार्थ, कर्मठता, चारित्रिक निष्ठा, सच्चरित्रता, राष्ट्रीय अनुशासन, उत्कृष्टवादी जीवन दर्शन, सहयोग-सहकार, मूर्धन्य सहकारिता, नैतिक मर्यादा, कर्तव्य-धर्म, कथनी व करनी की समानता, तात्कालिक नहीं बल्कि दूरवर्ती हितों को प्रश्रय, व्यक्तिवाद नहीं वरन् समूहवाद, सशक्त संविधान, कानून का सख्ती से पालन, राष्ट्रनिष्ठा ही ईश्वरनिष्ठा जैसे जीवन मन्त्रों को अपनाना होगा।

आज हमारे देश को आजाद हुए 70 वर्ष हो गये हैं। लाखों लोगों ने अपने को इसी आजादी के लिए बलिदान किया था, परिवार छोड़े थे, अपनों को खोया था, अपने जमे-जमाये कारोबार की शहादत दे दी थी, बड़े-बड़े पदों को लात मारी थी और राष्ट-देवता की बलिवेदी पर कुर्बान हो गये थे। इतनी बड़ी कीमत अदा करने के बाद भी जब हम हिन्दुस्तान के स्कूलों से हिन्दी को गायब पाते हैं, संस्कृत की भारी उपेक्षा देखते हैं, किसानों को सभी ओर से कमजोर पाते हैं, गायों को मरता हुआ पाते हैं, वाणी और लेखनी को परावलम्बन की त्रासदी से जकड़ा पाते हैं, अनेक देशवासियों को आर्थिक दासता से ग्रसित देखते हैं तथा नैतिक व सांस्कृतिक मूल्यों की गिरावट के दर्शन स्थान-स्थान पर होते हैं; तब लगता है कि भारत में एक सांस्कृतिक क्रान्ति की और आवश्यकता है। मैं तो कहूँगा कि इस राष्ट्र को नेताओं के साथ-साथ सृजेताओं की अधिक आवश्यकता है। इसके लिए धर्मतन्त्र व राजतन्त्र का सहगमन बहुत जरूरी है, क्योंकि इसके बिना एक आदर्शवादी राष्ट्र का निर्माण हो ही नहीं सकता।

यह कृतज्ञ राष्ट्र स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिवीरों और सत्याग्रहियों दोनों का सदैव ऋणी रहेगा। उन महावीरों के नाममात्र ही यदि लिखे जायें तो पूरा का पूरा ग्रन्थ भर जायेगा। युग के प्रवाह को मोड़ने में साहसी, मनोबली एवं प्रतिभावान व्यक्तियों की विशिष्ट भूमिका होती है। महाकाल ने काल के कपाल पर उन दिनों ऐसा कुछ लेख लिखा कि ऐसे वीर-बहादुरों का अवतरण वीर-प्रसूता माताओं की कोख से तेजी से हुआ। इन शरीरधारियों ने अपनी अलग-अलग भूमिकाओं को चुना। किसी ने कलम पकड़ी तो किसी ने हथियार, किसी ने सत्याग्रह चुना तो किसी ने संघर्ष। आजादी के मतवाले नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने तो हिन्दुस्तान के बाहर जाकर कई देशों में स्वतंत्र भारत के रूप में अपने देश को मान्यता दिला दी और उन्हें सहमत कर लिया। 15 अगस्त 1947 को नई दिल्ली में हमारा तिरंगा आजाद भारत में बाद में फहरा, उन्होंने वर्ष 1943 में ही राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया था। ऐसे परमवीर की स्वाधीन भारत ने यद्यपि उपेक्षा की, लेकिन यह कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें एक दिन के लिए भी भुला न सका।

जीवन तो सभी जीते हैं लेकिन पेट-प्रजनन से ऊपर उठकर संस्कृति, समाज और राष्ट्र की बलिवेदी पर चढ़ जाने वाले लोग अपना नाम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में अंकित कराकर अमर हो जाते हैं। स्वतन्त्र भारत के चमकते शिलालेख पर चन्द्र शेखर आजाद जैसे महावीर के अमिट हस्ताक्षर को कौन मिटा सकता है, जिन्होंने गरीबी के कारण भूख से त्रस्त अपने माता-पिता की आर्थिक सहायता करने का सुझाव देने पर अपने साथी से कहा था- ‘‘मैं अपने माता-पिता के सीने में गोली मारकर उनके जीवन का तो अन्त कर सकता हूँ, लेकिन देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों से लूटे गये धन में से एक पाई भी उन्हें नहीं दे सकता। ऐसे महामानव और ऐसी देवियाँ, जो भारत को स्वाधीन कराने के लिए मरकर भी अमर हो गये, के जीवन हमें सत्पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं। आज जरूरत है कि स्वतंत्र भारत के हम-सब लोग ज्ञात-अज्ञात उन सभी वीर-बलिदानियों की राष्ट्र श्रद्धा, सर्मपण, त्याग को याद करें और उस तरह का भारत निर्माण करने को उद्यत हों, जैसा उन्होंने चाहा था।

स्वाधीनता दिवस पर विश्व जागृति मिशन परिवार की सभी स्वातंत्र्य वीरों को भावभरी श्रद्धांजलि।

-लेखक विष्व जागृति मिषन के संस्थापक हैं।