दिल्ली के कालका में प्रकट हुई थीं मां भगवती ‘महाकाली

दिल्ली/ देव गुर्जर। अरावली पर्वत श्रृंखला के सूर्यकूट पर्वत पर विराजमान कालकाजी मंदिर के नाम से विख्यात ‘कालिका मंदिर’ देश में सबसे अधिक भ्रमण किये जाने वाले प्राचीन एवं श्रद्धेय मंदिरों में से एक है। यह मंदिर माँ दुर्गा की अवतार औऱ देवी काली को समर्पित है। यहां आने वाले हर भक्त की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं इसी लिये इसे मनोकामना सिद्ध पीठ के नाम से भी जाना जाता है।

3000 साल पुराना है कालका मंदिर का इतिहास
कालका जी मंदिर साधारण ¨हिंदू मंदिर की तरह दिखता है लेकिन यह एक पुरातन मंदिर है। इसका इतिहास 3000 वर्ष पुराना है। मान्यता है कि यमुना किनारे बसे दिल्ली शहर को महाभारत काल में इन्द्रप्रस्थ के नाम से जाना जाता था। इन्द्रप्रस्थ की स्थापना के समय सभी पाण्डवों सहित महाराज युधिष्ठिर तथा भगवान श्री कृष्ण ने सूर्यकूट पर्वत पर स्थित इस सिद्ध पीठ में माता की अर्चना की थी। कालान्तर में यह स्थान जयन्ती काली के सिद्ध पीठ के नाम से विख्यात हुआ। इस मन्दिर को पांडवों ने काली मां की पूजा-अर्चना के लिए बनाया था।

मां कालका की पौराणिक मान्यता
कालका पीठाधीश्वर सुरेंद्र नाथ अवधूत ने बताया कि इस मंदिर की पौराणिक मान्यता है जिस समय माता कालाकाजी में मन्दिर का निर्माण हो रहा था। तो ऐसा अनुभव किया गया कि इस स्थान से शिवालय को हटा दिया जाए। इस उद्देश्य से शिवलिंग को खोद कर निकालने का प्रयास किया गया तो बहुत गहराई तक खोदने पर भी शिवलिंग का कोई सिरा नहीं मिला और उसको निकालना सम्भव नहीं हो सका, और भवन निर्माण कार्य ठप्प हो गया। ऐसी स्थिति में भवन निर्माताओं ने माता जी को मनाने के लिए कई धार्मिक अनुष्ठान किए, जिससे माता ने प्रसन्न होकर भवन निर्माण कर्ताओं को स्वप्न में यह आदेश दिया कि मेरे भवन को बनाने से पहले यह शिव मंदिर यहीं बनना है। इसलिए ऐसा किया गया तो माता का भवन शीघ्र तैयार हो गया और किसी भी तरह की रुकावट सामने नहीं आई।

देवों की रक्षा करना चाहती थीं मां कालका
पौराणिक मान्यता है कि देवी काली का जन्म देवी पार्वती से हुआ था, शताब्दियों पूर्व प्राचीन काल में माता इस स्थान पर स्वयं प्रकट हुई, जो राक्षसों की बड़ी संख्या से अन्य देवताओं की रक्षा करना चाहती थीं। देवी ने यहाँ निवास के रूप में जगह ली तबसे यही स्वयंभू प्रतिमा इस भवन में विराजमान है। इस प्रकार यह स्थान एक मंदिर के रूप में उभरा।

महाराजा सूरजमल ने भवन का निर्माण करवाया था
कहा जाता है कि भरतपुर के महाराजा सूरजमल ने श्रावण शुक्ल ५ सम्वत् १७६८ वि. को दिल्ली विजय के पूर्व मां भगवती की पूजा की थी और विजय के पश्चात् भवन का निर्माण करवाया और कई धर्मशालाएं और चबूतरे बनवाए। भवन के चारों ओर जो बावली, तालाब और इमारतों के खण्डहर मिलते हैं। उससे पता चलता है कि माता का यह स्थान बहुत प्राचीन है और यहां हर युग में भवन निर्माण और उनकी मरम्मत का कार्य चलता रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि इस भवन का निर्माण महाराज अनंगपाल के द्वारा कराया गया था। संस्कृत साहित्य कालका माई की वन्दना करते हुए लिखा है…. श्री कालिके शुभदे देवि, सूर्यकूट निवालिनी,,, त्वम् देवि महामये, विश्वरुपे, नमोस्तुते….
पूर्वोत्तर से इस भवन का संचालन कालका सिद्ध पीठ समिति करती है मातृ भक्तों की परम्परा में यहां के पूजारियों का नाम यहां सर्वाधिक प्रसिद्ध है कहा जाता है कि यहां एक गांव था जहां लगभग ५०० ब्राह्मण परिवार रहते थे। बाद में जब यहां माता का मन्दिर बना तो उस गांव के सभी ब्राह्मणों ने माता की सेवा पर अपना युगों युगों का समय बिता दिया।

कालका मंदिर की ऐतिहासिक मान्यता
वरिष्ठ इतिहासकार अम्बुजेश शुक्ल बताते हैं कि इस मंदिर के ऐतिहासिक पहलू भी हैं साल 1737 में तत्कालीन मुगल बादशाह मोहम्मद शाह के शासन में पेशवा ने जब दिल्ली को हथियाने के लिए जोरदार धावा बोला, तब इसी मंदिर मे पेशवा की फौज रुकी थी। शाह ने उसे रोकने के लिए तुरंत दो फौजी टुकड़ियां, क्रमश: सादत खां व मीर बख्शी के नेतृत्व में भेजीं। योजना थी कि टुकड़ियां पेशवा के जत्थे को मथुरा-वृंदावन के बीच घेर लेंगी, लेकिन पेशवा की फौज उनके वहां पहुंचने से पहले ही कूच कर गई। तेजी से पेशवा ने दिल्ली के बाहर बने कालकाजी मंदिर पर अपना डेरा डाल दिया। शाह की भेजी टुकड़ियां पीछा करती कालकाजी मंदिर के पास जा पहुंचीं। पेशवा अपनी फौज के साथ तालकटोरा गार्डन के जंगल की ओर खिसक गया। बाजीराव का दिल्ली हथियाने का सपना तो पूरा नहीं हुआ। लेकिन उसने 700 मुगल सैनिकों व इंफेंटरी का खास नुकसान जरूर पहुचाया। इसी प्रकार 1805 में जसवंत राव होल्कर ने भी दिल्ली पर धावा बोलते हुए कालकाजी मंदिर के प्रांगण में अपना डेरा डाला था। 1857 के गदर व 1947 के भारत-पाक बंटवारे के समय में भी यह मंदिर ¨हिदुओं की गतिविधियों का सक्रिय केंद्र था।

हजारों की तादाद में उमड़ते हैं श्रद्धालु,
इस सिद्ध पीठ में माता का स्मरण, ध्यान, पूजा उपासना, कीर्तनजागरण युगों से होता आया है और युगों से माता अपने भक्तों की मनोकामना की पूर्ति करती आ रही हैं। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहां पर पुष्प माला, प्रसाद, नारियल एवं चुन्नी आदि चढ़ाकर अपनी कामना पूरी करने हेतु मां कालका को अर्पण करते हैं। इस मन्दिर में कोई जातिवाद एवं ऊंच नीच आदि का भेदभाव नहीं है। यहां पर हर जाति के भक्त अपनी मनोकामना और श्रद्धा लिए मां के दरबार में जाते हैं। दर्शन के बाद श्रद्धा पूर्वक सभी भक्तों को माता का प्रसाद वितरित किया जाता है। इस सिद्ध पीठ पर भक्तों की भारी भीड़ साल के दो नवरात्रों में होती है। एक चैत की नवरात्रि में तथा दूसरा असोज की नवरात्रि में नवरात्रि के दौरान यहां पर बहुत बड़ा मेला लगता है जिसका यहां के पुजारी और पुलिस प्रशासन बड़ी सरलता से उचित प्रबंध करते हैं जिससे भक्तों को किसी भी प्रकार की असुविधा नहीं होती। कहा जाता है कि इस सिद्ध पीठ में मां के मंत्र का जाप चलता रहता है।

सुबह 4 से लेकर रात्रि के 11 बजे तक खुला रहता है मंदिर 

मंदिर प्रशासन के अनुसार मां कालका जी का मन्दिर प्रतिदिन प्रात चार बजे से रात्रि ग्यारह बजे तक सभी भक्तों के लिए खुला रहता है। यहां प्रात और सायंकाल दोनों समय माता की आरती होती है और दिन में पूर्वान्ह दस बजे से ग्यारह बजे की अवधि में माता को भोग लगाया जाता है दोपहर ३ बजे से चार बजे तक भवन की सफाई का कार्यक्रम चलता है. मां कालका के दरबार में लोग अपनी अपनी मुरादे लिए जाते हैं यहां पर मां के मंदिर के बगल में एक हवन कुंड है जिसका महत्व है महाभारत काल से ही है।

मंदिर में कुल 36 दरवाजे हैं
यह मंदिर ईटों की चिनाई द्वारा बनाया गया था परन्तु वर्तमान में यह संगमरमर से सजा है एवं यह चारों ओर से पिरामिड के आकार वाले स्तंभ से घिरा हुआ है। माता का यह भवन अष्ठकोण पर तान्त्रिक विधि का बना हुआ है ये भारत में इकलौता ऐसा मन्दिर है जहां तांत्रिक और सात्विक दोनो तरह की पूजा होती है। इसमें १२ दरवाजे हैं और बाहर की परिक्रमा में ३६ दरवाजे हैं। मन्दिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा में है। मन्दिर के मुख्य द्वार के दाहिनी ओर बाहरी परिक्रमा से सटा हुआ एक छोटा सा शिवालय है। इस मंदिर के उत्तर दिशा में गणेश जी की मूर्ति है। पीछे कुछ दूरी पर भैरवजी तथा हनुमान जी के मन्दिर हैं।

सभी संस्कार होते हैं यहां
इसी हवन कुंड के बगल में बच्चों के मुंडन भी होते हैं जिसके लिए नाई मुंडन करने से पहले मां कालका की विनती करता है और फिर मुंडन करता है मुंडन के बाद सिर से उतारे गए बाल मां कालका के नाम पर चढ़ा दिया जाता है फिर बच्चे के सिर पर मनोकामना वृति बनाकर हल्दी से सिर पर लेप कर दिया जाता है मां कालका मन्दिर के उपरी हिस्से पर लोगों को परिक्रमा करने की व्यवस्था की गई है जहां भक्त परिक्रमा करते हैं और मां से अपनी मनोकामनाओं की प्रार्थना करते हैं

मन्नत के लिए बांधे जाते हैं सिक्के और धागे
यहां भक्त अपनी मनोकामना के लिए मां के मंदिर के दिवार पर सिक्के चिपकाते हैं कुछ भक्त धागे बांधकर मां से मन्नत मांगते हैं मान्यता है कि मां कालका के दर्शन के साथ साथ नेहरू प्लेस में स्थित बटुक भैरव महाराज के दर्शन करना जरूरी होता हैं ऐसा कहा जाता है कि माता ने अपने दर्शन के बाद भैरव जी के दर्शन का वरदान दिया था मां ने कहा था कि जो भी भक्त कालका के दर्शन के बाद बटुक भैरव के दर्शन करेगा तो उसकी हर मनोकामना पूरी होगी। मां कालका के एक भक्त की कहानी भी यहां पर बहुत प्रसिद्ध है, कहा जाता है कि मां कालका के एक भक्त ने मां की भक्ति में अपना सिर काटकर मां को चढाया था जिसके बाद मां कालका के दर्शन के बाद यहां भक्तों का दर्शन करना जरूरी माना जाता है