क्रोध के कारण संघर्ष एवं कलह का वातावरण बनता है-अवधेशानंद गिरि जी महाराज

हरिद्वार। जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि जी महाराज ने कहा कि अनियंत्रित कामना, अक्षमतता और अज्ञानता की उत्पत्ति है – क्रोध। अतः विवेक द्वारा आत्मनियंत्रण एवं अंतर्मुखी अवस्था अर्जित की जा सकती है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया है कि क्रोध से अविवेक एवं मोह होता है, मोह से स्मृति का भ्रम होता है तथा बुद्धि के नाश हो जाने से आदमी कहीं का नहीं रह जाता। सामाजिक जीवन में राग के कारण लोभ एवं काम की तथा द्वेष के कारण क्रोध एवं बैर की वृत्तियों का संचार होता है। क्रोध के कारण संघर्ष एवं कलह का वातावरण बनता है। क्रोध में अहंकार एक उर्वरक का काम करता है। इस दृष्टि से क्रोध एवं अहंकार एक दूसरे के पूरक हैं। अहंकार से क्रोध उपजता है तथा क्रोध का अहंकार के कारण विकास होता है। क्रोधी मनुष्य तप्त लौह पिंड के समान अंदर ही अंदर दहकता एवं जलता रहता है। उसकी मानसिक शान्ति नष्ट हो जाती है। विवेकपूर्ण कार्य करने की स्थिति समाप्त हो जाती है। क्रोध के कारण कोई व्यक्ति दूसरे का उतना अहित नहीं कर पाता, जितना अहित वह स्वयं अपना कर लेता है। क्रोध में विनय तथा समता की भावना नष्ट हो जाती है। समता की भावना का विकास होने पर अहंकार उत्पन्न नहीं होता तथा क्रोध का पौधा मुरझाने लगता है। इसका कारण यह है कि आत्मतुल्यता की चेतना से सम्पन्न व्यक्ति दूसरों के व्यवहार तथा आचरण से व्यक्तिगत धरातल पर अशांति का अनुभव नहीं करता। पूज्य “आचार्यश्री” जी कहा करते हैं कि शांति से क्रोध को जीतें, मृदुता से अभिमान को जीतें, सरलता से माया को जीतें तथा संतोष से लाभ को जीतें…।

“आचार्यश्री” ने कहा विवेक का सदुपयोग करने से ज्ञान, वैराग्य और भक्ति – तीनों प्राप्त होते हैं। जो आप अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के प्रति न करें। विवेक ही मनुष्य का सच्चा मार्गदर्शक है। शरीर और शरीरी को अलग-अलग जानना विवेक है। यह विवेक हमें तो है, परन्तु हम इसका आदर नहीं करते। विवेक तो है बस हमें केवल उसकी तरफ लक्ष्य करना है, उसको महत्व देना है। गीता का आरम्भ भी शरीर-शरीरी के विवेक से हुआ है। इसी को महत्व देना है, स्वीकार करना है एवं इस पर दृढ़ रहना है। शरीर का सम्बन्ध अविवेकजन्य है। शरीर मैं नहीं हूँ, शरीर मेरा नहीं है और शरीर मेरे लिए नहीं है – ऐसा अनुभव करना है। और, इसका ठीक अनुभव होने को तत्वज्ञान कहते हैं। शरीर के साथ भूल से बने हुए सम्बन्ध को मिटाना ही सत्संग है। विवेक में अभ्यास नहीं होता, प्रत्युत विचार होता है। विवेक के सदुपयोग से संसार मे कुछ भी असंभव नही। मनुष्य नये-नये सृजन करता है और प्रकृति एवं ईश्वर उसे रोकते नहीँ, क्योंकि उन्हें उसमें सर्व सेवा का दर्शन होता है। विज्ञानमयी चेतना मनुष्य को विवेक के सदुपयोग हेतु मिली है। परन्तु, युगों की पशुता कुछ क्षण में विस्मृत नहीं होती। मानव समर्थ है अनेकों जीव की सेवा हेतु, परन्तु वह स्वार्थ के वशीभूत सेवा तो दूर जीव और उसके अधिकारों का भक्षण ही करने को आतुर रहता है। हमारे घरों में जितना खाद्य पदार्थ व्यर्थ होता उतने में तो असंख्य जीव तृप्त हो सकते हैं और दूसरों को तृप्त करने का सामर्थ्य विशेष गुण मानव में है। व्यक्ति स्वयं कितना ही महंगा भोजन करें उसे आंतरिक सुख नहीं मिलता, अपितु याचक को सुखी रोटी देते ही एक आंतरिक सन्तोष से हृदय प्रफुल्लित होने लगता। तब भी मानव समझता नहीं, मनुष्य जीवन का रहस्य। सेवा, यह मानव मात्र को ही प्राप्त है। सेवा सबसे बड़ा धर्म है और मानव मात्र की सेवा करने से ही सच्चे सुख की प्राप्ति होती है। विवेक का सदुपयोग कर हम मनुष्यता को अर्जित कर लें, मानव ही बन जाएं और अपने सभी रगड़े-झगड़ों को भुला दें, यही सच्चा धर्म होगा। अतः मानव धर्म ही सभी धर्मों का सार तत्व है…।