करूणा एवं अनुकंपा धर्म का महत्वपूर्ण अंग –  आचार्य लोकेश

चंडीगढ़/ असित अवस्थी। अहिंसा विश्व भारती के संस्थापक व प्रख्यात जैन आचार्य डा. लोकेश मुनि ने महाकरुणा दिवस एवं बौद्ध भिक्षु संघसेना के 60वें जन्मदिन पर पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ के लॉं ऑडिटोरियम मे आयोजित भव्य कार्यक्रम को संबोधित किया | आचार्य लोकेश ने कहा कि संसार के सभी धर्मों में अनुकम्पा, दया, करुणा का महत्वपूर्ण स्थान है | ये मानवता के उत्तम गुण हैं | करूणा हृदय में मृदुता एवं मधुरता का संचार करती है |

आचार्य लोकेश ने कहा कि जैन धर्म के 24 वें तीर्थांकर भगवान महावीर अनुकम्पा व सेवा को सर्वोच्च महत्त्व देते हुए कहते है कि जो “रोगी, ग्लान, बाल, शैक्ष की सेवा करता है वह मेरी सेवा करता है| भगवान महावीर की वाणी में दसवैकालिक आगम का श्लोकांश है “असंविभागी न हु तस्य मोक्खो”| अर्थात जिसका संविभाग की चेतना में विश्वास नहीं है, वह मोक्ष प्राप्त करने का अधिकारी नहीं हो सकता| जो पेट भरकर खाता  है और भाई भूखा सोया हो, उसके लिए मोक्ष के दरवाजे बंद है|

आचार्य लोकेश ने आगे कहा कि जैन और बौद्ध धर्म दोनों में अहिंसा, दया, प्रेम, क्षमा आदि मानवतावादी गुणों का महत्त्व है, जिनकी आज विश्व को जरूरत है| बौद्ध भिक्षु संघसेना ने करुणा दया और अनुकंपा जैसी मानव कल्याणकारी बातों को जन जन तक लेजाकर संतुलित  समाज निर्माण मे महत्वपूर्ण योगदान दिया है |

महाबौधि इंटरनेशनल के अध्यक्ष बौद्ध भिक्खु संघसेना ने इस अवसर पर कहा कि बौद्ध धर्म की महायान शाखा में महाकरूणा एवं महाशून्य – ये दो परम तत्व स्वीकार किये गए है| अपने शिशु को सीढियों से गिरते, लुढ़कते देखकर माता जैसे अपने प्राणों की परवाह नहीं करती हुई उसे बचाने हेतु दौड़ पड़ती है, उसी प्रकार जब व्यक्ति के ह्रदय में प्राणी मात्र के प्रति कारूण्य का आविर्भाव होता है, तब करूणा महाकरूणा में परिणत हो जाती है | महाशून्य बौद्ध दर्शन  के शून्यवाद के सिद्धांत का परमअतिशायी रूप ही है | ऐसा स्वीकार किया गया है कि महाकरूणा की आराधना से ही महाशून्य की प्राप्ति होती है|

इस अवसर पर बंगला साहिब गुरुद्वारा के चेयरमैन श्री परमजीत सिंह चंडोक,ब्रहमचारी दिनेश जी, ब्रहमकुमारी डा. बिन्नीसरीन, पंजाब विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो। राजकुमार एवं अनेक प्रख्यात लोग उपस्थित थे | मंच संचालन भिक्खु धमानन्दा ने किया |