“बच्चों को जैसा चाहो, ढाल लो, उन्हें सात्विक बनाना, तामसिक नहीं”- सुधांशु जी महाराज

नई दिल्ली। बच्चे सबसे ज्यादा लोचपूर्ण होते हैं। उनको आप किसी भी तरह से ढाल सकते हैं। बस वैसा ही वातावरण, वैसा ही भोजन, वैसे ही लोग, वैसे ही दृश्य, वैसे ही विचार बच्चे के आसपास उपलब्ध कराने होंगे। यह असम्भव नहीं है, बस थोड़े से प्रयास की ज़रूरत है।
आप बच्चे को सात्विक बनाना चाहो तो वह सात्विक हो जायेगा, राजसिक बनाना चाहो तो वह राजसिक हो जायेगा, तामसिक बनाना चाहो तो वह तामसिक बन जाएगा। ऐसे बच्चों को तो आपने देखा होगा ना? जो अपनी भाषा के सिवा दूसरी भाषा नहीं जानते, लेकिन उन्हें अन्य भाषा-भाषी बच्चे के साथ बिठा दें, थोड़ी देर में दोनों बच्चों में भाषा की समस्या ख़त्म हो जाएगी। वह इस तरह का व्यवहार करेंगे, जैसे वे बड़े समय से साथ रहते हों और आपस में ख़ूब परिचित हों।
हमने विदेश यात्रा के दौरान हवाई जहाज में बैठे हुये दो अलग-अलग देशों के परिवारों को देखा। उनमें दो बच्चे भी थे। एक फ्रेन्च और एक जर्मन। दोनों बच्चे एक दूसरे की भाषा नहीं जानते थे। मैं देखता हूँ कि एक बच्चा जो फ्रेंच था, वह जर्मन बच्चे की तरफ इशारा करता है- मेरे पास आ जा। दूसरे बच्चे को उसकी भाषा नहीं आती थी। वह पहले वाले की भाषा को नहीं समझ रहा था, तब तक हमने देखा कि पहले बच्चे ने कुछ बोलते हुए कुछ अलग ढंग से फिर संकेत किया कि तू मेरे समीप आ। दूसरा बच्चा जब फिर भी उसकी बात नहीं समझ पाया, तब पहला वाला बच्चा इशारा करते हुए कहता है कि मेरा निमंत्रण है कि हम दोनों खेलें। आगे उसने यह भी कहा कि तू मेरे पास आता है या मैं तेरे पास आऊँ। कुछ ही क्षण बाद हमने देखा कि दोनों बच्चे एक साथ बैठ गए, उनके अभिभावकों ने सीटें बदलकर उन्हें पास-पास सीट मुहैया कराई।
वास्तव में बच्चों का मन बहुत निर्मल होता है और ज़बरदस्त लोचपूर्ण भी। उस समय उनकी धाराएँ बहुत सात्विक होती हैं। उन्हें झुकने में भी कोई दिक़्क़त नहीं होती। दोनों बच्चों को आपस में मेलजोल करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। यह केवल और केवल सात्विक भावना के कारण सम्भव होता है। इससे स्पष्ट है कि बच्चे स्वभावत: सात्विक भावों से परिपूर्ण होते हैं। मैंने देखा कि एक ने इशारे में कहा कि तू थोड़ा झुकता है तो ठीक है, नहीं तो मैं अपनी गरदन झुकाने को तैयार हूँ। यह स्थिति हम बड़ों में  सहज देखने को नहीं मिलती।
मित्रों! जहाँ तामसिकता होती है, वहाँ ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिलते। मैं तेरे सामने नहीं झुकूँगा बल्कि तुझे झुकाऊँगा, अहंकार का यह विशाल रूप जहाँ दिखाई देने लग जाये, तो समझ लेना कि यह निरी तामसिकता है। यह तामसिकता वास्तव में हमारे भोजन, विचारों और आसपास के वातावरण से आती है। मैं कहूँगा कि जब भी ऐसी तामसिकता का अनुभव होने लगे, तब सबसे पहले अपना आहार ठीक करना। दूसरे चरण में रहन-सहन अर्थात् अपने इर्द-गिर्द का परिवेश व वातावरण तथा तीसरे चरण में अपना आचार एवं विचार ठीक कर लेना। ऐसा करने से तामसिकता शनै: शनै: सात्विकता में बदलने लगेगी। बच्चों के मामले में तो यह कार्य बेहद सरल है, बस हम उनको वैसा ही वातावरण उनके सम्पर्क क्षेत्र में दे दें। वे तो गीली मिट्टी की भाँति हैं, जिससे जो चीज़ चाहो, बना सकते हो।
लेखक विश्व जागृति मिशन के संस्थापक हैं।