दान, दया, अहिंसा, प्रेम, शांति आदि गुण करुणा से जुड़कर ही बनते हैं-अवधेशानंद गिरि जी महाराज

हरिद्वार। जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि जी महाराज ने कहा कि जिस अन्त:करण में करुणा, प्रेम और समता समाई है; वहाँ ईश्वरीय-अनुग्रह, देव-कृपा और सन्त-आशीष स्थिर रहते हैं..! करुणा निर्मल हृदय के भावों से संबंधित है। करुणा की कोख से जन्म लेकर ही सारे गुण सद्गुण का रूप लेते हैं। दान, दया, अहिंसा, प्रेम, शांति आदि गुण करुणा से जुड़कर ही बनते हैं। करुणा के स्पर्श के बिना दया और दान प्रदर्शन बनकर अहंकार की पुष्टि करते हैं। करुणा के बिना जीवन कृत्रिम, पाखंड और नीरस है। लंबी साधना के बाद जब गौतम सिद्धार्थ के मन में करुणा जगी तो वह भगवान बुद्घ बन गए। उनकी साधना का लक्ष्य व्यक्तिगत निर्वाण न होकर सर्वगत कल्याण था, जिसकी यात्रा आत्म-कल्याण के आगे लोक-कल्याण तक चलती है, ऐसा व्यक्ति करुणा की मूर्ति होता है। वह दु:खियों की आह से द्रवित होकर कहता है कि संसार के सारे दु:खों को मेरे भीतर उड़ेल दो, ताकि सभी प्राणी इनसे मुक्त हो सकें। हृदय में ऐसी करुणा का महाभाव जगते ही क्रूरता, हिंसा, अन्याय, अत्याचार, आदि कुप्रवृत्तियां विसर्जित होने लगती हैं और शांति का पथ प्रशस्त होने लगता है। युद्ध समस्याओं का अंतिम समाधान नहीं है। युद्ध में न कोई हारता और न जीतता है। सारी समस्याओं का समाधान उस दिन निकलेगा, जिस दिन मनुष्य के भीतर करुणा जगेगी। तब वह अवश्य ही अपने भीतरी विकारों पर निर्णायक विजय हासिल करेगा। अतः जिसने अपने को नहीं जीता वह दुनिया को कैसे जीत सकेगा..?

“आचार्यश्री” ने कहा – स्वभाव में लौटने का नाम ही प्रेम है। जीवन में प्रेम ना हो, तो कभी भी अपनेपन को अनुभव कर पाना मुश्किल है, प्रेम के बिना इस दुनिया की खूबसूरती का अहसास नही किया जा सकता। प्रेम किसी के जीवन का सहारा है तो किसी के लिए प्रेरणा। मनुष्य का आध्यात्मिक विकास प्रेम के बिना संभव नही। प्रेम से मन की मलिनता दूर हो जाती है। जीवन में परमानंद का अनुभव प्रेम के बिना नही किया जा सकता। प्रेम की व्यापकता का अनुभव प्रत्येक प्राणी कर सकते हैं। प्रेम की दुनिया ज्ञान से बड़ी है। प्रेम का दूजा नाम ही समर्पण है, और समर्पण में व्यक्ति कुछ पाने की लालसा नहीं करता, बल्कि केवल देना जानता है और जो देना जानता है वो कभी निराश नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति सब के ह्रदय में राज करना चाहता है तो उसको अपने भीतर प्रेम की भूमिका प्रशस्त करनी चाहिए। सामाजिक दृष्टि से भी प्रेम की शक्ति, बहुत महान और प्रभावी है। एक अच्छा समाज वह समाज है जिसका संचालन प्रेमपूर्वक ढंग से किया जाए। ईश्वर, असीम प्रेम का प्रकाशमई स्रोत है। उसने ही जीवन प्रदान करने वाली यह पूंजी अर्थात्, प्रेम को मानव के अस्तित्व में निहित किया है, ताकि मानवता स्पष्ट हो सके। वह व्यक्ति जो प्रेम करता है अपने पूरे अस्तित्व के साथ ईश्वर की उपासना करता है। मनुष्य प्रेम का आभास पहली बार अपने परिवार में करता है और वहीं से उसे सीखता है। प्रेम की प्रथम अनुभूति उसे माता के स्नेह से मिलती है और प्रेम से ओतप्रोत पिता की कृपादृष्टि से वह प्रसन्नचित होता है। वास्तविकता यह है कि मनुष्य का शरीर भोजन से और उसकी आत्मा प्रेम से विकसित होती है…।

“आचार्यश्री” ने कहा – क्षमा, प्रेम, मैत्री व समता आत्मा के स्वभाविक गुण हैं। जो भी इन गुणों में रमण करता है, वही धर्मात्मा होता है। स्वभाव से प्रतिकूल चलना, विभाव में रमण करना अधर्म कहलाता है। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – आज धर्म स्थानों की बहुलता है, परंतु सहिष्णुता, श्रद्धा और प्रेम के अभाव में मनुष्य शांति से पूरी तरह से वंचित बना हुआ है। शांति धर्म स्थानों में नहीं, बल्कि धर्म के आचरण से मिलती है। धर्म स्थल अर्थात्, सत्संग में पहुंचकर जो श्रवण किया जाता है उसे अपने जीवन में उतरना चाहिए। अहिंसा, संयम, तप, सहिष्णुता व उदारता आदि ये सभी गुण जब जीवन में घटित होने लगेंगे, तब मनुष्य स्वयं शांति की अनुभूति करने लगता है। समता में ही श्रेष्ठता है। समता रस का पान सुखद होता है। समता जीवन की तपती हुई राहों में सघन छायादार वृक्ष है। जो ‘प्राप्त को पर्याप्त’ मानने लगता है, उसके स्वभाव में समता का गुण स्वतः प्रस्फुटित होने लगता है। अतः करुणा, प्रेम और समता, की साधना से सारे अन्तर्द्वन्द्व, सारे क्लेश सदा सर्वदा के लिए समाप्त हो जाते है। साधक का समग्र चिंतन समता में एकात्म हो जाता है। ईश्वरीय-अनुग्रह, देव-कृपा और संत-आशीष में स्थिरता आ जाती है, इन सद्गुणों को जीवन में धारण करने से चित्त में समाधि भाव आ जाता है…।