दुःख-चिन्ता का कारण वस्तुओं का अभाव नहीं है, प्रत्युत मूर्खता है, यह मूर्खता सत्संगसे मिटती है-श्रीशरणानन्दजी महाराज

हरिद्वार। यह नियम है कि जो करना चाहिए उसके करने से, न करना स्वतः आ जाता है और फिर उससे उपर्युक्त साधन की सिद्धि हो जाती है। यदि कोई कहे कि बिना सही किये हम ‘न करना’ प्राप्त कर लेंगे, तो यह कभी सम्भव नहीं है। कारण कि, *करनेका राग सही करने से ही निवृत्ति होता है। सही करनेका अर्थ है, जिस प्रवृत्ति से जिनका सम्बन्ध है, उनके अधिकार की रक्षा। जैसे, हम वही बोलें, जिससे सुनने वाले का हित तथा प्रसन्नता हो और अगर हम वैसा न बोल सकें, तो बोलने के राग से रहित होकर मौन हो जायें ।

दूसरों को अपनी बात मानने के लिये बाध्य करना सबसे बड़ी अज्ञानता है। यहाँ हर आदमी एक दूसरे को समझाने में लगा हुआ है। हम सबको यही बताने में लगे हैं कि तुम ऐसा करो, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिये था। तुम्हारे लिये ऐसा करना ठीक रहेगा।

ये सब अज्ञानी की अवस्थायें हैं ज्ञानी की नहीं। ज्ञानी की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह किसी को सलाह नहीं देता, वह मौन रहता है, मस्ती में रहता है, वह अपनी बात को मानने के लिए किसी को बाध्य नहीं करता है।

इस दुनिया की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि यहाँ हर आदमी अपने आपको समझदार और चतुर समझता है और दूसरे को मूर्ख। सम्पूर्ण ज्ञान का एक मात्र उद्देश्य अपने स्वयं का निर्माण करना ही है। बिना आत्म सुधार के समाज सुधार किंचित संभव नहीं है।