नदियों पर बड़े बांधो का निर्माण मानव और प्रकृति के संघर्ष के लिए चुनौती

हरिद्वार। बरसात के दिनों में समाचार पत्रों की मुख्य खबर बनती हैं प्राकृतिक आपदा। जिस बात को हम प्राकृतिक आपदा का नाम दे रहे हैं वह जाने अनजाने और कभी कभी जान बूझकर प्रकृति पर किये जा रहे मानवीय प्रहार और कृत्यों का ही परिणाम है। प्रकृति के असन्तुलित दोहन पेड़ों के अत्यधिक पातन, लैंड मूविंग से लेकर पहाड़ों में विकास के नाम पर बनाये जारहे बांधो और सड़कों के निर्माण प्रक्रिया में प्रकृति की अनदेखी के परिणाम दिन ब दिन और भी घातक सिद्ध नहीं होंगे इस बात की गारण्टी कौन देगा। कोई नहीं दे सकता कारण सड़कों के निर्माण में जो भूमि का कटान किया जाता है उससे उपजे मिट्टी और मलवे सुरक्षित जगहों पर भंडारण कर धीरे-धीरे उसका निस्तारण होना आवश्यक है। जबकि पहाड़ कर सड़कों के मलवे को साथ बह रही नदियों में धकेल दिया जाता है। परिणाम स्वरुप नदियों की अविरलता में बाधा उत्पन्न होती है एक ओर पानी चट्टानों को कमजोर करता है दूसरी ओर पेड़ों के अत्यधिक पातन के कारण पहाड़ कमजोर होते जाते हैं। जैसे ही भारी वर्षा होती है पहाड़ों में पहले से ही पड़ी दरारें पानी पी लेती हैं और मलबा नीचे आने लगता है। कुछ लोगों का कहना है कि सड़के पहले भी बनती थी। लेकिन पहले नदियों की अविरलता अवरुद्ध नहीं होती थी। नदियों को रिवर रूम उपलब्ध थे अब नदियों पर बड़े बांधो का निर्माण मानव और प्रकृति के संघर्ष को चुनौती दे रहा है। पहले नदियां अविरल हुआ करती थीं वर्षा जल साथ-साथ बहता रहता था। अब परिस्थितियां भिन्न हैं। बांधों में जल स्तर की अपनी सीमा है। एक निश्चित जल स्तर के बाद अतिरिक्त जल छोड़ना ही पड़ता है और जब अतिरिक्त जल की निकासी होती है तो रिवर रूम छोटे हो जाने के कारण पानी इधर उधर नुकसान करता हुआ आगे बढ़ता है। ज्यादा सिल्ट वाले पानी से विद्युत गृहों को क्षतिग्रस्त होने का खतरा होता है इसलिए विद्युत गृहों में पानी कम कर दिया जाता है। फलस्वरूप पानी मैदानों की ओर कालगति से बढ़ता हुआ बाढ़ आपदा की उत्पत्ति करता है।
दूसरा बड़ा कारण जो मैदानी भागों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करता है। मानव और प्रकृति का संघर्ष। ऐसा संघर्ष जो मानव द्वारा धीरे-धीरे होता है लेकिन उसके दूरगामी परिणाम विनाशकारी और विस्फोटक आपदा का रूप ले लेते हैं। ऐसा एक ज्वलन्त उदाहरण राज्य की राजधानी के पास होकर बहने वाली सौंग नदी का है। जिस पर खनन के पट्टो से सरकारें आर्थिक विकास करती तो भूल जाती हैं कि यह कोई उद्योग नहीं प्रकृति प्रदत्त खनिज संसाधन है जिसके बेहिसाब दोहन से विकास कम और विनाश ज्यादा होने की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। नदियोँ के तटीय क्षेत्र में बसे हुए गांवो को कभी इस बात का इल्म नहीं रहा होगा कि जिन पेड़ों को काट कर खेत बनाये जारहे हैं या गांवों की सीमाओं से जो खनिज उठाये जा रहे हैं उनसे नदी का रुख खेतों और गांव की तरफ हो सकता है। ऐसी एक धारणा बनी हुई है कि पर्यावरण की चिंता करना मानो पर्यावरणविद् का ही काम है और पेड़ लगाना वन विभाग और सामाजिक संस्थाओं का। हम पेड़ काटते चले गए और नदियां कब आंगन में प्रवेश कर गयीं पता ही नहीं चला। एक ही स्थान पर लगातार अत्यधिक खनन से जहां नुकसान होता है वहीं दूसरी ओर एक ही जगह को आरक्षित कर RBM रिवर बैड मैटेरियल बढ़ने से भी नदियों का स्तर ऊपर उठ जाता है जिससे तटीय गांवो में बाढ़ की स्थिति बन जाना और भी सरल हो जाता है।

उल्लेखनीय बात यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यावरणीय जागरूकता की कमी के कारण घरों का पानी भी सीधे नदी नालों में गिरा देते हैं जो धीरे धीरे आसपास की भूमि को नमी प्रदान कर नदी नालों द्वारा कटाव को बल प्रदान करता है। सौंग नदी द्वारा बाढ़ आपदा ग्रस्त रायवाला के समीप गौहरी माफ़ी गांव इस बात का ज्वलन्त उदाहरण है कि गंगा और सौंग नदी के तट पर देश के बड़े औद्योगिक परिवार द्वारा निर्मित भवन को संरक्षित करने हेतु निर्माण झूठे साबित हुए जबकि भीषण बाढ़ को रोकने में यदि कुछ सफलता मिली है तो सिर्फ वर्षो की मेहनत से उगाये गए पेड़ों के कारण ही भवन परिसर बच पाया है।

लेकिन हम लोग हैं कि खुद को धोका देते हुए निर्माण के मानकों की अनदेखी कर प्रकृति से संघर्षरत हैं। गैरकानूनी निर्माण की इस बात का खुलासा तब होता है जब नदियां मानव द्वारा अधिग्रहित क्षेत्र पर अपना पहला अधिकार जमाती हुई उसके वास्तविक क्षेत्र को भी अपने में समाहित कर लेती है। यदपि नदियों के तटीय क्षेत्रों पर कब्जे करने वाले लोग गिनती के होते हैं किन्तु इनके कारण जब नदियाँ अपना रास्ता और स्वरुप बदल लेती हैं तो नतीजा भारी विनाशकारी होता है।

प्राकृतिक आपदा सहित बाढ़ के नियन्त्रण को जरुरी है कि नदियों नालों और प्राकृतिक जल श्रोतों के संरक्षण हेतु अलग से मंत्रालय बनाया जाय जो न केवल विभागीय कागजों तक सिमित हो बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में मानसून सत्र से पूर्व ही जल संरक्षण और संवर्द्धन और आपदा पर ग्रामीणों को जागरूक करे। दूसरी ओर मैदानी जिलों में नदियों के तटीय क्षेत्रों में बसे ग्रामीणों को पर्यावरण सहित नदियोँ की अविरलता और स्वयं के मध्य मैत्री सम्बन्ध स्थापित कर स्वयं की सुरक्षा हेतु जागरूक किया जाय। इन तटीय ग्रामों के ग्राम प्रधानों को सरकार द्वारा प्रशिक्षित कर स्वयंसेवक समूह बनाने की जिम्मेदारी देदी जाय तो कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आसकते हैं।
लेखक विनोद प्रसाद जुगलान वरिष्ठ सामजिक कार्यकर्ता हैं।