जानिए… बौद्ध शिक्षा के प्रसार में स्थान की अहमियत

शाहिद परवेज। धर्म का धर्मस्थानों से पुराना संबंध है। दुनिया के तमाम धर्मों का संबंध और पहचान उन धर्मों के उद्गम अथवा उस धर्म से जुड़े अहम महापुरुषों से संबंधित रहे हैं और यही उनकी पहचान बनी हुई है। सदियों से दुनिया के तमाम कोनों में बौद्ध, ईसाई, इस्लाम जैसे तमाम धर्म अपनी पहचान इसी तरह के चिन्ह और स्थानों के जरिए भी देखे और समझे जाते रहे हैं। बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध के जीवनकाल से ही अवन्ति बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केन्द्र रहा। इस क्षेत्र में कई ऐसे महापुरुष पैदा हुए, जिन्होंने इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रचार- प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बौद्ध धर्म की शिक्षाओं को जनजन तक पहुंचाने और उस दौर के समाज को सत्य, अहिंसा और अस्तेय जैसी सीख के माध्यम से विशुद्ध और संगत बनाने में बौद्ध धर्म का सबसे अहम योगदान रहा, जो सदियों तक क़ायम रहा। कालखंड के साथ बौद्ध धर्म की शिक्षाएं उत्तरोत्तर और अहमियत रखने लगीं। बिगड़ते दौर के साथ हर निशानी अपनी छाप को और सैद्धांतिक चमक बनाती गयी।

महा कच्छायन

बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के प्रचार में सबसे अहम भूमिका महा कच्छायन की मानी जाती है। उनका जन्म उज्जयिनी में हुआ था। बुद्ध से मिलकर वे बहुत प्रभावित हुए थे। इसी मुलाक़ात के बाद उन्होंने बुद्ध के उपदेशों को घर- घर तक प्रभावशाली ढ़ग से पहुंचाना शुरू कर दिया। उनके कहने पर समकालीन राजा प्रद्योत ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई। उनके सत्प्रयासों से पूरे क्षेत्र में बौद्ध धर्म एक प्रभावशाली धर्म के रुप में उभरा। चूंकि प्रचार और उपदेश का माध्यम वहां की स्थानीय भाषा थी,
चूंकि बुद्ध के कई शिष्य अवन्ति से थे, इसलिए यह संभव है, कि अशोक से पहले भी उज्जैन और सांची में बौद्ध धर्म से जुड़े इमारत बने। महावंश में चैत्यागिरि नाम के एक विहार का ज़िक्र मिलता है, जिसकी पहचान सांची से की जाती है, जहां अशोक ने भी स्तूप और स्तंभ बनवाया था। अशोक से पहले बना यह चैत्य वर्त्तमान स्तूप नहीं हो सकता,

सांची स्तूप

क्योंकि स्तूप-पूजन की परंपरा अशोक के समय से ही शुरु होती है। राजकुमारी देवी ने चैत्यगिरि में एक विहार का निर्माण करवाया था, जिसका पुरातात्विक प्रमाण आज भी मिलता है।
दंतकथाओं के अनुसार, विदिशा की निवासी देवी, जो बाद में अशोक की पत्नी बनीं, पहले से ही बौद्ध धर्म ग्रहण कर चुकी थीं, लेकिन अशोक ने मोगालिपुत्ता तिस्स और दूसरे भिक्षुओं के प्रभाव से, परिस्थितिवश, अपना धर्म परिवर्तन किया।
सत्ता सिंहासनों के माध्यम से धर्म प्रचार एवं प्रसार में सदा ही बल मिलता रहा, जो इस दौर में भी देखने को मिला। सम्राट अशोक के दौर बौद्ध धर्म अपने चरम पर पहुंचा। अशोक के आश्रय में बौद्ध धर्म का बहुत प्रसार हुआ। अशोक ने ईंट- के सांची स्तूप बनाने की एक लंबी परंपरा चलायी, जिसकी निशानियां आज भी देशभर में देखने को मिलती हैं।
उज्जैन बौद्ध धर्म का केंद्र बना रहा । स्तूप के ईटों के आकार से पता चलता है कि यह मौर्यकालीन हैं। संभवतः इसका निर्माण भी अशोक ने ही करवाया हो । इसके अलावा महेश्वर से भी बौद्ध इमारतों के प्रमाण मिले हैं। यहां मिले मृदभाण्ड से स्पष्ट हो जाता है कि ये किसी न किसी रुप में बौद्ध- धर्म से संबद्ध थे।

पुष्यमित्र शुंग

सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद पुष्यमित्र शुंग के शासन काल में बौद्ध धर्म के विकास में कई अड़चनें आयी। पुष्यमित्र, जो ब्राह्मण धर्म का कट्टर अनुगामी था। कहा जाता है कि उसने कई बौद्ध- निवासों को नष्ट करवा दिया तथा साकल (सियाल कोट, पंजाब) के सैन्य अभियान के दौरान कई बौद्ध- भिक्षुओं की हत्या करवाई। पुष्यमित्र शुंग के उत्तराधिकारी ने अशोक के बनवाए सांची के स्तूप को ऊपर से प्रस्तर निर्मित एक भित्ति से ढका था। सांची का दूसरा तथा तीसरा स्तूप भी शुंगकाल में ही बनाया गया । भरहुत के स्तूप के अभिलेखों से पता चलता , कि विदिशा के राजा रेवतीमित्र और उनकी रानियों ने भरहुत के स्तूप के निर्माण में सहयोग दिया था।
बौद्ध धर्म का अस्तित्व पश्चिमी क्षत्रपों के काल में भी बना रहा। उज्जैन में मिली चहारदीवारी का हिस्सा, जो संभवतः बौद्ध स्तूप का ही एक हिस्सा था, इसी काल में बना माना जाता है। अशोक काल के बाद दूसरी सदी ई. पूर्व के अंत में बौद्ध धर्म की हैमवत शाखा को प्रसिद्धि मिली। यह धर्म के विभिन्न स्रोतों से प्रभावित था।