ब्राह्मण एक थे, एक हैं और एक रहेंगे!

जयपुर। ब्राह्मण, अपने त्याग और तपोमय जीवन, लोक कल्याण की भावना से अभिभूत परोपकारी वृति तथा अगाध ज्ञान के उदधि होने के कारण वन्दनीय माने गए साथ ही परोपकार के गुण के कारण आदर के साथ आमंत्रित किये गए और देश के विभिन्न भागो में राज्याश्रय और राजसम्मान से विभूषित हुए।

समस्त भारत में सभी ब्राह्मण चाहे पञ्च द्रविड़ हो, पञ्च गौड़ या अनके अनेक भेद या आस्पद, सभी ब्राह्मण एक ही है सामान है ना कोई ब्राह्मण छोटा है और ना बड़ा। ब्राह्मण कभी स्वार्थी नही रहा ना जातिवादी रहा। ब्राह्मण ने ही क्षतिय भगवान् राम, यादव भगवान् कृष्ण, औघड़ शिव, वानर हनुमान, रीछ जामवंत, केवट को निषाद राज अर्थात समाज का हर वर्ग जो किसी भी प्रकार से प्रसंशनीय था उसे ईश्वर और पूजनीय माना। नारी को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती को रूप में पूजा तथा सबको उनके मार्ग पर चलने को प्रेरित किया। ब्राह्मण ही था जिसने तुलसी, बरगद, पीपल, नीम आदि दि ना जाने कितने पेड़ पौधों, पशु पक्षियों को पूजनीय बताकर सभी के जीवन के लिए उनके महत्त्व को बताने और पेड़पौधों को बचाने का प्रयास किया। नदी-तालाबों और जलाशयों को सभी धार्मिक कृत्यों से जोड़ा ताकि लोग उसे गन्दा ना कर सकें और उसकी महत्ता को समझें। अग्नि, वायु, जल, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, नक्षत्र, पर्वत अर्थात प्रकृति और ब्रह्माण्ड से जुड़ी हर चीज के महत्त्व को सबसे पहले जाना और सबको सबकी महत्वता तथा ताकत से परिचित कराया।

पर आज भारत में बहुत ही कम प्रतिशत है ब्राह्मणों का, और उसमे भी करीब 80% की हालत अत्यंत दयनीय है, एक प्रतिष्ठित अखवार की शोध के अनुसार 6% ब्राह्मण की संख्या में गिरावट और 8% ब्राह्मण गरीवी रेखा के नीचे जा रहा है जो बहुत गंभीर बात है।

 

विश्वेदेवा शान्तिः और सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

 

प्राचीनकाल में आवागमन के समुचित साधन ना होने के कारण प्रवासी ब्राह्मण जहाँ गये उसी स्थान पर बस गये। कालांतर में उस स्थान के आचार विचार, आहार विहार, रहन सहन, तथा भेष भूषा के प्रभाव में अपने मूल रूप से दूर हो गए। उत्तर भारत बसे ब्राह्मण का वर्ग गौड़ (गौ = पृथ्वी, स्थल + इल = गतौ, जाना, आगे बढ़ना, विजय करना) कहलाया जब की जल मार्ग द्वारा विन्ध्य पर्वतश्रेणी के दक्षिण भू भाग पर बसने बाले ब्राह्मण द्राविड (द्राव = जल की भांति, जल के द्वारा इड = गतौ, जाना, आगे बढ़ना, विजय करना) कहलाया। कालांतर में उत्तर भारत में दूर दूर फैले ब्राह्मण पांच विभाग पञ्च गौड़ में बाँट गए। महोदय प्रदेश के निवासी ‘कान्यकुब्ज’, सरस्वती नदी के तटवर्ती ‘सारस्वत’, गौड़ प्रदेश के निवासी ‘गौड़’, मिथिला के निवासी मैथिल तथा उत्कल प्रदेश के निवासी ‘उत्कल’ ब्राह्मण कहलाये जाने लगे। इसी प्रकार द्राविड ब्राह्मणों के पांच भेद तैलंग, द्राविड, कर्णाटक, महाराष्ट्र तथा गुर्जर। स्थान और वृति के कारण और विभेद प्रभेद हो गए कान्कुब्जो के फिर पांच भेद महत्तर, गोईत्रा, पञ्चादर, पञ्चादरेतर और उत्ररित और इसी प्रकार ब्राह्मण के भेद होते चले गए। अधिकांश भेद मात्र स्थान और रहने का क्षेत्र के अनुसार हुए है। पर इतना भेद होने के बाद भी आज भी हम पाने ऋषि वशिष्ठ, भरद्वाज, कश्यप, कात्यायन, गर्ग, गौतम, शांडिल्य, पराशर, पुलत्स्य, अत्रि, अंगिरस, आदि ।ऋषियों की संताने मानते है। एक और कश्यप गोत्रीय बैकुंठनाथ तिवारी (लखनऊ) दूसरी और कश्यप गोत्रीय रचुरी लक्ष्मी नरसिंह राव (आंध्र प्रदेश) और काली मोहन चटोपाध्याय (बंगाल) है। अब यदि कहा जाये की अलग अलग ब्राह्मण वर्ग और आस्पद के ब्राह्मण एक समय में कश्यप ऋषि के वंश के ही तो थे। तो फिर अगल कैसे रहे? क्यों की प्रवर ऋषियों में भिन्नता नही थी।

आज जरुरी है की हम ब्राह्मण अपने बसने के स्थान को गौण मान कर ऋषियों के नाम की संताने मान कर गौरवान्वित हो।

ब्राह्मण विरोध आज चरम पर है। वो ब्राह्मण जिसने समाज को संवारने के लिए अपना सर्वस्य लगा दिया आज अपमानित हो रहा है। आज बहुत आवश्यक है की हम एक दूसरे को सहयोग करे, एक दूसरे का साथ दे। ब्राह्मण वर्ग जैसे कान्यकुब्ज, सरयूपारी, गौड़, झिझोतिया आदि आदि को नकारते हुए शादी विवाह में परिवार और संस्कार देखे।

एक और उपाय है – एक राजस्थान समारोह में मेने कहा था की मै कान्यकुब्ज गौड़ हूँ क्यों की कान्यकुब्ज क्षेत्र में पैदा हुआ और गौड़ प्रदेश में रह रहा हूँ तो मुझे कान्यकुब्ज गौड़ माना जाना चाहिए और यदि में बनारस जाता हूँ तो मै अपने आप ही कान्यकुब्ज गौड़ सरयूपारी हो जाता हूँ।

मैंने अपने भतीजी का विवाह गौड़ में किया है स्वम का विवाह गुर्जर गौड़ में किया है। विकल्प और भी हो सकते है पर ब्राह्मण समान है एक है, ना कोई ब्राह्मण वर्ग उत्तम या निम्न, छोटा या बड़ा होते है इसका कोई विकल्प नही है। सभी ब्राह्मण वर्ग चाहे आप गौड़ है या सरयूपारी एक समान है।
हमारा धेय होना चाहिए की हम ब्राह्मण एक दुसरे के सम्बन्धी हो और अपने कृत्य से अपने आपको ब्रह्मा की संताने, वामन और परशुराम की कोटि में स्थापित कर सके !!!

हम ब्राह्मण एक थे, एक है और एक रहेगे !!

लेखक डॉ विजय मिश्र, चिंतक-विचारक हैं।