“वीरभद्र बनो। वीरता में भद्रता और भद्रता में वीरता आदर्श स्थिति”- सुधांशु जी महाराज।

नई दिल्ली। अपने से कमजोर को सताने में, दबाने में पूरी ताकत दिखाते हो और किसी शक्तिशाली से नज़र नहीं मिला पाते। आँ…, तुम पत्नी को डांट लेते हो। पत्नी किसी को नहीं डांट पाती तो वह बच्चों को डांट लेती है । बच्चे किसी को नहीं डांट पाते, गुड़िया की टांग तोड़ लेते हैं। यह सिलसिला दर सिलसिला चलता रहता है। लेकिन एक बात सोलह आने सच है कि यह बात उचित नहीं।

देखो! यह शक्ति का सदुपयोग नहीं है, यह विशुद्ध रूप से क्षमता का दुरुपयोग है। क्रोध बड़े भाई से डरता है, एक दादा से डरता है, भय से डरता है और सरल व सीधे इन्सान के ऊपर उबल पड़ता है। जिसका कहीं कोई वश न चले, अपने मातहत को दबा ले, ये क्या बात हुयी। बड़े आदमी का बड़प्पन तभी तक है, जब तक उसे मिली शक्ति का वह सदुपयोग करता है, सामने वाले को क्षमा करना सीखे। अनुचित आवेश और हिंसा को क्षमा से, सहनशीलता से, शांति से, सौम्यता से, प्रसन्नता से, मधुरता से और शिष्टता से जीतने की कोशिश कीजिये। इससे आप विशेष बनेंगे, भीड़ से अलग दिखेंगे।

देखिए, किसी बात को कहने के अन्दाज़ अलग-अलग हो सकते हैं। कहीं गांधी जी वाला रूप अच्छा है तो कहीं सरदार पटेल वाला रूप अच्छा है। न हर जगह सरदार पटेल वाला रूप काम कर पायेगा न हर जगह गांधी जी वाला। परिस्थिति को देखकर तालमेल बिठाना होगा। इतनी विशेषता तो रखो कि जब ज़रूरत पड़े, तब अपने को नियंत्रित कर सको। कभी भी दूसरों को दबाने के लिए अपनी शक्ति न लगाओ। भले आदमी की यही पहचान है। भगवान शिव के ‘वीर भद्र’ यही सिखाते हैं। यानी, वीरता भद्रता लिए हुए हो और भद्रता वीरता से युक्त हो। अच्छा समय लाने और सुखमय समाज बनाने के लिए ऐसा करना ही होगा।

(लेखक विश्व जागृति मिशन के संस्थापक हैं)