जितेन्द्रिय तथा श्रद्धावान पुरुषों को ही ज्ञान मिलता है और ज्ञान से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

जब मनुष्य मन आत्म-विश्वास और श्रद्धा से भरा होता है, तब जीवन में सहजता, मधुरता और रस सम्पन्नता अनुभूत होने लगती है…! जब संसार में सभी साथी मनुष्य का साथ छोड़ दें, पराजय और पीड़ाओं के दंश मनुष्य को घायल कर दें, पैरों के नीचे से सभी आधार खिसक जायें, जीवन के अन्धकार युक्त बीहड़ पथ पर यात्री अकेला पड़ जाय तो भी क्या वह जीवित रह सकता है? क्या वह कुछ कर सकता है? पथ पर आगे बढ़ सकता है? और इसका उत्तर है – अवश्यमेव। यदि वह स्वयं अपने साथ है तो कोई भी शक्ति उसकी गति को नहीं रोक सकती, कोई भी अभाव उसकी जीवन यात्रा को अपूर्ण नहीं रख सकता। मनुष्य का अपना आत्म-विश्वास ही अकेला इतना शक्तिशाली साधन है जो उसे मंजिल पर पहुँचा सकता है अथवा विजय की सिद्धि प्राप्त करा सकता है। आत्म विश्वास परमात्मा पर विश्वास करना है, जिसकी शक्ति अजेय है, अनन्त है। जो अपने आप पर विश्वास करता है, अपनी बागडोर उसके हाथों सौंप देता है, उस पर संसार विश्वास करता है। अपने ऊपर अपार विश्वास रखकर ही वे संसार को प्रभावित करते हैं।

आत्म-विश्वास के बल पर एक मनुष्य अफ्रीका के जंगलों में से भी भयंकर जंगली शेर को पकड़ लाता है। हिंसक जन्तुओं के बीच खड़ा होकर उन्हें नचाता है। लेकिन आत्म-विश्वासहीन व्यक्ति शहर के बीच एक कुत्ते से भी डर जाता है। बन्दर भी उसे भयभीत कर देता है। वस्तुतः सभी मनुष्यों का शरीर एक – सा ही होता है, किन्तु जिस व्यक्ति के चेहरे से, आँखों से आत्म-विश्वास का अपार तेज प्रवाहित होता है, जिसके हृदय में आत्म-विश्वास का सम्बन्ध है, उसके समक्ष हिंसक जन्तु भी पालतू – सा बनकर दुम हिलाने लगते हैं। उसका वह तेज ही दूसरों पर जादू का सा असर डाल देता है। निर्बल, असहाय, दीन-हीन अथवा दुःखी-दरिद्र कौन? जिसका आत्म-विश्वास मर चुका है। भाग्यहीन कौन? जिसका अपने विश्वास ने साथ छोड़ दिया है। वस्तुतः आत्म-विश्वास जीवन नैया का एक शक्तिशाली समर्थ मल्लाह है जो डूबती नाव को पतवार के सहारे ही नहीं वरन् अपने हाथों से उठाकर प्रबल लहरों से पार कर देता है। आत्म-विश्वासहीन व्यक्ति जीवित होता हुआ भी मृत प्राय है, क्योंकि उत्साह, तेज, शक्ति, साहस, स्फूर्ति, आशा और उमंग के साथ जीना ही जीवन और ये सब वहीं रहते हैं, जहाँ आत्म-विश्वास होता है….।

“आचार्यश्री” ने कहा – परमात्मा के प्रति अत्यन्त उदारतापूर्वक आत्मभावना पैदा होती है वही श्रद्धा है। सात्विक श्रद्धा की पूर्णता में अन्तःकरण स्वतः पवित्र हो उठता है। श्रद्धायुक्त जीवन की विशेषता से ही मनुष्य-स्वभाव में ऐसी सुन्दरता बढ़ती जाती है जिसको देखकर श्रद्धावान स्वयं सन्तुष्ट बना रहता है। श्रद्धा सरल हृदय की ऐसी प्रतियुक्त भावना है जो श्रेय पथ की सिद्धि कराती है। इसीलिये कहा गया है – “भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा-विश्वास रूपिणौ। याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धः स्वान्तस्थमीश्वरम् …”। ज्ञान-भक्ति का निरूपण करते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी उत्तरकाण्ड में लिखते हैं – सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जो हरि कृपा हृदय बस आई॥ जप तप व्रत जम नियम अपारा। जो श्रुति कह शुभ धर्म अचारा॥ अर्थात् – जब तक मनुष्य के अन्तःकरण में श्रद्धारूपी गाय का जन्म नहीं होता तब तक जप, तप, यम, नियम, व्रत आदि जितने भी धर्माचरण हैं उनमें मनुष्य की बुद्धि स्थिर नहीं रहती। यह श्रद्धा ही जीवन की कठिनाइयों में मनुष्य को पार लगाती है और आत्मगुणों का विकास करती हुई उसे विज्ञानयुक्त परमात्मा के प्रकाश तक पहुँचाती है। श्रद्धा का आविर्भाव सरलता और पवित्रता के संयोग से होता है। पार्थिव वस्तुओं से ऊपर उठने के लिए सरलता और पवित्रता इन्हीं दो गुणों की अत्यन्त आवश्यकता होती है। इच्छा में सरलता और प्रेम में पवित्रता का विकास जितना अधिक होगा उतना ही अधिक श्रद्धा बलवान होगी। सरलता के द्वारा परमात्मा की भावानुभूति होती है और पवित्र प्रेम के माध्यम से उसकी रसानुभूति। श्रद्धा दोनों का सम्मिलित स्वरूप है। उसमें भावना भी है और रस भी। श्रद्धा तप है। वह ईश्वरीय आदेशों पर निरन्तर चलते रहने की प्रेरणा देती है। आलस्य से बचाती है, कर्तव्य पालन में प्रमाद से बचाती है, सेवा धर्म सिखाती है, अन्तरात्मा को प्रफुल्ल और प्रसन्न रखती है। इस प्रकार तप और त्याग से श्रद्धावान व्यक्ति के हृदय में पवित्रता एवं शक्ति का भण्डार अपने आप भरता चला जाता है। गुरु कुछ भी न दे तो भी श्रद्धा में वह शक्ति है जो अनन्त आकाश से अपनी सफलता के तत्व और साधन को आश्चर्यजनक रूप से खींच लेती है। ध्रुव, एकलव्य, अज, दिलीप की साधनाओं में सफलता का रहस्य उनके अन्तःकरण की श्रद्धा ही रही है। उनके गुरुओं ने तो केवल उनकी परख की है। यदि इस तरह की श्रद्धा आज भी लोगों में आ जाए और लोग पूर्ण रूप से परमात्मा की इच्छाओं पर चलने को कटिबद्ध हो जायें तो विश्वशाँति, चिर-सन्तोष और अनन्त समृद्धि की परिस्थितियाँ बनते देर न लगे। उसके द्वारा सत्य का उदय, प्राकट्य और प्राप्ति तो अवश्यम्भावी ही हो जाता है। इसी बात को शास्त्रों में संक्षेप में इस प्रकार कहा गया है – “श्रद्धायांल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमविरेणाधिराच्छति”। यानि “जितेन्द्रिय तथा श्रद्धावान पुरुषों को ही ज्ञान मिलता है और ज्ञान से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है जिससे सत्य समुपलब्ध होता है …।”