“सद्विचारों” पर बुद्धि केंद्रित रखने का ही नाम श्रद्धा है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार/ पंकज कौशिक। श्रद्धा, विश्वास और निष्कपट प्रार्थनाएँ, ऐसी अदृश्य, अमूर्त-अतुल्य शक्तियाँ हैं, जो असाध्य को साध्य और असम्भव को सम्भव कर देतीं हैं। अतः इन दैवीय सामर्थ्यवान शक्तियों को सहेज कर रखें….! धर्म श्रद्धा से चलता है। इंसान सोता है श्रद्धा के साथ और जागता है विश्वास के साथ। श्रद्धा से भक्ति और विश्वास से ज्ञान की प्राप्ति होती है। श्रद्धा के बल पर ही मलिन चित्त अशुद्ध चिन्तन का परित्याग करके बार-बार परमात्मा के चिन्तन में लगा रहता है। जिसकी जीवन पतवार परमात्मा के हाथ में हो उसे किसका भय? सर्वशक्तिमान से सम्बन्ध स्थापित करते ही मनुष्य निर्भय हो जाता है, उसके स्पर्श से ही मनुष्य में अजेय बल आ जाता है। व्यक्तित्व में सद्गुणों का प्रकाश और दिव्यता झरने लगती है और जीवन में आनन्द झलकने लगता है …।

“आचार्यश्री” कहा करते हैं कि श्रद्धा के अभाव में गंगा एक नदी, हिमालय बर्फ और पत्थरों का समुच्चय और मूर्ति मात्र खिलौना और गुरु सामान्य स्तर का मानव मात्र है। तब भगवान भी प्रकृति व्यवस्था का एक अदृश्य नियम भर मालूम देता है। श्रद्धा वास्तव में प्राण है और स्वरूप उसका कलेवर। श्रद्धा न हो तो भैंस व गाय में कोई अंतर नहीं रह जाता। मंत्र भी अक्षरों का समुच्चय प्रतीत होते हैं। श्रद्धा ही सत्य का साक्षात्कार कराती है। श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है। श्रद्धा मनुष्य के प्राण हैं। श्रद्धाहीन मनुष्य को निष्प्राण, निर्जीव ही समझना चाहिए, क्योंकि किसी तरह की श्रद्धा न होने से वह निश्चेष्ट ही रहेगा और चेष्टारहित जीवन मृत्युतुल्य ही होता है। अतः श्रद्धा मुक्ति का, ज्ञान प्राप्ति का और जीवन साधना का आधार है …।

“आचार्यजी” ने कहा – श्रद्धा और विश्वास पूर्वक किए गए सत्कर्म फलीभूत होते हैं और मन को सहज शांति समाधान प्रदान करते हैं। “सद्विचारों” पर बुद्धि केंद्रित रखने का ही नाम श्रद्धा है। यही श्रद्धा मनुष्य को बल देती है, सब प्रकार से प्रेरणा देती है और जीवन को सार्थक बनाती है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘मानस’ में “भवानी शंकरौ वन्दे, श्रद्धा-विश्वास रुपिणौ …” कहकर विश्वास को शिव की और श्रद्धा को माँ पार्वती की उपमा दी है, जो सदैव साथ-साथ रहते हैं। इनकी सहायता के बिना अपने अंतस में विद्यमान परमात्मा के दर्शन नहीं हो सकते। विश्वास में निश्चय का भाव है। विश्वास होने पर मन भटकता नहीं। एक निर्धारित मार्ग पर चलने का निर्णय ले लेता है …।

“आचार्यश्री” ने कहा – श्रद्धा और विश्वास ही इस जीवन का आधार है। श्रद्धा मानव जीवन की नींव है। जैसी जिसकी श्रद्धा होती है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व बनता है। गीताकार के शब्दों में “श्रद्धामयोऽयं पुरुषः …” यह मनुष्य स्वभाव से ही श्रद्धावान है। यह बात अलग है कि उसकी श्रद्धा का आधार क्या हो। जिस तरह सूर्य के बिना दिन नहीं होता, आँखों के बिना देखा नहीं जा सकता, कानों के बिना श्रवण सम्भव नहीं है, ठीक उसी तरह श्रद्धा के बिना जीवन गतिमय नहीं हो सकता। जिस तरह दीपक के प्रज्ज्वलित रहने के लिए तैल आवश्यक है, उसी तरह जीवन के लिए श्रद्धा अपेक्षित है। इसलिए वह मनुष्य, मनुष्य नहीं जिसमें श्रद्धा और विश्वास न हो…।

? शास्त्रकारों ने एक मत होकर कहा है – श्रद्धापूर्वक किए हुए कर्म अथवा दिये गये दान आदि ही सफल होते हैं। अश्रद्धा पूर्वक किया हुआ कोई भी कर्म निष्फल हो जाता है। गीता जी में कहा गया है – “अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह …”॥ अर्थात्, श्रद्धा के बिना किये हुए यज्ञ – यज्ञादि, दिये हुए दान, की हुई तपश्चर्या और यहाँ तक कि कोई भी कर्म अपना फल नहीं देता, सब व्यर्थ चला जाता है। अतः इस सावधानी के साथ हम श्रद्धा की उपासना करें। “श्रद्धाँ प्रार्प्यहवाभहे श्रद्धाँ मध्यदिन परि…”। यानी, श्रद्धा देवी का आह्वान करें। प्रातःकाल श्रद्धायुक्त हों हम। मध्याह्न में श्रद्धावान रहें। सायंकाल श्रद्धा से युक्त हों और रात्रि में भी श्रद्धायुक्त रहें। अतः जीवन के प्रत्येक कार्य में, प्रत्येक क्षण श्रद्धा को धारण किये रहें