अपने वास्तविक स्वरूप की स्मृति और बोध का फलादेश है-अवधेशानंद गिरी जी महाराज

श्रीजगन्नाथ धाम/ उड़ीसा। जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी जी महाराज ने कहा अपने वास्तविक स्वरूप की स्मृति और बोध का फलादेश है – निर्भयता और अखण्ड-आनन्द के अनुभव का स्थायी बन जाना। अतः आत्मस्थ रहें…! जीव अपने स्वरूप को माया के कारण भूल जाता है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें सूर्य से पृथक नहीं हैं, उसी प्रकार जीव भी वास्तव में ब्रह्म से पृथक नहीं है। अज्ञान के कारण ही जीव अपने उस वास्तविक रूप को नहीं पहचान पाता, जिस अंशी का वह अंश है। चेतन जीव अपना संबंध जड़ शरीर, मन बुद्धि, अहंकार अथवा किसी कल्पित रूप से मान बैठता है। जीव का यह अज्ञान, आत्मज्ञान की कमी के अतिरिक्त कुछ नहीं है। आत्मज्ञान का साक्षात्कार कराने के लिए ईश्वर की सद्गुरु रूपी शक्ति प्रकट हुई। संत सद्गुरु ही ईश्वर प्राप्ति कराने के मूल साधन हैं। मनुष्य शरीर पूर्ण मुक्त है पर पूर्ण सतगुरु के मिलने पर ही ज्ञान होता है। पूज्य “आचार्यश्री” जी कहा करते हैं कि भक्ति के द्वारा ही जीव अपने मूल स्वरूप को प्राप्त कर सकता है। ज्ञान में अभिमान होता है, पर भक्ति में विनम्रता होती है। ज्ञान में कर्म फल और मोक्ष प्राप्ति की इच्छा होती है, जबकि भक्ति में सिर्फ सेवा। ज्ञान में तर्क-वितर्क होता है, और भक्ति में समर्पण। ज्ञान में विद्वता और क्षमता का प्रदर्शन होता है, लेकिन भक्ति में सहिष्णुता का। इसलिए भक्ति को ईश्वर प्राप्ति का परम साधन माना गया है…।

“आचार्यश्री” ने कहा – जीवन में हमेशा यह बात याद रखने की है कि जीव ईश्वर का अंश है। जो गुण ईश्वर में हैं, वही गुण अंशी रूप जीव में भी होते हैं। ईश्वर अविनाशी है, अतः जीव भी अविनाशी हुआ। इसीलिए कहते हैं कि आत्मा अजर-अमर है। परमात्मा चैतन्य है तो जीव जड़ नहीं है, वह भी चेतन है। परमात्मा अमर है तो जीव भी अमर है। श्रीतुलसीदास जी ने जीव को निर्मल नहीं कहा। उन्होंने भी इसे अ-मल कहा है। निर्मल कहते तो गंदा होने की संभावना रहती; लेकिन उन्होंने अ-मल कहा है। अ-मल का अर्थ यह है – जिसमें मल ही नहीं है। और जिसके अंदर मल नहीं है, मलिनता नहीं है वह अ-मल हुआ। “ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखराशि”।। जब परमात्मा में मलिनता नहीं है, तो आत्मा में भी मलिनता संभव नहीं है। जल गंदा होता है, उसे निर्मल करना पड़ता है, मगर आत्मा अमल है, निर्मल नहीं, क्योंकि उसमें गंदगी हो ही नहीं सकती। इसलिए अ-मल के आगे कहते हैं कि सहज सुखराशि है। अर्थात्, सुख का खजाना है; इसलिए वह है ही सुखरूप। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि जीव स्वरूप से तो सुखरूप है, मगर उनका स्वभाव ऐसा है कि बात-बात में दु:खी हो जाते हैं। रोते भी हैं और रुलाते भी हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो सुख की खोज के लिए कहीं बाहर भटकने की आवश्यकता नहीं होती। शांति को कहां ढूंढने की जरूरत है? आनंद की खोज बाहर करने की जरूरत ही क्या है? जब जीव है ही सुख स्वरूप। यह तो ऐसी बात है कि जैसे शक्कर मिठास को, नमक नमकीन और बर्फ शीतलता को ढूंढने निकले। परन्तु, आज सुख और शांति को बाहर खोजने की जरूरत पड़ रही है। और, ऐसा इसलिए है क्योंकि हम अपने स्वरूप को ही भूल गये हैं…।

“आचार्यश्री” ने कहा आधुनिक युग में मानव ने अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं लेकिन भौतिक सुख-सुविधाओं के क्षेत्र में उन्नति करने वाला इंसान आध्यात्मिक रूप से पिछड़ता जा रहा है। आज मनुष्य वस्तुओं को ही प्राथमिकता देता है। जबकि आवश्यकता इस बात की है कि हम मानवीय मूल्यों को महत्ता दें जिससे मनुष्यता का सुंदर स्वरूप देखने को मिले। शांति ही हमारा स्वरूप है और जो स्वरूप को ढूंढता है वह शांत है। क्रोध आगंतुक है, बाहर से आता है। जबकि शांति तो हमारा स्वरूप है। चौबीस घंटे क्रोध नहीं किया जा सकता। मगर चौबीस घंटे हम शांत रह सकते हैं। जीव शांति की खोज में भटक रहा है। सुख के पीछे भाग रहा है। यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कस्तूरी के लिए मृग दौड़ता है और घास सूंघता फिरता है कि यह सुगंध कहां से आ रही है? जबकि कस्तूरी उसकी नाभि में ही है। मुझ से अगर कोई पूछे कि हमें शांति चाहिए और शांति के लिए हमें क्या करना चाहिए? तो मैं कहूँगा कि शांति के लिए आप कुछ न करो, बल्कि जो आप कर रहे हो वह बंद कर दो। ऐसा करने से अपने आप शांति मिलेगी। पानी को गर्म करना पड़ता है, ठंडा अपने आप हो जाता है। स्वरूप से तो हम शांत हैं, जबकि स्वभाव से दु:खी हैं। इसलिए हम अपने कर्मों के कारण अशांत हैं। जो अशांत कर्म की अग्नि जल रही है, यदि उसे बुझा दें तो अपने आप मन में शांति का अनुभव होगा…।