सड़क पर गिरे हुए कोढ़ी को प्रेम से उठा कर उसकी सहायता करना ईश्वर भक्ति है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार। जूना पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर आचार्य अवधेशानंद गिरी जी महाराज ने कहा कि त्याग, प्रेम, निस्वार्थ-सेवा और भगवद-भजन ही शान्ति, ऐश्वर्य और आनन्द प्राप्ति के मूल साधन हैं। त्याग की भावना अत्यंत पवित्र है। त्याग करने वाले पुरुषों ने ही संसार को प्रकाशमान किया है। जिसने भी जीवन में त्यागने की भावना को अंगीकार किया, उसने ही उच्च से उच्च मानदंड स्थापित किए हैं। सच्चा सुख व शांति त्यागने में है, न कि किसी तरह कुछ हासिल करने में। गीता ने संन्यास शब्द के जगह त्याग शब्द का प्रयोग किया है। त्याग का सात्विक अर्थ है – व्यक्तिगत स्वार्थ तथा अहं तत्व से पीछे हटना। ईश्वर की अनुभूति करने और समाज में उच्च मानदंड स्थापित करने के लिए त्याग की भावना को अंगीकार कर, उस पथ पर बढ़ने की आवश्यकता होती है। उस मार्ग में व्यक्तिगत व शारीरिक सुखों का त्याग करना होगा। उन सभी आसक्तिओं को छोड़ना होगा, जो मानव जीवन को संकीर्णता की ओर ले जाने वाली होती है। तब यही त्याग वृत्ति अंत:करण को पवित्र कर भीतर के तेज को देदीप्यमान करती है। भारत में त्याग की परंपरा पुरातनकाल से चली आ रही है। आसक्ति से विरत हो जाने वालों की यहां पूजा की जाती है। भगवान श्रीराम द्वारा अयोध्या के राज्य को एक क्षण में त्याग देने जैसे स्थापित किए गए आदर्श को संसार पूजता है। राज्य का त्याग कर वन में जाने से उन्होंने समाज में उच्चतम मानदंड स्थापित किया। साथ ही लोगों को धर्म, अध्यात्म, ज्ञान व भक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा भी प्रदान की। त्याग से मनुष्य ईश्वर को प्राप्त कर सच्चे सुख व शांति का लाभ पाता है, वहीं समाज को भी उच्च आदर्शों के मानदंड को बनाये रखने की प्रेरणा प्रदान करता है…।

“आचार्यश्री” ने कहा प्रेम हमारी साधना है, प्रेम हमारा पंथ है, जो भरा है प्रेम से वही हमारा संत है। प्रेम सत्य है, प्रेम करुणा है। प्रेम परम विद्या है। प्रेम से सभी के दिलों को जीता जा सकता है। प्रेम करने वालों का कोई शत्रु नहीं होता है। जिससे प्रेम करो उसके प्रति समर्पित हो जाओ। प्रेम ही इस भवसागर से पार उतारने वाला एकमात्र उपाय है। प्रेमी बैरागी होता है, जिससे आप प्रेम करते हैं, उस पर न्योछावर हो जाते हैं। त्याग और वैराग्य सिखाना नहीं पड़ता। प्रेम की उपलब्धि ही वैराग्य है। जिन लोगों ने प्रेम किया है, उन्हें वैराग्य लाना नहीं पड़ा। जिन लोगों ने केवल ज्ञान की चर्चा की, उनको वैराग्य ग्रहण करना पड़ा, त्यागी होना पड़ा और वैराग्य के सोपान चढ़ने पड़े। जीवन में प्रेम हो तो घोर निराशाओं में भी हमें आशा का संचार हो सकता है। प्रेम के प्रवाह से जड़ चेतन में, अंधकार प्रकाश में, मिथ्या सत्य में, दु:ख आनंद में, भेद अभेद में, कोलाहल शांति में और मृत्यु अमरत्व में रूपांतरित होने लगते हैं। प्रेम में यह अनुभूति होने लगती है कि तुच्छ महान में और सूक्ष्म विराट रूप में बदल गया है। जैसे ही आप प्रेम की गहराई में डूबते हैं, वैसे ही आपके भीतर कुछ नया होने लगता है और कुछ दिव्य बनने लगता है। प्रेम के स्पर्श से ही हृदय में श्रेष्ठ भावनाएं उमड़ने लगती हैं। प्रेम के प्रभाव से मनुष्य के सद्गुण जगने लगते हैं, मन में प्रसन्नता का संचार होने लगता है। जैसे ही ये परिवर्तन होते हैं, हमारी सारी दिनचर्या ही बदल जाती है। हम स्वयं से प्रेम करें, पर उसमें हम स्वार्थ से ज्यादा परमार्थ की सोचें..।

आचार्यश्री” ने कहा निस्वार्थ सेवा करने वालों पर होती है – ईश्वर की कृपा। निस्वार्थ सेवा, भगवद-भजन, करुणापूरित, अन्तःकरण शास्त्रसम्मत जीवनशैली और सद्गुरुदेव वचन विश्वास सिद्धिकारक हैं। निस्वार्थ सेवा ही धर्म है। मुक्ति तो मात्र उसके लिए है, जो दूसरों के लिए सर्वस्व त्याग देता है। पश्चिम के लिए पूरा संसार ही बाजार है, जिससे लाभ लेना है; मगर भारतीय संस्कृति में पूरा संसार परिवार है, जिसको लाभ दिया जाता है। वर्तमान में हम उपभोक्तावादी संस्कृति का हिस्सा बनने लगे हैं, इसीलिए समाज में भय, चिंता, उन्माद आदि नजर आ रहे हैं। भारतीय संस्कृति के मूल में त्याग है। जो हमारे पास है, वो सिर्फ हमारे लिए ही नहीं है बल्कि दूसरों के लिए भी है। ये भावना मन में रहे तो समाज में आज नजर आ रहे कई दुर्गुण स्वयं ही समाप्त हो जाएंगे। निःस्वार्थ समाज सेवा ही वास्तव में ईश्वर सेवा है। भक्त नरसी मेहता ने वैष्णव की व्याख्या बड़े सुन्दर शब्दों में की है – ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराइ जाने रे।” भगवद्गीता के अनुसार जो फल की आशा रहित कर्म करता है वही ईश्वर भक्त है। प्रकृति की रक्षा करना व किसी भी प्राणी को कष्ट नही पहुंचना ही ईश्वर सेवा है, जिनका ये सिद्धान्त है, वही ईश्वर भक्त हैं। सद्वृत्तियाँ, सद्भावनाएं, परोपकार, सत्य, अहिंसा, आत्म-बलिदान, दृढ़ता, ईश्वरीय बुद्धि, शुद्ध आचरण, कर्तव्यपरायणता आदि यही ईश्वर भक्त के लक्षण है। ईश्वर भक्त के लिए प्रत्येक धर्म आदरणीय है। उसे किसी से द्वेष नहीं। मंदिर में बैठ कर पूजा करने वाला भले ही एक बार ईश्वर भक्त न हो, किन्तु जो सड़क पर गिरे हुए कोढ़ी को प्रेम से उठा कर सहायता करता है, वह अवश्य ही ईश्वर भक्त है…।