दृढ़ संकल्प, अनुशासन और समर्पण से लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है – अवधेशानंद गिरी जी महाराज

प्रयागराज। अभिमानरूपी पर्वतों के गलने पर ज्ञान की दरिया प्रवाहित होती है। विनम्रता, धैर्य और ईमानदारी से किया गया प्रयास सफलता दिलाता है। चुनौतियों के बीच अवसर पैदा होते हैं। दृढ़ संकल्प, अनुशासन और समर्पण से आप उच्चतम लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं ..!अभिमान मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यह मनुष्य को सर्वशक्तिमान ईश्वर से मिलने नहीं देता। परमात्मा सर्वव्यापक है, सर्वअंतर्यामी है। श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार अहंकार दीर्घ रोग है, यह वाहेगुरू मिलन में सबसे बड़ी बाधा है। यह सर्वविदित है कि जितना बड़ा रोग होगा, उतनी ही बड़ी समस्याएं पैदा करेगा। जिस प्रकार एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं, उसी प्रकार अहंकार और निरंकार इकट्ठे नहीं रह सकते। अभिमान कई प्रकार का होता है, जैसे – विद्यामद, अधिकारमद, यौवनमद, राजमद, धनमद आदि। व्यक्ति में जितना अभिमान बढ़ता जाता है, वह उतना ही प्रभु से दूर होता जाता है। ईश्वर के ध्यान से, भजन से, चिंतन से अहंकार दूर हो जाता है। अतः परमपिता के प्रकट होने से सभी प्रकार का अहंकार नष्ट हो जाता है। योग विद्या अभिमान को नष्ट करने के लिए रामबाण है।
आचार्य श्री नेे हनुमत चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि हनुमान जी ने बड़े से बड़े कार्य को छोटा बनकर किया। कार्य अज्ञ बनकर किया जा सकता है, विज्ञ बनकर नहीं। पहले से भरा हो पात्र तो उसमें कुछ डाला नहीं जा सकता। पात्र खाली हो तो ही कुछ प्राप्त किया जा सकता। अहंकार का मुख्य कारण है – अविद्या, अज्ञानता। वास्तव में हमें अपने स्वरुप के विषय में अज्ञानता रहती है और अपने आप के प्रति व्यक्ति अधिक आसक्त हो जाता है, कुछ भी भौतिक उन्नति कर लेता है तो उसको व्यक्ति अपने साथ जोड़ लेता है और उसको अपना ही स्वरूप व स्वभाव मान लेता है। यदि किसी के पास क्रोध और अहंकार (अभिमान) है तो उसको किसी दूसरे शत्रुओं की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यही उस व्यक्ति को समूल नाश करने के लिए पर्याप्त हैं। वही आचार्य श्री ने कहा अगर हम अपने आसपास दृष्टि दौड़ायें तो देखेंगे कि कितने ही लोग गंभीर विकलांगताओं से पीड़ित हैं। किसी का कोई अंग नहीं है तो किसी को कोई जानलेवा बीमारी है। इनमें से कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो इन चुनौतियों के बाद भी ज़िन्दगी को भरपूर जीते हैं। चतुर वही है, सुजान वही है जो अपने शरीर की कष्टों का असर अपने मन और आत्मा पर नहीं पड़ने देते। वृद्धावस्था में कई लोगों का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता, लेकिन यह बात उन्हें अपनी आत्मा की गहराई में शांति प्राप्त करने से रोक नहीं पाती। इसी प्रकार हम भी शारीरिक चुनौतियों के बावजूद मानव जीवन का भरपूर लाभ उठा सकते हैं। अंतर में प्रभु के संपर्क में आकर और उनके दिव्य प्रेम का अमृत चखकर हम वो प्रेम दूसरों में भी बाँट सकते हैं। ऐसा हममें से हरेक व्यक्ति कर सकता है, चाहे हमारी शारीरिक परिस्थितियां कैसी भी हो। यदि हम किसी बीमारी के कारण घर पर हैं, तो हम अपने परिवार के उन सदस्यों को प्रेम बाँट सकते हैं जो हमारी देखभाल कर रहे हैं। वास्तविकता तो यही है कि जो बीमार है वो सिर्फ़ हमारा भौतिक आवरण है; हमारी आत्मा तो हमेशा पूर्ण रूप से स्वस्थ रहती है। हम वास्तव में आत्मा हैं। हमारा सच्चा स्वरूप आत्मिक है। शरीर केवल आत्मा के ऊपर चढ़ा आवरण है। अध्यात्म के द्वारा हम अपने सच्चे आंतरिक रूप को पहचान सकते हैं। ध्यान-अभ्यास और प्रार्थना की सहायता से हम अपनी आत्मा को शरीर से अलग कर सकते हैं, ताकि हम जान सकें कि हम वास्तव में हैं कौन…?

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