शुभ संकल्प लोक-परलोक की विजय का आरम्भिक साधन है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार। अन्त:करण की आन्तरिक दिव्य-शक्तियाँ, अपरिमित-ऊर्जा एवं दैवीय-सामर्थ्य की जागृति का एकमात्र सहज साधन है – शुभ संकल्प। अतः मन शुभ-संकल्पित रहे…! केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसके पास श्रेष्ठ से श्रेष्ठ और तुच्छ से तुच्छ विचार दोनों एक समान होता है। उसके पास विचारों की चरम ऊंचाई है, तो आचरण की निम्नतम गति भी है। उठेगा तो इतना ऊंचा उठ जाएगा कि देवत्व लांघ ले और गिरेगा तो इतना नीचे गिर जाएगा कि पशु भी शर्मिदा हो जाएं। भारत के पास श्रेष्ठतम शास्त्र रहे हैं, एक से बढ़कर एक महापुरुष आए इस धरती पर, अवतारों ने जीवन जीने की कला सिखा दी, फिर भी लोग चूकते गए। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह रहा कि हमने विवेक-शून्य होकर इनका उपयोग किया। जिस दिन हम विवेकहीन हो जाते हैं, हमारा आधार ही खिसक जाता है। हम धार्मिक भावनाओं में इतने बह गए कि सही-गलत ही भूल गए। भावुकता उत्तेजना बन गई। यथार्थ का धरातल विवेक मांगता है। बड़े लक्ष्यों की पूर्ति के लिए कल्पनाशक्ति और दूरदर्शिता जरूरी है। पर बिना विवेक के ये भी घातक हैं। विचार जब ओवरफ्लो होते हैं, तो भाव बन जाते हैं। यह भावना का बहाव ही बहा ले जाता है। कोई बांध चाहिए जो इस बहाव का सदुपयोग कर ले। इसीलिए हमने गणेशजी को खूब पूजा है। वह विवेक के देवता हैं। यह तो स्पष्ट है कि उन्हें अकारण ही प्रथम पूज्य नहीं बनाया गया है। उनका विवेक शुभ से जुड़ा है और जब भी कोई कार्य शुभ से आरंभ होगा, विवेक से गुजरेगा तो उसे शत-प्रतिशत सफल होना ही है। इसलिए हर कार्य से पहले गणपति की आराधना होती है। गणेश उपासना इस धरती पर शुभ-संकल्प जगाने के अद्भुत प्रयोगों में से एक है..।

आचार्यश्री ने कहा – सफलता में वरदानों का एक समय बड़ा योगदान रहा है, लेकिन आज के युग में वरदान पुरानी किताबों के किस्से हो गए हैं। जब किसी की दिव्य वाणी विशेष प्रयोजन के लिए सत्य हो जाए, तो इसे वरदान माना गया था। अब इंसान की रसना प्रभावशाली नहीं रही। वरदान जैसे शब्द प्रसव ले सकें, इस मामले में जिह्वा बांझ हो गई है। हां, आशीर्वाद अभी भी गूंज रहे हैं। समझदारी से आशीर्वाद दिया और लिया जा सके, तो ये वरदान का विकल्प बन सकते हैं। सफलता अर्जित करने के लिए जिस संकल्प-शक्ति की आवश्यकता होती है, उसका निर्माण आशीर्वाद, प्राण और मन के मिलन से होता है। इन तीनों का उपयोग संकल्प को क्रिया में बदलता है। ये तीन बातें जीवन में असफलता लाती हैं – असहाय होना, स्वयं को असमर्थ मानना और अशक्त बन जाना। इनको संकल्प-शक्ति से ही पार पाया जा सकता है। अपने भीतर संकल्प पैदा करने के लिए बड़ों के आशीर्वाद के अलावा प्राण की आवश्यकता है। इसका अर्थ है – योग से अपने जीवनचर्या को जोड़ें। प्राणायाम को प्रबंधन का महत्वपूर्ण आधार बनाएं। इसके बाद आता है – मन। मन की रुकावटें अनेक शक्लें लेकर आएंगी। इसे निष्क्रिय किए बिना संकल्प सक्रिय नहीं हो पाएगा। प्राणायाम ही इसका इलाज है। अतः वर्तमान में मनुष्य के भीतर संकल्प-शक्ति जगाना सबसे बड़ा वरदान साबित होगा…।

आचार्यश्री ने कहा – सृष्टि के सकल विस्तार का मूल है – संकल्प। शुभ संकल्प हमारी दिशा और दशा को कल्याणकारी बना सकता है। मनुष्य स्वयं के संकल्प एवं सोच का परिणाम है। शुभ संकल्प लोक-परलोक की विजय का आरम्भिक साधन है। अगर आप जिन्दगी में कुछ करना चाहतें है तो आप के पास पहला संकल्प है, वह है – अच्छी सोच। हर सुबह एक नया जीवन है, सुबह अच्छा पढ़ने से जीवन अच्छा होता है और बुरा पढ़नें, बुरा सुनने, बुरा देखने से जीवन नकारात्मक हो जाता है, क्योंकि सुबह अच्छे विचारों के चिन्तन से अच्छी ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो पूरे दिन आपके चारो तरफ अच्छे आवरण का काम करती है। भूत, भविष्य, वर्तमान और प्रारब्ध सब परमात्मा की ही कृपा है, अपना सारा जीवन परमात्मा को अर्पण कर भोगना चाहिए। अतः जो लोग जीवन को त्याग पूर्वक भोगते हैं, प्रसाद पूर्वक भोगते हैं, विचार पूर्वक भोगते हैं, वो सदा सुखी रहते हैं …।