राष्ट्र के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अटल जी ने सत्ता ‘त्याग’ दी

नई दिल्ली। अटल जी का जीवन श्रीमद् भगवत गीता के पदचिन्ह था। अटल जी का पूरा जीवन ही त्याग पर आधारित था और त्याग पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था
नियतस्य तु संन्यास: कर्मणो नोपपद्यते।
मोहात्तस्य परित्यागस्तामस: परिकीर्तित्तत:॥
यानी जो कर्म जिसके लिए तय कर दिया गया है, उसका त्याग उचित नहीं और अगर मोह में फंसकर उसका त्याग कर भी दिया गया, तो वो अज्ञानता कहलाएगा।

गीत नया गाता हूं
टूटे हुए तारों से
फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती में
उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात
प्राची मे अरुणिम की
रेख देख पता हूं
गीत नया गाता हूं।

मन से कवि अटल जी भी हमेशा गीता के इसी उपदेश के साथ अपना जीवन जीते रहे, अपनी कविताओं के लिए राजनीति को छोड़ना तो बहुत चाहते थे , लेकिन राजनीति ही उनका कर्म था, और उसका त्याग तामस कहलाता, इसीलिए वो राजनीति को कभी छोड़ न सके।

अजातशत्रु अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था कि मैं राजनीति छोड़ना चाहता हूं, पर राजनीति मुझे नहीं छोड़ती.’ चूंकि मैं राजनीति में दाखिल हो चुका हूं और इसमें फंस गया हूं, तो मेरी इच्छा थी और अब भी है कि बगैर कोई दाग लिए जाऊं और मेरी मृत्यु के बाद लोग कहें कि वो अच्छे इंसान थे जिन्होंने अपने देश और दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने की कोशिश की।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इसके बाद त्याग का सही मतलब भी समझाया था कृष्ण ने कहा था-

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
संगं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्त्विको मत:॥ 9 ॥

यानी फल की चिंता किए बगैर निश्चित कर्म ही सात्त्विक त्याग कहलाता है और अटल जी ने भी यही सार मन में उतारकर सत्ता का त्याग किया, और राष्ट्र के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपना कर्म करते रहे

संसद में एक बार अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था “हम संख्या बल के सामने सर झुकाते हैं और आपको विश्वास दिलाते हैं जो कार्य हमने अपने हाथ में लिया है वो जबतक राष्ट्र उद्देश्य पूरा नहीं कर लेंगे तबतक विश्राम से नहीं बैठेंगे तब तक आराम से नहीं बैठेंगे अध्यक्ष महोदय मैं अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति महोदय को देने जा रहा हूं।

अटल जी के जीवन में गीता के भाव, गीता के उपदेश उतने ही घुले मिले हैं, जैसे सांसे वो हमेशा कृष्ण के बताये मार्ग पर चलते रहे, और बेदाग जीवन जीकर सही मायनों में कृष्ण के पार्थ बन गए।