जाइये अटल जी!! जाइए!!! लेकिन आपसे कुछ प्रार्थना है – राम महेश मिश्र

नई दिल्ली। सब कुछ तो दे ही दिया था इस देश को आपने। अब क्या शेष था देने को। हाँ! आपसे हमारी अन्तिम प्रार्थना यह है, उस लोक से यह आशीर्वाद अवश्य दीजियेगा कि ऋषि-राष्ट्र भारतवर्ष की धरा “अटल बिहारी” जनना बन्द न करे।
हे अटल! आशीर्वाद दीजियेगा कि आपकी प्रिय मातृभूमि कभी अकाल का दुख न भोगे। आशीर्वाद दीजियेगा कि यह धरती दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करे। इस देश की धरती पर गौ, गंगा, ग्रामदेवता किसान, श्रमिक, ऋषि और वीरों का सम्मान होता रहे। मंगलकामना कीजिएगा कि यह धरा सदैव हरी-भरी रहे।
हे ब्राह्मण श्रेष्ठ! आशीष दीजियेगा कि आपकी प्रिय मातृभूमि को फिर कभी विभाजन का दंश न झेलना पड़े। इस देश में जातियों व सम्प्रदायों में दूरी इतनी ज़्यादा न बढ़ जाए कि आपकी आत्मसत्ता को वहाँ भी पीड़ा झेलनी पड़े। प्रभु के आशीष भेजिएगा कि भारत के शीर्ष पुरुषों में ऋषि-राष्ट्र की वे सारी ख़ूबियाँ बरक़रार रहें, जिनसे वे आपकी मातृभूमि को वास्तविक उत्कर्ष के पथ पर आगे बढ़ाते रह सकें, इसकी मर्यादाओं को कदापि गिरने न दें।
और, यदि आपको पुनः पृथिवी पर आना पड़े तो इसी देश में आइयेगा, संकीर्णता की बाढ़ और चरित्र व नैतिकता के अकाल वाले इस कालखण्ड में यहाँ आपकी बड़ी आवश्यकता है।
आपके और हिमालय के परम तपस्वी गायत्रीपुत्र परम पूज्य गुरुदेव के युग में जन्म लेना हमारे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इसके लिए अपनी स्मृतिशेष माँ का हृदय से आभारी हूँ। आज आपकी हस्तलिखित निम्नलिखित चार लाइनें हम-सबको भीतर तक कचोट रही हैं।आशीर्वाद दीजिए कि हम-सब आपके दर्द को बँटाने की दिशा में कुछ ख़ास कर सकें:-
“सूर्य गिर गया अन्धकार में ठोकर  खाकर।
भीख माँगता है कुबेर झोली फैलाकर।
कण-कण को मोहताज कर्ण का देश हो गया।
माँ का अंचल द्रुपद सुता का केश हो गया।”
-अटल विहारी बाजपेयी
जाइये अटल जी! वैचारिक रूप से खण्ड-खण्ड हो चुका भारत आज आपके महाप्रयाण पर आँखों में अश्रु और श्रद्धा से झुके शीश लिए ‘एक होकर’ खड़ा है। आपकी यह मिट्टी कई सदियों तक आपको अपनी सबसे प्रिय सन्तान के रूप में स्मरण रखेगी।