क्रोध पर नियंत्रण चाहते हैं तो अहंकार को हमें सबसे पहले कुचलना होगा-  अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार। आज भारतमाता मंदिर, हरिद्वार में भारतमाता मंदिर के संस्थापक, निवृत शंकराचार्य, पदमभूषण, महामंडलेश्वर स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज के पावन सानिध्य में एवं परम पूज्य आचार्य महामंडलेश्वर जूना पीठाधीश्वर अवधेशानंद गिरि जी महाराज की अध्यक्षता में “तुलसी विवाह महोत्सव” मनाया गया।

इस अवसर पर आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि जी महाराज ने कहा क्रोध अग्नि सबसे बुरी है; वासना एक सर्व-उपभोक्ता आग है। दोनों ह्रदय को झुलसाने का कार्य करते हैं। प्रेम और पवित्रता के माध्यम से इन्हें बुझाया जा सकता है..! क्रोध को अग्नि के समान कहा गया है, जिसमें दूसरा व्यक्ति बाद में जलता है, पहले क्रोध करने वाला ही जलता है; क्योंकि क्रोध में व्यक्ति भला-बुरा नहीं सोच पाता और अहित कर बैठता है। अंगद ने रावण को समझाया कि क्रोध के कारण तुम मेरी बात अभी समझ नहीं रहे हो, यही क्रोध तुम्हें मृतक समान बना रहा है। क्रोध में व्यक्ति का स्वयं पर नियंत्रण छूट जाता है। क्रोध अग्नि से व्यक्ति का विवेक जल जाता है। क्रोधी व्यक्ति कुछ भी कह सकता है और कुछ भी कर सकता है। महापुरुषों ने क्रोध को अग्नि की उपमा दी है। अग्नि जहां प्रकट होती है, उसे जलाती है और जो अग्नि को स्पर्श करता है, वह उसे भी जलाती है। इसी प्रकार क्रोध की अग्नि जिस हृदय में प्रकट होती है, उसको तो दुःखी करती ही है, आस-पास वालों को भी पीड़ा पहुँचाती है। क्रोध की सबसे पहली अभिव्यक्ति मनुष्य के चेहरे पर दिखाई देती है। व्यक्ति को क्रोधित अवस्था में एक बार अपना चेहरा दर्पण में अवश्य देखना चाहिए। प्रयास ये रहे कि क्रोध को मन की भूमि पर जमने ना दें। एक स्थान पर पड़ा हुआ कचरा जैसे दुर्गंध फैलाता है, ऐसे ही संग्रहित क्रोध जीवन में हाहाकार मचा देता है। पूज्य “आचार्यश्री” जी के अनुसार जिंदगी का हर एक-एक क्षण बहुमूल्य है। जीवनरूपी सागर मे समस्याओं का विष भी है तो समाधान का अमृत भी है। विष का संस्कारित रूप ही अमृत है। अमृत का विकृत रूप विष है। ऐसे में क्रोध को त्यागकर ही अमृतपान करने में जीवन की सार्थकता है…।

“आचार्यश्री” ने कहा प्रेम जल है और क्रोध अग्नि। जितनी तीव्र अग्नि होगी, उतना ही जल उसे बुझाने के लिए डालना होगा। क्रोध-अग्नि, समता के जल से ही शांत होती है। जिस प्रकार मुकुट से राजा की, पति से पत्नी की, भगवान से मंदिर की शोभा होती है, ठीक उसी प्रकार समता से संत-सत्पुरुषों की शोभा होती है। जैसे स्वादिष्ट भोजन के लिए नमक जरूरी है, वैसे ही जीवन में समता का होना अति आवश्यक है। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा कि जिस प्रकार दूध में आए उफान को जल के छीटों से शांत किया जा सकता है, उसी प्रकार क्रोध रूपी अग्नि समता रूपी जल के छीटों से ही शांत हो सकती है। समता एक ऐसा वशीकरण मंत्र है, जो शत्रु को भी वश में कर सकता है। क्रोध पर काबू पाने का श्रेष्ठ उपाय समता को धारण करना ही है। अनुकूल समय में समता को धारण करना श्रेष्ठ है, लेकिन अनुकूल के साथ प्रतिकूल समय में भी समता को बनाये रखना ही सर्वश्रेष्ठ है। समन्वय की कला सफलता और शांति दिलाती है..।

“आचार्यश्री” ने कहा क्रोध हमारे विवेक पर प्रहार करता है । क्रोध का मुख्य कारण अहंकार है। अगर हम क्रोध पर नियंत्रण चाहते हैं तो अहंकार को हमें सबसे पहले कुचलना होगा। क्रोधरूपी अग्नि को शांत करने के लिए हमें जिम्मेदारियों की रेत उस पर डालनी होगी। जिन पर जिम्मेदारियों का बोझ होता है, उन्हें रूठने और टूटने का हक नही होता।

“आचार्यश्री” ने बताया कि क्रोध कैसे आता है? अहम् पर चोट पडऩे से क्रोध आता है। अन्दर में यह जो अहंकार बैठा है, वही क्रोध का कारण है। जो हमें बार-बार जन्म-मरण के चक्कर लगवाता है। अगर कुछ करना ही है तो इस अहंकार को कम करने की कोशिश करें, जीवन अपने-आप सुखमय होता चला जायेगा। स्वार्थ और अभिमान का त्याग करने से जीवन में साधुता आती है। अच्छाई का अभिमान बुराई की जड़ है। आप अपनी अच्छाई का जितना अभिमान करोगे, उतनी ही बुराई पैदा होगी। इसलिए हमें अच्छा दिखना नही अच्छा बनना है। अच्छे बनो, पर अच्छाई का अभिमान मत करो। जिसे स्वयं का अभिमान नहीं, रूप का अभिमान नही, ज्ञान का अभिमान नहीं, जो सभी प्रकार के अभिमान को छोड़ चुका है, उसे ही परमानन्द की, ब्रह्मानन्द की प्राप्ति होती है..।