“क्रोध करने से होता है खुद का नुकसान- सुधांशू जी महाराज

नई दिल्ली। सोचो! अगर आग जलेगी तो वह क्या करेगी? सबसे पहले वह क्या करती है? इसका सटीक जवाब यह है कि वह जहाँ जलती है, सबसे पहले उसी को जलाती है। माचिस की तीली से अगर आग को प्रकट कीजिए तो आग तो प्रकट हो जायेगी, लेकिन माचिस की तीली को पहले जलाएगी। बाकी  किसी का नुकसान हो या न हो, यह बाद की बात है। इसी भाँति क्रोध जहाँ जागेगा, उसी का नुकसान करेगा।
पुराण में एक कथा है कि प्रचेता नाम के एक बड़े साधक को सिद्धियाँ प्राप्त करने के बाद बड़ा अहंकार हो गया। एक दिन एक अनोखी घटना घटी। लोगों ने देखा कि साधक प्रचेता सिद्धियों के गर्व में झूमता चला जा रहा है। सामने से कल्याणपाद नाम का एक व्यक्ति आ रहा है। एक छोटी सी पहाड़ी पगडंडी पर दोनों आमने-सामने चले आ रहे हैं। प्रचेता ने कल्याणप्रद से कहा- रास्ता छोड़ो। कल्याणपाद ने कहा कि तुम रास्ता छोड़ो। कथा बड़ी विचित्र है लेकिन उसका सार यह है कि प्रचेता ने गुस्से में आकर कल्याणप्रद से कहा कि मेरे पास सिद्धियाँ हैं, मैं जो चाहूँ वह कर सकता हूँ और तुम्हें नुक़सान पहुँचा सकता हूँ। कल्याणप्रद नहीं हटा और मंद-मंद मुस्कराता रहा।
कहते हैं कि प्रचेता ने कल्याणप्रद पर अपनी सिद्धियों का प्रयोग कर दिया और कहा- तू राक्षस हो जा। पुराण की कथा है कि वह राक्षस हो गया। मालूम है, राक्षस बनने के बाद उसने क्या किया? उसने पहला काम यह किया कि प्रचेता को ही पकड़ा और उसको खा गया। पुराणकार आगे लिखते हैं कि प्रचेता वस्तुतः प्रचण्ड रूप धारण करने वाला क्रोध है। क्रोध के दौरान तुम जो कुछ भी करोगे, वह विस्तार पाकर राक्षस बन जायेगा। वह किसी और को नुकसान पहुँचाए या न पहुँचाए, तुम्हारा नुक़सान ज़रूर करेगा।
लेखक आनंद धाम नई दिल्ली के संस्थापक हैं।