मानवता के लिए समर्पित रहा ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का जीवन 

अजमेर/ बुशरा असलम। भारत में अनेक तीर्थ हैं जो सभी धर्मों के लिए आस्था का केंद्र हैं। पवित्र पावन भूमि औलिया, सूफियों और मानवता का पाठ पढ़ाने वाली पुण्य आत्माओं से प्रकाशमान है। इनमें सबसे प्रसिद्ध नाम हजरत ख्वाजा गरीब नवाज का है अजमेर शरीफ हजरत  ख्वाजा मयूनिद्दीन चिश्ती का दरगाह अजमेर का गहना है। यह मुकद्दस इबादत की जगह ना सिर्फ मुसलमानों के लिये है बल्कि उन सभी मजहब के लिये है जो गरीब नवाज में अपना यकीन रखते हैं। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती एक ऐसे संत थे जिनकी पूरी जिंदगी मानवता, करुणा, दया और परोपकार की मिसाल थी। गरीब नवाज में आस्था रखने वाले अकीदतमंदों को ख्वाजा ने इन्हीं राहों पर चलना सिखाया।

आज भारत में अमन चैन कायम है, तो ऐसे ही संतों के दम पर। दरअसल ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती का पूरा जीवन मानवता के लिए समर्पित रहा। गरीबों के प्रति दया, करुणा और समर्पण भाव रखने के कारण वे गरीब नवाज गरीबों के रक्षक कहलाए। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में जाति, धर्म, क्षेत्र के नाम पर नफरत का जहर घोलने वालों को मानवियता और धार्मिक सद्भावना का संदेश देती है। सामाजिक सौहार्द का जीवंत उदाहरण बन चुकी सूफी संत गरीब नवाज ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह सभी धर्मों के लिए पवित्र स्थल है। खासतौर पर इस्लाम धर्म के अनुयायियों के लिए मक्का के बाद मुस्लिम तीर्थ स्थलों में अजमेर शरीफ का दूसरा स्थान है। यही वजह है कि यह ‘भारत का मक्का’ कहलाता है। भारत में दरगाह अजमेर शरीफ ऐसा पवित्र स्थान है जिसका नाम सुनने मात्र से ही श्रद्धालुओं को आत्मिक शांति मिलती है। गरीब नवाज के पास इस यकीन के साथ लोग चले आते हैं कि ख्वाजा हर दुआ को पूरी करते हैं। ख्वाजा कभी किसी को निराश नहीं करते।

अजमेर शरीफ की दरगाह हिन्दुस्तान में बड़ी अहमियत रखती है। खास बात यह है कि ख्वाजा पर हर मजहब के लोगों का यकीन है। उन्होंने 12वीं शताब्दी में अजमेर में चिश्ती परम्परा की बुनियाद रखी। ख्वाजा जी का जन्म इरान में हुआ था। बचपन से ही ख्वाजा जी का मन दीनी चीजों की तरफ लगता था। वे इन्सानी खिदमद को ही अपनी मंजिल मानते थे। पचास साल की उम्र में ख्वाजा जी ने हिन्दुस्तान का रुख किया और बाकी उम्र अजमेर शरीफ में गुजारी वे हमेशा अल्लाह से दुआ करते थे कि “ऐ मेरे रब.. उन सभी मुरीदों के दुख दर्द मुझे दे दे और उनकी जिन्दगी को खुशियों से भर दें

वरिष्ठ इतिहासकार अम्बुजेश शुक्ल ने बताया कि एक बार बादशाह अकबर ने दुआ मांगी कि अगर उन्हें बेटा हुआ तो वे खुद पैदल चलकर ख्वाजा के दरबार में जियारत पेश करने आएंगे। सलीम को बेटे के रुप में पाने के बाद अकबर ने आमेर से अजमेर तक का सफर पैदल चल कर तय किया। 

उंची पहाडियों के बीच बसा है अजमेर शहर 

अजमेर शहर उंची पहाडियों के बीच बसा है। जैसे चार दीवारी में एक किला हो इससे मिला हुआ तारागढ़ पहाडी है और इसी पहाडी के दामन में हजरत ख्वाजा गरीब नवाज रसुल अस्सलाम की दरगाह है जो एक बडे रकबे में चार दीवारी के अन्दर है। दरगाह शरीफ के छतों में झालर मशरिख में गली लंगर खाना और मुहल्ला खादिमान और मगरिम में वो दरवाजा है जो मंगोलिया दरवाजे से होकर कोट और तारा गढ़ को जाता है। यहां आने वाले लोग चाहे किसी मजहब के क्यों ना हों ख्वाजा के दर पर दस्तक देने के बाद उनके ज़़हेन में सिर्फ अकीदा ही बाकी रहता है।

 

इल्मी तामीर के नजरिये से भी बेजोड़ है दरगाह शरीफ

तारागढ़ पहाडी की तलहटी में स्थित दरगाह शरीफ इल्मी तामीर के नजरिये से भी बेजोड़ है। यहां ईरानी और हिन्दुस्तानी तामीर का खूबसुरत मेल नजर आता है। दरगाह में दाखिल होने का दरवाजा और गुम्बद बेहद शानदार है। दरगाह का गुम्बद संगमरमर से बना हुआ है जिसमें जरीन मढ़़वाई गयी है जिसका कुछ हिस्सा बादशाह अकबर ने तो कुछ जहांगीर ने पूरा कराया था।

दरगाह शरीफ के इमाम सैयद जैनुल आबेदीन अली खान ने बताया कि दरगाह को पक्का करवाने का काम मांडू के मौजूदा सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने करवाया था। दरगाह के अंदर बेहतरीन नक्काशी किया हुआ एक चांदी का कटघरा है इस कटघरे के अंदर ख्वाजा साहब की मजार है। यह कटघरा जयपुर के महाराजा जय सिंह ने बनवाया था। उन्होंने बताया कि दरगाह की बनावट हुमायूं के दौर में दरवाजे के पास मश्जिद को अकबर ने और मजार के उपर का दिलकश गुमबद शाहजहां के दौर में तैयार किया गया। साथ ही उन्होंने कहा कि दरगाह के आस पास कई ऐसी इमारतें भी मौजूद हैं जहां मन्नत मांगने के बाद धागा बांधने की रवायत है हालाकि मुराद पूरा होने पर इसे खोला नहीं जाता।

उर्स में उमड़ते हैं देशदुनिया से भारी तादाद में अकीदतमंद

दरगाह शरीफ में हर साल उर्ष का आयोजन किया जाता है इस उर्स में दुनियाभर से हजारों की तादाद में लोग शरीख हैं। यह उर्श इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार रज्जब महीने में पहली तारीख से छठीं तारीख को मनाया जाता है छठीं तारीख को ख्वाजा जी की वर्सी मनाई जाती है। उर्स के दौरान देश भर से आये कौव्वाल अपनी कौव्वाली के जरिये ख्वाजा साहब की शान में कौव्वाली पेश करते हैं। इस मौके पर देश भर से लाखों लोग चादर चढ़ाने के लिये अजमेर शरीफ आते हैं

मशहूर है अजमेर का बुलंद दरवाजा

अजमेर शरीफ में देखने वाली चीजों में से एक है बुलंद दरवाजा जो सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी की आतिया से बना है। दूसरा बुलंद दरवाजा शुमाल सिंथ की तरफ है जो अह दरगाह का मरकसी दरवाजा है यह हिजरी में 1915 में निसम उसम खान द्वारा बनवाया गया है इस दरवाजे के उपर की तरफ दो बड़ीं मरकजी नक्कार खाना हैं जिन्हे बादशाह अकबर ने बनवाया था इस नक्कार खाने को बादशाह अकबर ने बंगाल मार्का की कामयाबी की खुशी में तोहफे में दिया था इसी दरवाजे के पास दो बड़ी देग रखी है। सहानी चिराग के अन्दर बुलंद दरवाजे के सामने बड़ी देग को रखी गई है जो बादशाह अकबर ने अपनी मुराद पूरी होने पर दरगाह मे पेश की थी इस देग में 4800 किलो खाना पकाया जाता है जिसका खर्च 120000 होता है। इस देग का बना खाना लोगों के लिये प्रसाद के रुप में दिया जाता है। जिसे वहां काम करने वाले खानसामें बनाते हैं। दरगाह में कहीं बेहतरीन तामीर मजहर सहन औऱ दालान हैं जिनमें से बहुद मुगल इल्मी तामीर की मिसाल है जो मुगल दौर में तामीर की गई थी। बादशाह अकबर पहले मुगल शासक थे जिन्होंने अपने पैरों पर चलकर दरगाह में सलामी भरी थी जब अजमेर शहर उनकी मिल्कियत में आ गया था, उन्होने दरगाह में सन 1571 हिजरी में अकबरी मस्जिद की तामीर की जिसका एक हिस्सा अब एक अरबी और फारसी मदरसा है जो दरगाह के हुक्मरान से चलता है।

चिस्ती खानदान का झंडा लगा कर किया जाता है उर्स की शुरुआत

हर साल रज्जब महीने के पहले हफ्ते में ख्वाजा जी की याद में यहां उर्स मनाया जाता है कहा जाता है कि जब ख्वाजा जी 114 साल के थे तब उन्होने खुद को एक कमरे में इबादत करने के लिये बंद कर लिया था और उसी दौरान अपना जिस्म छोड़ दिया था और उन्ही की याद में उर्ष मनाया जाता है। उर्स की शुरुआत चिस्ती खानदान का झंडा लगा कर किया जाता है। दरगाह में जन्नती दरवाजा भी है जो साल में 4 बार खोला जाता है ऐसा कहा जाता है जो जन्नती दरवाजा पार करता है उसे जन्नत मिलती है। इस जन्नती दरवाजे को कुल सात बार पार करना होता है। उर्स का आखिरी दिन बहुत ही अहम माना जाता है। सुबह से लेकर शाम तक यहा लोगों की जमात लगती है। उसके बात ख्वाजा जी की शान लोग इबादत करते हैं। ख्वाजा जी के दरबार मे आकर लोग अपना नजराना पेश करते हैं। ये नजराना फूल इत्र अगरबत्ती जैसी चीज होती है। उसके बाद अपनी मुरादें लिख कर लोग ख्वाजा जी की मजार की रस्सी से बांध देते हैं। इस उम्मीद से कि उनकी दुआ कुबूल होगी। ख्वाजा जी की दुआ सबके लिये है। चाहे वो अमीर हो या गरीब,  माना जाता है जो भी तहे दिल से दुआ किया उसकी हर मुश्किले ख्वाजा जी आसान कर देते हैं…..