आखिर देश में क्या है प्रकृर्ति की वर्तमान स्थिति

लखनऊ। वर्तमान युग में मानव की प्रवृति अगर प्रकृति से सहयोग करने की है भी तो उसके पीछे मूल मंतव्य “उपयोगिता“ ही है। विश्व में आज उपभोक्ता वादी संस्कृति का प्रसार है जिसमें सोच प्रकृति के उपयोग व् उपभोग की दृष्टि से ही उससे संघर्ष व् सहयोग के सम्बन्ध को साधा जाता है और इस वैचारिक धरातल में दोनों में साहचर्य और तादाम्य की स्थापना संभव नहीं है। आधुनिक विश्व पश्चिमी विचार शैली की अंधाधुंध पोषक बनती जा रही है जिसके चलते उपभोक्तावादी संस्कृति अधिकांश देशो व् मानव समूहों की संस्कृति बनती जा रही है जिसके चलते प्रकृति के प्रति आचार विचार स्वार्थपूर्ण व् शोषणपरक बनता जा रहा हैै। कम समय में अधिकत्तम प्राप्ति रुपी सोच की छटपटाहट, भौतिक उन्नति को ही विकास का पर्याय मानने वाली मूढ़ प्रवृति आवश्यकताओं की अनंत, स्वयं में पाली हुई अपेक्षाओं की पूर्ति करने की भोग लिप्सा, अब सर्व भावेन भारतः की भी होती जा रही है।

इसलिए पाश्चात्य भौतिक संस्कृति की उपभोक्तावादी प्रवृति से संरक्षण की अपेक्षा करना मुर्खता है क्योंकि इसके लिए चेतना के विस्तार को बुद्धि के पार जाने की आवश्यकता होती है जहाँ आत्मस्थ हृदय है जो केवल भारतीय संस्कृति के विचार “अखंड मंडलाकारं’’ में ही है। अतः भोगवादी संस्कृति को पुनः लिखित रूप देकर क्रमशः उनकी उसी सोच को बढ़ावा दे रहे है हम जबकि इनकी सोच इन्हें ही मुबारक हो।

प्राकृतिक संतुलन में मानव ही है जो हस्तक्षेप कर सकता है। अतः उसे ही सर्वाधिक सजग व् सावधान रहना ही समाधान है।

सुखोपभोग का पूर्ण निषेध कुंठा का कारण बन सकता है और भोगलिप्सा का अतिरेक विनाशकारी होता है इसलिए मानव जीवन में भोग और त्याग का संतुलन स्थापित करने वाले सांस्कृतिक मन चाहिए क्योकि सस्टनेबल मन की वृत्तियों के आभाव में सस्टनेबल डेवलपमेन्ट संभव नही है। क्योकि सस्टनेबल डेवलपमेन्ट का अर्थ ही होता कि ‘‘भविष्य की आवश्यकताओ को ध्यान में रखते हुए वर्तमान की आवश्यकताओ की पूर्ति करना। इसके लिए प्रशिक्षित मन का होना नितांत आवश्यक है’’।

(लेखक डॉ सुधीर मिश्र लखनऊ विश्वविद्यालय में प्लेसमेंट ऑफीसर हैं)