प्रकृति को संस्कृति से जोडें- डॉ. सुधीर मिश्र

लखनऊ। प्राकृतिक अनुराग एवं प्रकृति संरक्षण की चिंतन धारा भारतीय संस्कृति की विशेषता है। भारतीय ऋषि मनीषियों को प्रकृति का पारदर्शी व पर्यावरण प्रणाली का सम्पूर्ण व् समग्र ज्ञान था। उन्हें प्रकृति, जीव के अन्तर्संबंधो और इन संबंधो से उपजे परिणाम व् प्रभावों का पूर्ण ज्ञान था जिसके चलते भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माता के महनीय पद और उसके घटक पंचतत्वो तथा वृक्ष वनस्पतियों को देव तुल्य मानकर अभ्यर्थना की जाती है। प्रकृति और पर्यावरण की इन्ही सब विशेषताओं के कारण ही यहां पर पर्यावरण संरक्षण और इसके विकास के प्रति सतत जागरूकता बनी रही। लेकिन पर्यावरण के प्रति इस भावधारा के निरंतर तिरोहित होने से शोषण व शोषक रुपी आत्मघाती मनोवृति पनपी जिसके अभिशप्त परिणाम से सभी परचित हैं। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को मातृ तत्व के रूप में स्वीकार्य किया गया है और स्वयं को इसका पुत्र मानकर ही इसकी शरण में जाते हैं। माता अपने पुत्र को आंचल में रख कर प्यार करती है इसी कारण यहां पृथ्वी को प्रकृति का प्रतीक प्रतिनिधि मानकर “माता भूमिः पुत्रोअहम पृथिव्याः“ का भाव भरा मंत्रोचार किया जाता है। इसी अन्तस्थ भाव के उद्गार में वह ललक प्रतिविंबित होती है जो एक मां का अपनी संतान के प्रति होता है, जिसके चलते धरती केवल एक जमींन का टुकड़ा या वेजान वंजर नहीं अपितु जीवंत प्रतिमा है और हम अपने प्राणों से इसका अर्घ्यदान करते हैं।

सांकृतिक व्यक्ति प्रकृति को आत्मीयता और अंतरंगता से देखेगा और उसका रस ग्रहण करना चाहेगा – न कि शोषण। गायत्री मंत्र में “ॐ भुभुर्वः स्वः’ में आत्मनिवेदन पूर्ण सच्ची लालसा प्रकट की गयी है कि “जो सूर्य पृथ्वी, भुव और स्वर्ग तीनो लोकों को आलोकित करता है वह मेरी बुद्धि को भी दिव्य व् प्रखर करे। सूर्य के तेज को बुद्धि के तेज से जोड़ने की कामना प्रकृति के तत्व को संस्कृति से जोड़ने की कामना ही तो है। वामन पुराण में तो प्रातः काल उठते ही पांचो तत्वों का स्मरण करने की परंपरा पर जोर दिया गया है। “पृथ्वी अपनी सुगंध, जल अपने बहाव, अग्नि अपने तेज, अन्तरिक्ष अपनी ध्वनि और वायु अपने स्पर्श गुण के साथ प्रातः काल को अपना आशीर्वाद दे यही हमारी कामना है”

पृथ्वी से आत्मीय लगाव की बात अथर्ववेद में कही गयी है-

“जिस धरती पर वृक्ष, वनस्पति एवं औषधियां है, जहां स्थिर व् चंचल सबका निवास है उस विश्वम्भरा धरती के प्रति हम कृतज्ञ हैं और हम उनकी स्वतंत्रता की प्राण पण से रक्षा करेंगे इन सभी जीवंत उदाहरणों के इतर अपनी लिप्सा के कारण मनुष्य जब प्रकृति और पर्यावरण का विनाश करता तो उसका परिणाम भयावह होता है। हम सब इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि वनस्पति जगत और जंतु जगत दोनों का समाज कल्याण से सीधा सम्बन्ध है। वस्तुतः भारत का कोई भाग ऐसा नहीं है जहां पर्यावरण को संस्कृति का स्वरूप न दिया गया हो। भूमि और जल का योग ही संस्कृति का परिचायक है। ऋषि एवं कृषि की इस संस्कृति में वन संपदा, वनस्पति, औषधि, अन्न एवं कृषि संपति इसी कारण उपजते हैं। उपर्युक्त बातें पर्यावरण और संस्कृति के उन संवेदनशील संबंधो को रेखांकित करती है, जहां पर जीवन को नया आयाम मिलता था और जीवन स्वभाविक रूप से विकसित होता था।

“जब तक यह संबंध सुदृढ़ था, तब तक जीवन की समस्याएं भी इतनी जटिल नहीं थी। सभी अपने प्राकृतिक परिवेश में प्रसन्न एवं समूह में रहते थे। मनुष्य और मनुष्य के बीच, मनुष्य एवं अन्य जीवों के बीच तथा पृथ्वी के सभी जड़ जंगम घटक एक संतुलित क्रम में रहते थे। यही आज इकोसिस्टम और इसकी विविधता को बायोडायवर्सिटी कहते हैं जो प्राचीन समय में अत्यंत उन्नत, विकसित एवं मजबूत होती थी। लेकिन जबसे मनुष्य की संकीर्ण स्वार्थपरता ने इस संवेदनशील संबंधो को नकारा व् उसे तोड़ने लगा तबसे नित नूतन समस्याओं की बाढ़ आने लगी और धीरे धीरे सब बिखर सा गया क्योंकि जिससे इन्सान को पोषण मिलता है, वही धीरे धीरे जहर बनते जा रहे हैं और इसे ऐसी स्थिति में किसी और ने नहीं बल्कि हमने ही लाया है।

पर्यावरण की महत्ता इतनी थी कि हमने उसे अपनी शाश्वत संस्कृति में स्थान देकर उसे सनातन बनाया परन्तु व्यवसायिक बुद्धि ने इस संवेदनशील सम्बन्ध को इतना तार तार किया कि लगता है सब कुछ खो सा गया है। नदी जल, बहती प्राण वायु, अन्न उपजाने वाली भूमि सभी प्रदूषित एवं स्तत्वहीन होते जा रहे हैं।
आज न तो इन्सान की पर्यावरण के प्रति कोई जिम्मेदारी ही बची है और न उसे निभाना चाहता है। ऐसे में इसका सांस्कृतिक मूल्य भला कैसे रहेगा। सांस्कृतिक मूल्यों के अनुभव अत्यंत सूक्ष्म एवं व्यापक होते हैं और हमारी भावनाओं के क्षेत्र से होकर गुजरते हैं। आस्था व् विश्वास के बिना हम धरती को माता समान नहीं इसे मिटटी का टुकड़ा ही मान सकते हैं। आस्था आंतरिक चीज है जो गहराई में होती है जिसमें आत्मीयता पूर्ण भावों के साथ प्रकृति व पर्यावरण से मानव को भी जुड़ने वाली उर्जा रुपी मूल सोच प्रकृति प्रदत्त है। आज के बाजारीकरण के युग में इसका स्थान ओझल होता जा रहा है जिसके चलते हमारे संबंध प्रकृति से टूट व बिखर रहे हैं। प्रकृति, पर्यावरण संस्कृति और मनुष्य की आज जो दुरवस्था है, उसे केवल इनके बीच पुनः वही संबंध दूर कर सकते हैं।

“हमें वापस उन्ही मूल्यों की ओर लौटना पड़ेगा जहाँ जीवन बड़ा ही खुशहाल था साथ ही समस्याओं का समाधान सरलता से हो जाया करता था।
“प्रकृति हमें जीवन देती है उसके प्रति हमें भावपूर्ण होकर कृतज्ञ होना होगा और उसकी सुरक्षा, संरक्षण एवं विकास के लिए नूतन पुरुषार्थ और प्रयत्न करने होंगे।
“यही युग की मांग और वर्तमान समस्याओं का समाधान ही नहीं भविष्य का सही ज्ञान रुपी विज्ञान भी है।

(लेखक डॉ. सुधीर मिश्र लखनऊ विश्वविद्यालय में प्लेसमेंट ऑफीसर हैं)