निराश व्यक्ति केवल ईर्ष्या-द्वेष की भावनायें ही फैला सकता है- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

मनुष्य उत्तरोत्तर प्रगति चाहता है। मनुष्य में न केवल जिजीविषा है, अपितु गौरव के साथ जीने की तत्त्वगत मौलिक आकांक्षा विद्यमान है। जब व्यक्ति के गौरवपूर्ण जीवन के आवेश को समष्टिगत समर्थन प्राप्त हो जाता है, तब व्यक्ति के अंदर एक विशिष्ट प्रकार का आध्यात्मिक उत्साह जन्म लेता है ..! जिन शक्तियों से मनुष्य जीवन के निर्माण कार्य पूरे होते हैं, उत्साह उनमें प्रमुख है। इससे रचनात्मक प्रवृत्तियाँ जागती हैं और सफलता का मार्ग खुलता है। उत्साह के द्वारा स्वल्प साधन और बिगड़ी हुई परिस्थितियों में भी लोग आत्मोन्नति का मार्ग निकाल लेते हैं। बाल्मीकि-रामायण का एक सुभाषित है – “उत्साहों बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्। सोत्साहस्य त्रिलोकेषु नकिञ्चदपि दुर्लभम् …”॥ अर्थात्, “हे आर्य! उत्साह में बड़ा बल होता है, उत्साह से बढ़कर अन्य कोई बल नहीं है। उत्साही व्यक्ति के लिये संसार में कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है।” कार्य कैसा भी क्यों न हो, उसे पूरा करने के लिये उत्साह अवश्य चाहिये। आप अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हों तो आपको अपने उद्देश्य के प्रति उत्साही बनना पड़ेगा और अपनी संपूर्ण सामर्थ्य से उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करना होगा। अरुचि और अनुत्साह से काम करेंगे तो थोड़ी बहुत जो सफलता मिलने वाली भी होगी, वह भी न मिलेगी। इसके विपरीत यदि रुचि और साहस के साथ काम करेंगे तो कठिन कामों को पूरा करने के लिये भी एक सहज-स्थिति प्राप्त हो जायेगी। उत्साह सबसे बड़ी शक्ति है तथा निराशा सबसे बड़ी कमजोरी है। जीवन को हमें उत्साह से भरना है या निराशा से यह हमारे ऊपर पूरी तरह से निर्भर है। जीवन को उत्साहित बनाये रखने के लिए परिस्थितियों का नहीं वरन् मनोस्थिति का अत्यधिक महत्व है। कुछ लोग अभाव में भी उत्साह से भरे होते हैं। वहीं इसके विपरीत कुछ लोग जीवन में सब कुछ होते हुए भी निराशा से घिरे होते हैं। जीवन को उत्साह से भरने के लिए एक विचार, एक गीत, एक पुस्तक और एक मित्र ही काफी होता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने वृद्धावस्था में श्रीरामचरितमानस लिखनी प्रारंभ की थी और जीवन के अंतिम क्षणों तक राम का संदेश घर-घर पहुंचाते रहे। इस तरह यदि मन में उत्साह हो तो उम्र कभी भी कार्य के मार्ग पर बाधा नहीं बनती। बाधा बनती है तो केवल हमारी सोच की संकीर्णता। यदि कार्य करना है तो किसी भी उम्र में कार्य किया जा सकता हैं, कार्य करने के तरीके बदले जा सकते है और पहले की तुलना में अधिक अच्छे ढंग से व कुशलतापूर्वक कार्य किया जा सकता है। अपने अनुभवों से दूसरों की मदद करने वाले लोग ही अपने कार्यों की खुशबू से देश व समाज को महकाते हैं व मिसाल बनते हैं। इस प्रकार जीवन उमंग, उत्साह एवं उद्देश्य से परिभाषित होता है, उम्र से नहीं …।

“आचार्यश्री” ने कहा – आध्यात्मिक प्रक्रिया, जीवन में एक उत्साह की तरह होती है। उत्साह से बड़ी और कोई शक्ति नहीं एवं आलस्य से बड़ी कोई कमजोरी भी नहीं है। सच में आलस्य हमारे जीवन में ऐसे कोने में छिपा होता है, ऐसे छद्म वेश में होता है, जिसे हम पहचान नहीं पाते, ढूँढ़ नहीं पाते और उसे भगा नहीं पाते; जबकि उससे ज्यादा घातक हमारे लिए और कोई वृत्ति नहीं होती। जीवन में सफल वे ही हुए हैं जिन्होंने जीवन को हरपल नये उत्साह के साथ जीया है। धन्य वे ही हैं जिनके जीवन में आलस्य के लिए कोई स्थान नहीं है। निराश व्यक्ति केवल ईर्ष्या-द्वेष की भावनायें ही फैला सकता है। किन्तु, उत्साही पुरुषों को किसी से कोई शिकायत नहीं होती। वे अपना पथ स्वयं निर्धारित करते हैं और अपने उत्साह बल से उसे पूरा करके दिखा देते हैं। जीवन एक साहसपूर्ण अभियान है। उसका वास्तविक आनन्द संघर्षों में है। निराशा और कुछ नहीं, मृत्यु है; पर लगन और उत्साह से तो मृत्यु को भी जीत लिया जाता हैं। इस जीवन में भी निराश हो कर जीना कायरता नहीं तो और क्या है? परमात्मा ने हमें इसलिए जन्म नहीं दिया है कि हम पग-पग पर विवशताओं के आँसू बहाते फिरें। हमें सिंह पुरुषों की तरह जीना चाहिए, उत्साह पूर्वक जीना चाहिए। इस महा मंत्र को यदि अच्छी प्रकार सीख लें तो आपको धन की झींक, साधनों का अभाव अथवा यह कुछ भी आपको परेशान करने वाले नहीं। बस, आपके हृदय में उत्साह का बल होना चाहिये। यदि यह उत्साह का बल आप पा गये तो इस जीवन में आपको सुख ही सुख रहेगा और आप सदैव प्रसन्नता में आत्म-विभोर बने रहेंगे।

“आचार्यश्री” ने कहा – मनुष्य में जीवन के प्रति उत्साह और ऊर्जा का संचार करता है – योग। योग मनुष्य में सकारात्मकता तो बढ़ाता है ही, साथ ही साथ शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाता है। इसलिए लोगों को इस तनाव भरे जीवन से मुक्ति पाने के लिए योग करना चाहिए और दूसरे लोगों को भी प्रेरित करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है – ‘योगः कर्मसु कौशलम ’ अर्थात्, योग से कर्मों में कुशलता आती है। वास्तव में जो मनुष्य योग करता है उसका शरीर, मन और दिमाग तरोताजा रहता है। भारतवर्ष में योग का प्राचीन समय से ही अहम स्थान है। पतंजलि योग दर्शन में कहा गया है कि “योगश्चित्तवृत्त निरोधः” अर्थात्, चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो हृदय की प्रकृति का संरक्षण ही योग है जो मनुष्य को समरसता की और ले जाता है। योग मनुष्य की समता और ममता को मजबूती प्रदान करता है। यह एक प्रकार का शारारिक व्यायाम ही नहीं है, बल्कि जीवात्मा का परमात्मा से पूर्णतया मिलन भी है। योग शरीर को तो स्वस्थ रखता ही है, इसके साथ-साथ मन और दिमाग को भी एकाग्र रखने में अपना योगदान देता है। योग मनुष्य में नित नये-नये सकारात्मक विचारों की उत्पत्ति करता है जो कि मनुष्य को गलत प्रवृति में जाने से रोकता है। योग मन और दिमाग की अशुद्धता को बाहर निकाल फेंकता है। योग व्यक्तिगत चेतना को मजबूती प्रदान करता है। योग मन और दिमाग को तो एकाग्र रखता है ही साथ ही साथ योग हमारी आत्मा को भी शुद्ध करता है। योग मनुष्य को अनेक बीमारियों से बचाता है और योग से हम कई असाध्य बीमारियों को भी ठीक कर सकते हैं। इसलिए असल में कहा जाये तो योग जीवन जीने का सर्वोत्तम माध्यम है।