गोमांस भक्षण योग का क्रिया विज्ञान है- डॉ. सुधीर मिश्रा

लखनऊ। आज सोशल मीडिया, इलेक्ट्रानिक्स मीडिया तथा देश के बुद्धिजीवियों के बीच ही नहीं बल्कि आम जन में भी यह चर्चा का विषय का बना हुआ है कि प्राचीनकाल में ऋषि-मुनि गोमांस भक्षण करते थे, मैं आगे और जोड़ देता हूँ, कि साथ में सोमरस पान भी करते थे जिसके उदाहरण के रूप में प्राचीन इतिहासकारों की उन शोधपत्रों एवं पुस्तकों का उल्लेख करते जिसमें रिसर्च के नाम पर उनके सर्च की मानसिकता ऐसे विलुप्त हुई हो जो केवल उदाहरणों के तौर पर पुस्तक दर पुस्तकों में उद्घृत करते हुए स्वयं के जीवन में अर्थ व विद्वान बनने की लालसा में केवल विश्वास को ही सम्बल बनाते हुए पक्के ज्ञान से अनभिज्ञ रहे (विश्वास पक्के ज्ञान की पूर्व स्थिति होती है)। भारतीय विधाओं में योग दर्शन ऐसा विषय है जो जीवन के सैद्धान्तिक पक्ष को ही नहीं बल्कि व्यावहारिक रूप में अपनाकर जहाँ माध्यम रूपी शरीर के सम्पूर्ण स्वास्थ्य की बात करता वहीं जीवन के हर क्षेत्र में सामंजस्यता पूर्ण जीवन जीने की कला भी बताता है। विश्व में आज भारतीय योग के प्रति उत्सुकता निर्विवाद रूप से बढ़ी है क्योंकि योग अस्तित्व को जानने का विज्ञान है। अस्तित्व यानि जो सत्य है उसके साक्षात्कार जैसा वह है के लिए योग का प्रयोग। यानि व्यक्तित्व को बनाना है तो अस्तित्व से जुड़ना पड़ेगा और उसके अस्तित्व के ज्ञान के लिए मनोयोग से योग की क्रिया करनी ही पड़ेगी।

गोमांस भक्षण योग महाविज्ञान में राजयोग की एक अद्भुत क्रिया विज्ञान है जैसे-आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्रा आदि क्रियाओं में से केवल मुद्रा की एक क्रिया है। प्राचीन काल से ही योग महाविज्ञान के अन्तर्गत चंचल मन को स्थिर कर देने या युक्त करने को योग कहते हैं। मन को एकाग्रचित करने  के लिए योग साधना एवं योगाभ्यास की क्रियाओं को किया जाता रहा है। उसी प्रकार राजयोग में इस चंचल मन को योग साधकों को तीन ग्रन्थियों का भेदन करना पड़ता है।

(1) जिह्वा ग्रन्थि भेद अथवा ब्रह्म ग्रन्थि भेद जिसका प्रचलित नाम खेचरी मुद्रा

(2) हृदय ग्रन्थि भेद अर्थात विष्णु ग्रन्थि भेद

(3) मूलाधार ग्रन्थि भेद अर्थात रूद्र ग्रन्थि भेद

इसमें जिह्वा ग्रन्थि भेद को ही गोमांस भक्षण या खेचरी मुद्रा कहते हैं जो भारतीय अध्यात्म मंे खेचरी मुद्रा के नाम से प्रचलित है।  इससे होने वाले अत्यधिक लाभ के कारण भारतीय ऋषियों ने इसे ब्रम्ह विद्या या योग विद्या का अंग बना लिया।

गो—-यानि जिह्वा

मांस—तालु यानि जो मांस की परत होती है (तालु गुहा)

जिह्वा को ऊपर की तरफ उलटा ले जाकर तालु गुहर (जिह्वा के ऊपर तालु के बीच बने छिद्र में लगाये रखने को खेचरी मुद्रा या गोमांस भक्षण कहते हैं।

प्राचीन काल से ही भारतीय ऋषि प्रकृति के इस देन से परिचित हो चुके थे तथा उन्होंने मनुष्य द्वारा खेचरी मुद्रा लगा लेने के लिए विज्ञान सम्मत यौगिक विधि का विकास भी कर लिया जो आज भी योग साधकों द्वारा योग साधना के प्रथम चरण के रूप में पूरा किया जाता है। इस विज्ञान सम्मत यौगिक विधि में हठयोग, राजयोग के सम्मिलित प्रयास से जिह्वा इतना लम्बी हो जाती  कि मुड़कर गले की भोजन नली में प्रवेश करते हुए इसका अग्रभाग तालु गुहर में स्थित ब्रम्हरन्ध्र से जाकर लग जाता है। तालु गुहर की ऊपरी छत में एक सूक्ष्म छिद्र होता है जिसके ऊपर जीवात्मा या ब्रम्ह का निवास माना जाता है। इसी स्थान को सहस्त्रार चक्र या ऊर्जा का सातवां केन्द्र भी कहते हैं। अतः इसके नीचे के छिद्र को ब्रम्हरन्ध्र कहते हैं। ब्रम्हरन्ध्र से एक विशेष प्रकार के रस का बूँद-बूँद क्षरण होता जिसे शास्त्रों में सोम रस, अमृत रस या अमर वारूणी कहा जाता है। बहुत लोग समझते हैं कि सोम रस आयुवेर्दिक जड़ी बूटी है या इससे बनता है जो भ्रम है।

 

हठ प्रदीपिका में इसका वर्णन इस प्रकर है-

गोमांस भक्षयेनित्यं पिबेद मरवारूणीम।

कुलीनं तमहं मन्ये, इतरे कुलघातकाः।।

गोशब्दे नोदिता जिह्वा ततः प्रवेशो हि तालुनि।

गोमांस भक्षण तन्तु महापातक नाशनम्।।  (हठ प्रदीपिका)

अर्थात जो नित्य गोमांस भक्षण करते (खेचरी मुद्रा) और चन्द्र से झरते हुए अमृत या अमरवारूणी (सोमरस) का पान करते वही कुलीन हैं अन्य कुल घातक। गो शब्द का अर्थ है जिह्वा, मांस शब्द का अर्थ है तालुगुहर (जो ऊपर मांस की परत होती है) यानि जो लोग जिह्वा एवं उसका तालु (गुहर) में प्रवेश करना ही गोमांस भक्षण है जिसके करने से महापातकी भी पाप मुक्त हो जाता है। इस प्रकार भोजन नली से होकर तालु गुहर के ब्रम्हरन्ध्र में लम्बी जिह्वा के अग्रभाग के लग जाने को प्रतीकात्मक रूप से मांस भक्षण या गोमांस भक्षण कहा गया है। इससे मिलने वाली ऊर्जा के कारण ही साधक योग-साधना में 15 से 20 घंटे लगातार साधना में बैठने में सफल होता जो योग साधना की पहली सीढ़ी है।

खेचरी मुद्रा का लगना योगाभ्यास के वैज्ञानिक व्यायामिक पद्धति हठयोग से होता है जबकि खेदरी मुद्रा का सिद्ध होना हठयोग, राजयोग व लय योग के सम्मिलित प्रयास से ही होगा।

मनुष्य तथा मेढक को यह खेचरी मुद्रा प्रकृति प्रदत्त स्वतः वरदान रूप मिला हुआ है। मनुष्य को यह केवल नौ महीने, माँ के गर्भस्थ शिशु के रूप में मिलता है (खेचरी मुद्रा) जिसमें बच्चे को स्वयं के श्वसन की आवश्यकता नहीं होती परन्तु बच्चा जैसे ही गर्भ के बाहर आता अर्थात जन्म लेता बच्चे की खेचरी मुद्रा समाप्त हो जाती अर्थात उलट कर तालु गुहर में लगी जिह्वा गिरकर उस सामान्य अवस्था में आ जाती जिसमें वह जीवन पर्यन्त बनी रहती। खेचरी समाप्त हो जाने यानि जिह्वा के गिरकर सामान्य स्थिति में आते ही बच्चे में श्वसन क्रिया आरम्भ हो जाती और बच्चा रोना चीखना प्रारम्भ कर देता।  जिह्वा के न गिरने की स्थिति में बच्चे द्वारा रोना चीखना प्रारम्भ नहीं होता जो कभी-कभी किसी बच्चे में ही पाया जाता।  ऐसी स्थिति में दक्ष नर्स या दाई बच्चे के मुँह में उंगली डालकर या उलटा लटकाकर पीठ, गर्दन तथा मस्तक के आसपास हल्की थपकी देकर गिरा देती है। जिसके बाद बच्चा रोना, चीखना प्रारम्भ कर देता है। खेचरी मुद्रा का आश्चर्यजनक गुण यह है कि बच्चे को श्वसन की आवश्यकता नहीं होती यानि यह कहना कि श्वांस ही जीवन है से अच्छा है श्वांस को लेने वाला प्राण ही जीवन है कहना उचित होगा। और पोषण का कार्य प्राकृतिक एवं सामान्य ढंग से चलता रहता है। नौ महीने तक माँ के गर्भ में जीवित रहने वाले बच्चे की जिह्वा यदि जन्म से नौ मिनट पूर्व अर्थात गर्भ में रहते हुए गिर जाय तो बच्चा जीवित जन्म ले ही नहीं सकता क्योंकि जिह्वा गिरते ही श्वसन की आवश्यकता होती और गर्भ के अन्दर श्वांस लेना सम्भव नहीं।

इसी प्रकार मानव को जहाँ खेचरी मुद्रा गर्भस्थ प्राप्त है वहीं मेढक को यह खेचरी मुद्रा जीवन पर्यन्त प्राप्त है। मेढक किसी समय भी खेचरी लगा सकता है। वह वर्षा काल के बाद विपरीत परिस्थितियों में जमीन के अन्दर घुसकर खेचरी मुद्रा लगाकर 6 से 9 माह तक अचेत अवस्था मंे पड़ा रहता हैे जहाँ उसे इस अवस्था में श्वसन तथा पोषण के लिए भोजन की आवश्यकता नहीं होती जिसे चिकित्सा विज्ञान में हाइबरनेसन पीरियड कहा जाता है। मेढक इतने लम्बे समय तक जमीन के अन्दर रहने के बाद अनुकूल परिस्थितियां होने यानि वर्षा ऋतु प्रारम्भ होते ही खेचरी मुद्रा स्वतः समाप्त हो जाती और बाहर निकलकर घूमने लगता है। इस खेचरी मुद्रा का आश्चर्यजनक गुण यह है कि ‘‘लम्बे समय तक बिना श्वसन वह भोजन के मनुष्य और मेढक जीवित रह सकते है।

खेचरी समझने के लिए मनुष्य के मुख से भोजन और नाक से श्वसन प्रक्रिया को समझना जरूरी है।  भोजन को मुख में चबाने के बाद जिह्वा के सहारे गले की नली से होकर अमाशय में चला जाता है और नाक से श्वाँस लेने पर वायु ऊपर श्वांस नली से होकर फेफड़े में जाती है। श्वाँस, वायु और भोजन दोनों के बीच मंे एक मुलायम मांस की परत छत के रूप में गले तक फैली होती है जिसके अन्त में गले में एक जिह्वा लटकती रहती है जिसे ललरी कहते हैं। इसी मांस के परत के बीच में होने के कारण श्वांस-वायु व भोजन एक दूसरे से अलग होकर क्रमशः  फेफड़ व अमाशय में चले जाते हैं।

गर्भावस्था में शिशु की जिह्वा ऊपर तालु गुहर में लगी रहती जो जन्म के बाद सामान्य हो जाती और धीर-धीरे यह जिस सामान्य स्थिति में रहती है उसमें काफी छोटी हो जाती है जिससे पुनः जिह्वा तालु गुहर में प्रवेश नहीं कर पाती। मेढक के साथ ऐसा नहीं है वह जीवन पर्यन्त किसी भी समय खेचरी मुद्रा लगा सकता है।

लाभः

(1) जिह्वा के ब्रम्हरन्ध्र में लगने पर साधक अल्पहारी हो जाता है जिसका शरीर पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि सोमरस से मिलने वाली ऊर्जा शरीर को स्वस्थता प्रदान करती रहती है।

(2)मनुष्य की आयु बढ़ती है क्योंकि मनुष्य की आयु श्वसन संख्या पर निर्भर है। श्वसन संख्या अधिक आयु कम, श्वसन संख्या कम आयु अधिक।

खेचरी मुद्रा के लगने तथा प्राणायामक करने से योगी की श्वसन संख्या कम हो जाती है साथ ही मांसपेशियों में ताजगी व त्वचा में विशेष प्रकार की चमक होती है।

(3) सोम रस से मनुष्य के मस्तिष्क की क्षमता तथा स्मरण शक्ति बढ़ती है।

अतः हम भारतवासी सौभाग्यशाली हैं जो अपने महापुरूषों द्वारा प्राप्त अनुभवपूर्ण ज्ञान को पहले विश्वास में रखकर ऐसे गुरू जिनकी सोच पिंड से पंडाल तक न हो बल्कि ब्रम्हाण्ड तक के संरक्षण में इन अमूल्य धरोहरों को ग्रहण कर साधनापूर्ण योग द्वारा पक्के ज्ञान के रूप में हम सब बदल सकते जिसके लिए माँ भारती ही देश, काल व संस्कार के हिसाब से उपयुक्त हैं।

गोमांस भक्षण योग का क्रिया विज्ञान है जिसे खेचरी मुद्रा कहते जिसके सिद्ध हो जाने पर साधक घंटों, दिनों तक बिना भूख, प्यास व श्वांस के जिन्दा रहता है। याद रहे 6 इंच की जिह्वा 6 फुट के शरीर को सबसे अधिक प्रभावित करती और यह प्राप्त आश्चर्य व अद्भुत मानव शरीर जिसके स्वास्थ्य व विकास के प्रति हमारी सोच प्राथमिक रूप से केन्द्र में होनी चाहिए जिसमें  यह क्षमता है कि रोटी खाकर खून बना दे उसके इतर हम उससे होने वाले कार्यों की महत्वता को तो पहचान लेते पर जिससे हो रहा है उसके प्रति उपेक्षात्मक सोच रखते। व प्राणायाम मन का सहयोग ही व्यायाम को यौगिक बनाता है।

लेखक डॉ सुधीर मिश्र, योगाचार्य लखनऊ विश्वविद्यालय में प्लेसमेंट ऑफीसर हैं।

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