कुर्बानी का असल मकस़द अल्लाह के करीब होना -खालिद रशीद फरंगी महली

लखनउ/ बुशरा असलम। इस्लामी साल का आखिरी महीना जिलहिज्जा के नाम से जाना जाता है। इस महीने के दस दिन खास तौर से बड़ी फजीलत वाले है। पहली तारीख से 10 तारीख तक के दिनों की बड़ी अहमियत है। अल्लाह ने कुरान में सूरह फज्र में 10 रातों की कमस खाई है। तमाम उलमा इस बात पर एक है कि इससे यही दस राते मुराद है। इसमें दिन में रोजा रखना सवाब के ऐतिबार से रमजान के बराबर है और रात में इबादत करना शबे कद्र के बराबर है। इस महीने में हज भी किया जाता है। मुसलमान हज करने के लिए जाते हैं। यह महीना हजरत इब्राहीम अलै0 जो अल्लाह के खलील है उनकी यह बड़ी कुर्बानी जो उन्होने अल्लाह के लिए पेश की थी उनकी याद मनाने का महीना है कि हजरत इब्राहीम अलै0 को ख्वाब में यह कहा गया कि अपनी औलाद को मेरी राह में कुर्बान करो। हजरत इब्राहीम अलै0 ने इस ख्वाब को ख्वाब समझकर टाला नही बल्कि अपने बेटे को बुलाया और अपना ख्वाब बयान किया। बेटा भी पिता का आज्ञाकारी पुत्र था। उसने अपनी गर्दन झुका दी और कहा कि आप को जो हुक्म हुआ है उसको पूरा करें, देर न करें। हजरत इब्राहीम अलै0 अपने पुत्र को लेकर कुर्बानगाह गए। वहां बेटे को लिटाया और छुरी बड़ी तेजी से चलाना चाही लेकिन वह न चली। तब अल्लाह की हुक्म से जन्नत से जानवर आया और छुरी के नीचे जिबह हो गया। इब्राहीम अलै0 ने आंख पर से पट्टी हटायी तो इस्माईल अलै0 बैठे हुए मुस्करा रहे थे। अल्लाह की तरफ से आवाज आयी ऐ मेरे खलील तुमने अपना ख्वाब सच कर दिखाया। हजरत इब्राहीम अलै0 की यह कुर्बानी अल्लाह को इतनी पसन्द आयी कि बाद में आने वालों पर वाजिब हो गयी। उसे हर साल यह हजरत इब्राहीम अलै0 की याद में कुर्बानी करना जरूरी है।

कुर्बानी  का असल मकसद अल्लाह के करीब होना है इस लिए कुर्बानी का शब्द कुर्ब से बना है। कुर्ब का अर्थ करीब होना है। कुर्बानी का अर्थ यह हुआ कि जिससे अल्लाह के करबी हुआ जाए। कुर्बानी के सारे अमल में यह सिखाया गया है कि अल्लाह की बात मानना दीन है। कुर्बानी के लिए यह भी बताया गया है कि कुर्बानी किसकी हो सकती है किसकी नही है। बकरा जो एक साल से कम नही होना चाहिए। इसके लिए दुम्भा, भेड़ पर भी कुर्बानी हो सकती है। बड़े जानवरों में भैंस जो दो साल से कम न हो। एक बड़े जानवर पर सात लोग शरीक हो सकते है। लेकिन कुर्बानी का उद्देश्य सिर्फ खून बहाना या गोश्त खाना नही है असल मकसद अल्लाह को राजी करना है और इस बात की तरफ खास ध्यान रखना चाहिए कि हम अपने नफस और चाहत को भी कुर्बान कर रहे है। हमारे अन्दर अमल करने का जज्बा पैदा हो। अल्लाह ने कुरान शरीफ में फरमाया कि उसके पास कुर्बानी के जानवर का न तो खून, गोश्त और न ही उसकी हडिडयां पहुंचती है, उसके पास तो केवल तकवा पहुंचता है। और जो सही यकीन के साथ तकवे के साथ कुर्बानी पेश करता है तो अल्लाह उसे कुबूल करता है।

लेखक मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली इस्लामिक सेन्टर आफ़ इण्डिया के चेयरमैन हैं