तालीम हासिल करना इबादत है – मोहममद साहब

लखनऊ/ बुशरा असलम। कुरान की पहली आयत “इकरा बिसमिल रबबिकल लज़ी ख़लक़” का मतलब है, पढ़ो अपने इस परवरदिगार के नाम से जिसने पैदा किया। इसी वजह से पैग़ंबर मोहम्मद साहब ने शिक्षा को अन्धकार दूर करने का सबसे मज़बूत हथियार बनाया। पैग़ंबर मोहम्मद के जन्म के समय अरब में लडकियां अभिशाप मानी जाती थी, उन्हें ज़िंदा दफना दिया जाता था। लोगों के रहने का तरीका जानवरों से भी बदतर था। आपके मुताबिक शिक्षा ही एक ऐसा जरिया था जिससे लोगों को इंसानियत और हैवानियत का फ़र्क़ समझाया जा सकता था। मोहम्मद साहब ने लोगों को इल्म हासिल करने पर ज़ोर दिया। उन्होंने पहले लोगों से कहा कि पढ़ो जिससे सही और ग़लत के बीच फ़र्क़ की पहचान कर सको, अच्छाई और बुराई में भेद जान सकें। तालीम की बुनियाद पर बिगड़े रिश्ते बना सकें। और पढ़ो की इंसान बन सको।

पैग़ंबर साहब ने ” सुफ़्फ़ा ” नाम का एक चबूतरा बनवाया जिस पर बैठ कर अपने दोस्तों को पढ़ते और पढ़ाते थे। ये चबूतरा आज भी मस्जिद नबवी में उनकी मज़ार शरीफ के पास में बना हुआ है। आपको ये जानना बेहद जरूरी है कि पैग़ंबर मोहम्मद जिस माहौल में पले बढ़े उस समय तालीम हासिल करने को उपलब्धि नहीं बल्कि मज़ाक समझा जाता था, ऐसे में शिक्षा को मजबूत बनाना और विकसित करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। शिक्षा के जरिए उन्होंने तमाम कुप्रथाओं का अंत किया।

पैग़ंबर मोहम्मद साहब ने एक ऐसा निज़ाम बनाया की अरब के हर घर में प्रतिदिन एक निर्धारित समय पर पढ़ने और पढ़ाने का काम होने लगा। महिलाओं की तालीम के लिए उन्होंने अपनी बीवी हज़रत आयशा को पहले तालीम दी फिर उनसे दूसरी औरतों को तय समय पर बुलाकर घर में पढ़ाने को कहा, जिसके चलते बाद में हर मस्जिद में ऐसा इंतजाम किया गया कि महिलाएं पढ़ने के लिए मस्जिदों में बेहिचक आ सकती थीं। हज़रत मोहम्मद साहब ने दुनिया के लिए शिक्षा को कितना अहम बना दिया, आप इस बात से अंदाजा लगा सकते हैं कि बदर की जंग में जब मुसलमानों की जीत हुई और अल्लाह को न मानने वाले और फसाद करने वाले लोग जिन्हें कुफ्फार कहते हैं उनके हाथ पैर बाँध कर मुसलामानों ने मोहम्मद साहब के सामने पेश किया और पूछा कि इनका क्या किया जाए तो पैग़ंबर मोहम्मद ने कहा कि इनके हाथ खोल दो, इन्हें खाना खिलाओ और अगर इनमें से हर आदमी दस अशिक्षित व्यक्तियों के समूह को पढ़ाने के लिए तैयार हो तो इन्हें आज़ाद कर दिया जाए और समाज को शिक्षित बनाने में इनका सहयोग लिया जाये। पैग़म्बर मोहम्मद साहब ने शिक्षा को हर मर्द और औरत पर फ़र्ज़ कर दिया। तालीम को ढाल बनाकर ही मोहम्मद साहब ने नई दुनिया और संस्कृति का निर्माण किया, उन्हें समझ में आ गया था कि हिंसा और अहिंसा के बीच जो पुल है वह शिक्षा ही है। इंसान शिक्षित होने पर ही स्थिति का विश्लेषण और मूल्यांकन करने योग्य होगा।

मक्का और मदीना में मोहम्मद साहब ने जगह जगह पढ़ने और पढ़ाने के लिए स्थान चुने और वहां से शैक्षिक कार्य शुरू कराए। वहां मुसलमानों के अलावा ईसाई और यहूदी भी आकर पढ़ते थे। इसी तरह औरतों के लिए घरों और मस्जिदों के अलग हिस्सों में शिक्षा का इंतज़ाम किया गया। पैग़ंबर मोहम्मद साहब ही हैं जिन्होंने समाज में औरत को बराबर का हक़ दिलवाया। औरतों को बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए उन्हें शिक्षित और विकसित करके मोहम्मद साहब ने उनको समाज में मर्द के बराबर लाकर खड़ा कर दिया। उनको पिता की जायदाद में आधा हिस्सा दिलवाया और शिक्षा से ही उन्हे आत्म निर्भर बनाया।