मौलाना अली मियां नदवी ने कहा था तालीम का बग़ीचा है ‘नदवतुल उलमा दारुल उलूम’

लखनऊ/ अहमद फैजान। दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक और आध्यात्मिक यूनिवर्सिटी नदवतुल उलमा दारुल उलूम यानी हाउस ऑफ नॉलेज एंड एसेंबली ऑफ स्कॉलर्स यूनिवर्सिटी जो एक इस्लामिक संस्थान है यह संस्थान देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में मशहूर है। इस संस्थान ने तालीम के मामले में हमेशा से दुनिया के अलग अलग देशों के छात्रों को अपनी ओर आकर्षित किया है। उत्तर प्रदेश के शहर लखनऊ में मौजूद नदवा यूनिवर्सिटी से अब तक लाखों की तादाद में स्टूडेंट्स यहां से तालीम लेकर निकल चुके हैं और अलग अलग क्षेत्रों में कार्यरत हैं।

नदवतुल उलमा दारुल उलूम

कब हुई थी ‘नदवतुल उलमा दारुल उलूम’ की स्थापना
कानपुर के मदरसा फ़ैज़-ए-आम में वर्ष 1893 में दीक्षांत समारोह हुआ था। इस मौक पर मौलाना मोहम्मद अली अल मुंगेरी, मौलाना लुत्फ़ुल्लाह अलीगढ़ी, शाह मुहम्मद हुसैन इलाहाबादी, अशरफ अली थानवी, मुहम्मद खलील अहमद (देवबंद), सनाउल्ला अमृतसरी, नूर मुहम्मद पंजाबी, अहमद पंजाबी समेत विद्वान हसन कानपुरी, सैयद मुहम्मद अली कानपुरी, मौलाना महमूद हसन, शाह सुलेमान फुलवारी, जहुरुल इस्लाम फतेहपुरी, अब्दुल गनी मुर्शिदाबाद, फखरुल हसन गंगोही और सैयद शाह हाफिज तजम्मुल हुसैन देसनवी ने उलेमा और संगठन का गठन करने पर सहमति जताई थी। उन्होंने संगठन का नाम नदवतुल-उलेमा रखा। लेकिन संस्था को वास्तविक रूप देने के लिए विशेष रूप से मोलाना मोहम्मद अली मुंगेरी को याद किया जाता है और उनको ही असली संस्थापक माना जाता है। संगठन की जिम्मेदारियां सैयद मुहम्मद अली को दी गई, जो नदवतुल-उलेमा के पहले नाजिम (चांसलर) बने।

इस संस्थान का मकसद मुस्लिम समुदाय के भीतर विभिन्न समूहों के बीच सामंजस्य और सहयोग पैदा करना साथ ही नैतिक, धार्मिक, शैक्षिक सुधार और प्रगति लाने के लिए था। देश के इतने बड़े धार्मिक मार्गदर्शकों द्वारा लिए गए निर्णय से नदवा यूनिवर्सिटी विचारों से निकलकर बाहर आई और वर्ष 1898 में यह कानपुर से लखनऊ स्थानांतरित की गई। नदवा के पाठ्यक्रम को निर्धारित करने में अलीगढ़ के मौलाना लुतुफुल्लाह और मौलाना शिबली नोमानी ने प्रस्तावों की घोषणा की जैसे, वर्तमान शैक्षिक प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है।

नदवतुल उलमा दारुल उलूम

साथ ही सभी इस्लामिक संस्थानों के सिद्धांतों या प्रतिनिधियों को नदवतुल उलेमा के वार्षिक सम्मेलन में भाग लेना चाहिए। छोटे बड़े सभी मदरसे का एक महासंघ बनाया जाए ताकि सभी मदरसे एक ही छत के नीचे आ जाएं। इस योजना को लागू करने के लिए कुछ बड़े मदरसों को शुरू किया जाना चाहिए जो नदवतुल-उलूम के रूप में जानी जाने वाली मुख्य मदरसा के रूप में काम करेंगी और बाकी उनकी शाखाएं होंगी। मुख्य नदवतुल -उलमा दूसरी शाखाओं की गतिविधियों पर नजर रखेगा। छात्रावास की सुविधा के साथ मदरसा फैज-ए-आम का विस्तार, पाठ्यक्रम सुधार (यह शाह मुहम्मद हुसैन इलाहाबादी द्वारा प्रस्तावित किया गया था और दूसरा मौलाना शिब्ली नोमानी द्वारा प्रस्तावित किया गया था ) वैसे तो अब तक बहुत सारे स्कॉलर्स नदवा में आये और दुनिया को अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से प्रकाशित किये। लेकिन एक ख़ास नाम जिसका जिक्र किए बिना खुद नदवा यूनिवर्सिटी अधूरी सी लगती है वह नाम है हज़रत मौलाना अबुल हसन अली नदवी उर्फ़ अली मियां का।

हज़रत मौलाना अबुल हसन अली नदवी उर्फ़ अली मियां

मौलाना सैयद अबुल हसन अली हसनी नदवी (अली मियां) का जन्म रायबरेली में 1914 में इस्लामिक विद्वानों के परिवार में हुआ था। 1934 में, उन्हें नदवा में शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया, बाद में 1961 में वे नदवा के प्रधानाचार्य बने और 1980 में उन्हें इस्लामिक सेंटर ऑक्सफोर्ड, यूके के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। उन्हें उनके योगदान के लिए किंग फैसल फाउंडेशन और सुल्तान ब्रुनेई पुरस्कार (1999) द्वारा दिए गए किंग फैसल अवार्ड (1981) से सम्मानित किया गया। वह उर्दू और अरबी में एक प्रसिद्ध लेखक थे, उनकी किताबें विभिन्न अरब विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं, कई पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है। यूनाइटेड स्टेट्स में मौलाना की लिखी हुई कई किताबें विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में शामिल हैं।

नदवतुल उलमा दारुल उलूम के छात्र

आपको ये जानना बेहद जरुरी है कि नदवा केवल धार्मिक संस्था नहीं है इस संस्थान में हर विषय पर अध्यन करवाया जाता है, यहां के स्टूडेंट्स डाक्टर, इंजीनियर और आई.ए.एस भी बने हैं और आज देश की सेवा कर रहे हैं। क़ुरआन और हदीस के अलावा यहां कई तरह के प्रोफेशनल कोर्सेज भी पढ़ाई जाती है जिनमें मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म भी शामिल है। इसके साथ ही नदवा के पाठ्यक्रम में संस्कृत भी शामिल है यहां करीब 7000 विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, जिनमें से 4000 नदवा हॉस्टल में ही रहते हैं जिनका खाना, रहना, मेडिकल और तमाम ज़िम्मेदारी नदवा की ही है। नदवा के नाज़िम मौलाना राबे हसनी नदवी हैं, इस संस्थान के प्रींसिपल मौलाना सईदुर्रहमान आज़मी हैं।

मौलाना राबे हसनी नदवी, नाज़िम

नदवतुल उलमा की स्थापना का एक बड़ा कारण ये भी रहा है की जंगे आज़ादी के दौरान जब देवबंद केवल धार्मिक अध्यन की तरफ भाग रहा था और अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अंग्रेज़ों से प्रभावित होकर आधुनिक शिक्षा पर ज़ोर दे रहा था तब कुछ उलेमाओं ने यहां सोचा कि एक बीच का दरमियानी रास्ता होना चाहिए जिसमें दीनी और दुनयावी दोनों तरह की शिक्षा का मिश्रण हो और फिर इसकी स्थापना की गई। मौलाना अली मियां नदवी जैसे विद्वानों ने इसे हमेशा से एक तालीम का बग़ीचा कहा है जो हर सियासत और नफरत से दूर रहा और केवल इंसान को इंसान बनाने की शिक्षा देता रहा जो पैग़ामे इंसानियत है। मौजूदा चांसलर राबे हसनी नदवी कहते हैं की ये एक ऐसी लचीली शाख है जो किसी भी कट्टरता से परे रही है जिसमें जितना धर्म है उतनी ही मिक़्दार में आधुनिकता और दुनियावी मुआमलात हैं ताकि एक विद्यार्थी हर तरह से अपने को इस दुनिया में ढाल सके।