समुद्र के बीच में है एक ऐसा मंदिर, जहां महादेव के दर्शन से मिलती है पाप से मुक्ति, सागर खुद करता है शिवलिंग का जलाभिषेक

भावनगर/ प्रतिमा चतुर्वेदी। गुजरात के भावनगर में कोलियाक तट से करीब तीन किलोमीटर अंदर अरब सागर के बीच रहते हैं निष्कलंक महादेव। यहां पर भगवान शिव का करिश्मा है कि अरब सागर की लहरें रोज़ शिवलिंगों का जलाभिषेक करती हैं। लोग समुद्र के पानी में पैदल चलकर इस मंदिर तक पहुंचते हैं और निष्कलंक महादेव के दर्शन करते हैं। यहां रोज समुद्र का जल घटता-बढता रहता है। अरब सागर के बीच हजारों वर्षों से सुरक्षित खड़ा ये मंदिर आधुनिक इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए रहस्य बना हुआ है। समुद्र में भारी ज्वार के वक़्त मंदिर की पताका और खम्भा ही नजर आता है। भक्तों को भगवान शिव के दर्शन के लिए समुद्र के पानी के कम होने का इंतजार करना पड़ता है। पानी कम होने पर ही समुंद्र में महादेव का प्राचिन मंदिर दिखाई देता है। यहां पर शिवजी के पांच स्वयंभू शिवलिंग बने हैं।
निष्कलंक महादेव मंदिर से पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं। कहा जाता है कि महाभारत काल से भी इस मंदिर का संबंध है। महाभारत युद्ध के बाद पांडवों को कौरवो और अपने ही रिश्तेदारों की हत्या का पाप लगा था। इस पाप से मुक्ति के लिए श्री कृष्ण ने पांण्डवों को एक काला ध्वज औप एक काली गाय दी थी। श्रीकृष्ण ने बताया कि जब ध्वजा और गाय दोनों का रंग सफ़ेद हो जाए तो समझ लेना की पाप से मुक्ति मिल गई है और जिस जगह ऐसा हो वहां पर भगवान शिव की तपस्या करने की सलाह दी थी।
इसके बाद पांडव कई दिनों तक अलग-अलग जगह पर गए लेकिन गाय और ध्वजा का रंग नहीं बदला। लेकिन जब वो गुजरात के कोलियाक तट पर पहुंचे तो गाय और ध्वजा का रंग सफ़ेद हो गया। तब पांचो पांडवों ने यहां भगवान शिव की तपस्या की थी। मान्यता है कि भगवान भोले नाथ ने तपस्या से खुश होकर पांडवों को दर्शन दिए थे। निष्कलंक महादेव मंदिर में आज भी पांच शिवलिंग स्थापित हैं। माना जाता है कि पांडवों ने इन पांचों लिंगम को अमावस्या की रात में स्थापित किया था। पांचो शिवलिंग के सामने नंदी की प्रतिमा बनी है। पांचों शिवलिंग एक वर्गाकार चबूतरे पर हैं। इस चबूतरे पर एक छोटा तालाब भी हैं जिसे पांडव तालाब कह्ते हैं। श्रदालु पहले उसमे अपने हाथ पांव धोते है और फिर शिवलिंगो की आराधना करते हैं।
मान्यता है कि निष्कलंक मंदिर में आकर भक्तों और श्रद्धालुओं के सारे पाप धुल जाते हैं। अमावस के दिन इस मंदिर में भक्तों की विशेष भीड़ रहती है। पूर्णिमा और अमावस के दिन ज्वार सक्रिय रहता है फिर भी श्रद्धालु उसके समुद्र जल के कम होने का इंतज़ार करते हैं। इस मंदिर से ऐसी मान्यता जुड़ी है कि किसी प्रियजन की चिता कि राख शिवलिंग पर लगाकार जल में प्रवाहित कर दें तो उसको मोक्ष मिल जाता है। मंदिर में भगवान शिव को राख़, दूध, दही और नारियल चढ़ाये जाने की परंपरा है।