भगवान शिव का अनोखा मंदिर स्तंभेश्वर, जहां सागर करता है शिव का जलाभिषेक

भरूच/ प्रतिमा चतुर्वेदी। गुजरात के भरुच जिले का स्तंभेश्वर मंदिर जिसका अभिषेक समुद्र की लहरे करती हैं। कावी-कंबोई गांव में बना ये मंदिर बेहद प्रचीन है। मंदिर अरब सागर के बीच कैम्बे तट पर है। समुंद्र में जल का स्तर बढ़ने के चलते स्तंभेश्वर मंदिर दिन में दो बार सुबह और शाम पल भर के लिए आंखो से ओझल हो जाता है। इस मंदिर को सबमर्जिंग मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। महिसागर संगम तीर्थ की पावन भूमि पर भगवान शंकर के पुत्र कार्तिकेय ने एक शिवलिंग की स्थापित की थी, जिसे श्री स्तंभेश्वर महादेव कहा गया है।
हिंदू धर्म में महादेव यानी शिव को देवों के देव के रुप में जाना जाता है। भारत में भगवान शिव के अनकों मंदिर बने हैं लेकिन गुजरात में बना स्तंभेश्वर मंदिर की अपनी अलग विशेषता है। स्तंभेश्वर मंदिर तीर्थ का उल्लेख ‘श्री महाशिवपुराण’ और स्कंद पुराण में भी हुआ है। भोलेनाथ को समर्पि इस मंदिर में स्थित शिवलिंग का आकार 4 फुट ऊंचा और दो फुट के व्यास वाला है। मंदिर चारो ओर से अरब सागर से घिरा है।
स्तंभेश्वर मंदिर से पौराणिक कथा का संबंध है। कहा जाता है कि राक्षक ताड़कासुर ने अपनी कठोर तपस्या से शिव को प्रसन्न किया था। जब शिव उसके सामने प्रकट हुए तो उसने शिव से वरदान मांगा कि मुझे सिर्फ 6 दिन की आयु वाला आपका पुत्र ही मार सकेगा। वरदान मिलते ही ताड़कासुर ने हाहाकार मचा दिया। जिससे परेशान होकर देवताओ ने महादेव की शरण ली। शिव-शक्ति से श्वेत पर्वत के कुंड में उत्पन्न हुए कार्तिकेय के 6 मस्तिष्क, चार आंख, बारह हाथ थे। कार्तिकेय ने ही ताड़कासुर का वध 6 दिन की आयु में किया था। जब कार्तिकेय को पता चला कि ताड़कासुर भगवान शंकर का भक्त था। तो वे काफी व्याकलु हुए। तब भगवान विष्णु किी सलाह पर कार्तिकेय ने ताड़कासुर के वध स्थल पर शिवालय बनवाया और उनका मन शांत हुआ। फिर सभी देवताओं ने मिलकर महिसागर संगम तीर्थ पर विश्वनंदक स्तंभ की स्थापना की, जिसे आज स्तंभेश्वर तीर्थ के नाम से जाना जाता है।
पौराणिक मान्यता के मुताबिक स्तंभेश्वर महादेव मंदिर में स्वयं शिवशंभु विराजते हैं इसलिए समुद्र देवता स्वयं उनका जलाभिषेक करते हैं। यहां पर महिसागर नदी का सागर से संगम होता है। यहां दूर-दूर से भक्त भगवान शिव का आशीर्वाद लेने आते हैं। हर शिवरात्रि, अमावस्या के दिन और हरेक सोमवार को इस स्थान पर भक्तों की भीड़ रहती है। एकादशी और पूर्णमासी की रात में यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। समुद्र के जलाभिषेक को देखने यहां पर बहुत दूर-दूर से भक्त आते हैं। जिसका नजारा सुन्दर और अद्भूत होता है।