हक की लड़ाई अपनों से हार गया स्वतंत्रता सेनानी

सुलतानपुर : हाकिम-हुक्मरानो की संवेदनहीनता पर चोट करती ये दास्तां है स्वतंत्रता सेनानी मानिकचंद्र खत्री की। जिन्हें आजादी के बाद सत्ता ने सेनानी माना लेकिन उन्हें राजनीतिक पेंशन देने से इनकार कर दिया। वे लड़ते-लड़ते हार गए, फिर उनकी पत्नी ने उनके हक की लड़ाई लड़ी, वे भी गुजर गईं. और अब बेटा भी पिता के तमाम दस्तावेज कानपुर-आगरा जेलों व अदालतों से एकत्र करते-करते थक चुका है। सभी मानते हैं खत्री सेनानी थे, अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे, जेल गए थे। लेकिन अंग्रेजों की अदालत द्वारा जारी उनकी रिहाई का आदेश सरकारी कागजातों से गायब है इसलिए राजनीतिक पेंशन के वे हकदार नहीं हैं। ये आज के दौर की विडंबना नहीं तो और क्या है.।कानपुर के चौक निवासी मानिकचंद खत्री 1932 में युवा थे और कांग्रेस गरमदल के सदस्य रहे। भगत ¨सह की फांसी के बाद आंदोलन करते उतर पड़े, जनवरी 32 में चौदह साथियों के साथ गिरफ्तार किए गए। तीन माह की बामशक्कत कैद व 25 रुपये जुर्माना हुआ। जेल में जब भगत ¨सह को एक अंग्रेज अफसर ने गाली दी तो भड़क गए। उसे भी बैरक में रखा तसला फेंककर मारा। नतीजा छह माह की सख्त कैद व पचास रुपये जुर्माने की एक और सजा लाद दी गई। उन्हें 8 अप्रैल 1932 आगरा जेल भेज दिए गए, यातना के लिए पागलखाने में बंद कर दिया गया। इसके बाद का रिकार्ड गायब है। आजादी के बाद हक के लिए उन्होंने केंद्र सरकार से पेंशन मांगी। सरकार ने उन्हें सेनानी तो माना लेकिन पेंशन नहीं दी। 1985 में खत्री 80 साल की उम्र में स्वर्गवासी हो गए। घर की माली हालत खराब थी, सो पत्नी मालती देवी बेटे मुकेश टंडन के साथ सुलतानपुर में अपनी विवाहित बेटी के पास आ गईं। उन्होंने पति की हक की लड़ाई के लिए पत्राचार जारी रखा। लेकिन वे भी हार गईं। बेटे मुकेश टंडन ने मां की 2010 में मौत के बाद खुद भी इतने पत्राचार किए और दस्तावेज जुटाए कि मोटी फाइल बन चुकी है। वे भी अब साठ वर्ष के हो चुके हैं। कहते हैं कि पिता ने पेंशन के रूप में अपना हक मांगा था.। हमें पैसे की दरकार नहीं उनके हक और लड़ाई का सम्मान चाहता हूं।