मोतीझील से पिया मेहंदी मंगाई दा…………..

सुलतानपुर : अवध क्षेत्र लोक गायन की महत्वपूर्ण विधा रही कजरी जनमानस से विलुप्त हो रही है। सावन ग्रामीण महिलाओं के भाव अभिव्यक्ति का मुख्य साधन रही यह सावनी गीत बाजारवाद के चलते अब यदा-कदा ही सुनाई पड़ती है। लोकगीत का चरित्र ही सामूहिकता है। अब इसकी पुनर्रचना नहीं हो रही है। जिसके चलते यह ऋतुगीत इलेक्ट्रानिक चैनल और मोबाइल के यू ट्यूब की विषय वस्तु बनती जा रही है।

जब बात सावनी गीत की हो तो पंडित रामनरेश त्रिपाठी को नहीं भुलाया जा सकता।1928 में प्रकाशित लोक गीतों का वृहद संकलन कविता कौमिदी में कजरी की पंक्तियां बरसा ऋतु के परिवेश और इस मौसम में उपजते मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति की झलक बखूबी मिलती है। मूलत: कजरी लोकगीत परंपरा में कभी शीर्ष स्थान पर थी। साहित्यकार कमल नयन पांडेय बताते हैं कि इसका उदय मिर्जापुर में कजरी नाम की एक स्त्री से जोड़ा गया। वह प्रियमिलन व वियोग को जिस लहजे में गाई उसी राग का नाम कजरी पड़ा। रोजमर्रे की बात-बतकही, मेल मुलाकात की छाप कजरी में मिलती है।’पिया छतवा से हमके लियाय चला, पानी से बचाय चला ना..’इससे तत्कालीन स्थिति महसूस होती है। सावनी गीत जड़ परंपरा की गीत नहीं है। परिस्थितियों के अनुसार इसमें बदलाव होता रहा। जब साइकिल जन-जन में पहुंची तो उसका भी जिक्र गायन में हुआ।’पिया मेंहदी मंगाइदा मोतीझील से, जाके साइकिल से ना..’स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिमास अगस्त में क्रांतिकारियों के लिए कजरी अग्रगीत बन गई थी। टोलियों में क्रांतिकारी,’चलु-चलु भइया, सब जन हिल-मिल देशवा के सूतल जे भाइ के जगाइत्थ.’। मुख्य रूप से स्त्री समाज के हृदय के विस्तार और भावनाओं की सावनी गीत संवाहक बनी। नगर की पुष्पा पांडेय कहती हैं कि उनके बचपन में असाढ़ की पूर्णिमा से झूला पड़ता था जो हरियाली तीज के बाद उतरता था। गांव की महिलाएं झूला झूलती थीं, पुरुष उन्हें झुलाते थे। खूब गीत गाई जाती थी। पर, यह परंपरा आधुनिकता के चलते अब खत्म होती जा रही है। इसे संजोने की जरूरत है।