प्रत्येक मनुष्य प्रकृति की रक्षा का संकल्प ले- अवधेशानंद गिरी जी महाराज

हरिद्वार। जूनापीठाधीश्वर महामंडलेश्वर आचार्य अवधेशानंद जी महाराज ने कहा कि प्रकृति के सकल अव्यव आकाश, धरा, अग्नि, जल, वायु, नदी, पर्वत, वनस्पति और सभी जीव एक की तत्त्व का विस्तार हैं; अतः प्रकृति की रक्षा हो…! प्रकृति ही मानव जीवन के लिए प्राणदायक है, जो सभी से बढ़कर है, क्योंकि इसके बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं और इसी प्रकृति व पर्यावरण की रक्षा करना धर्म की रक्षा करने के समान है। पृथ्वी में जलचर (जल में रहने वाले), थलचर (भूमि पर रहने वाले), नभचर (आकाश में उड़ने वाले) ऐसे नाना प्रकार के जितने भी जड़-चेतन जीव-जंतुओं का, सबका निवास स्थान पृथ्वी है। यह एक मात्र ऐसा ग्रह है जहाँ जीवन है। यह जीवन यहाँ प्रकृति की वज़ह से है। प्रकृति ही मनुष्य जाति के लिए जीने के साधन जुटाती रही है। पृथ्वी पर शुद्ध हवा और वनस्पतियां तथा खनिज उपलब्ध कराती है। आज वही प्रकृति और पर्यावरण खतरे में है। वस्तुओं के अंधाधुंध उपभोग और उत्पादन के हमारे वर्त्तमान तरीकों से पर्यावरण नष्ट हो रहा है व जीव लुप्त होते जा रहे हैं। मनुष्य जाति में आपस में प्रतिद्वंदिता छिड़ गई है। प्रकृति की रक्षा करने का दायित्व केवल व्यक्तिगत न होकर सामूहिक भी होना चाहिये। प्रकृति की रक्षा हर मनुष्य का दायित्व है। प्रकृति से ही हमें जीवन जीने की सभी उपयोगी वस्तुएं मिलती हैं। अतः प्रत्येक मनुष्य प्रकृति की रक्षा का संकल्प ले, ताकि जीवन भर प्रकृति का आनन्द उठा सकें और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी पृथ्वी की सुन्दरता और उसके संसाधनों को बनाए रखें…।

“आचार्यश्री” जी ने कहा जीवन की रक्षा के लिए प्रकृति के विनाश को रोकना होगा। पर्यावरण प्रकृति का उपहार है, किन्तु इसके अत्याधिक दोहन व शोषण से आज सम्पूर्ण विश्व संकट में है। मानवीय अनुक्रियाओं विशेषकर संसाधान-दोहन, अनुपयुक्त तकनीक का प्रयोग, ऊर्जा का अविवेकपूर्ण उपयोग, जीवन-शैली में अनुपयुक्त अधिवास-विस्तार, जैव-विविधता का विनाश आदि प्रकृति के अंगों को पंगु बना रहे हैं। इसीलिए आज विश्व में पर्यावरण संकट, पर्यावरण-अपकर्षण, जलवायु, भूमि व ध्वनि-प्रदूषण, प्राकृतिक आपदाओं का संकट, जैव-जगत के नष्ट होने का संकट, ओजोन परत में छिद्र, तापमान में वृध्दि, ग्लेशियर का पिघलना आदि तथ्यों पर निरन्तर विचार-विमर्श की आवश्यकता है। वर्तमान में मानव अपने भौतिकवाद की चकाचौंध व विलासिता में डूबकर पाश्चात्य जीवनशैली अपनाकर प्रकृति पर कहर ढ़ा रहा है। वह प्रकृति का शत्रु बनता जा रहा है। यदि मानव संयमित जीवनशैली और सादगी अपनाकर अपने जीवन का निर्वाह करे तो हो रहे प्रकृति के दोहन व पर्यावरण को बचाया जा सकता है। प्रकृति की रक्षा में ही हम सबकी रक्षा निहित है। वर्तमान में जनसमुदाय को अधिक से अधिक पेड़ लगाने के साथ ही अपने आसपास स्वच्छ वातावरण बनाए रखना चाहिए।
अतः वर्तमान में वैज्ञानिक, राजनीतिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री आदि सभी को मिलकर इस संकट में मानव-सभ्यता के विनाश को रोकने के सामूहिक प्रयास करने होंगे…।

“आचार्यश्री” जी ने कहा दुनिया के सभी धर्म ईश्वर और सृष्टि का आदर करना सिखाते हैं। सभी धर्मों में माना गया है कि प्रकृति की रक्षा करना ही मनुष्यता की रक्षा करना है। प्रकृति की रक्षा करना ही हमारा धर्म है। मानव और प्रकृति के बीच सदियों से घनिष्ठ संबंध रहा है। वह ईश्वर को इस विश्व का सृष्टिकर्ता मानता है। अलग-अलग नामों से उस ईश्वर को संबोधित कर उसकी पूजा-अर्चना भी करता है। कहते हैं कि इस तरह इंसान अपने धर्म का पालन कर रहा है। लेकिन धर्म के पालन का अर्थ केवल परस्पर मानवीय व्यवहार करना, सदाचार और शिष्टाचार के नियमों का पालन करना ही नहीं है। इसका अर्थ तो ईश्वर और सृष्टि के साथ शिष्टाचार निभाना भी है। अतः ईश्वर की आराधना तभी पूर्ण मानी जाएगी, जब उसके द्वारा रची गई सुंदर सृष्टि व उसमें विचरने वाले सभी प्रकार के जीव-जंतुओं की रक्षा की जाएगी और उनका आदर किया जाएगा। इस तरह पूरे पर्यावरण में शांति छा जाएगी। ऐसी स्थिति में सृष्टिकर्ता की उपस्थित को अनुभूत किया जा सकेगा और परमात्मा को पाया जा सकेगा। हमारे आसपास का पर्यावरण जितना स्वच्छ होगा, तन-मन की शांति में उतना ही सहायक होगा। इस प्रकार सृष्टि का आदर करना ईश्वर का ही आदर करना है…।