क्रांतिकारियों के लिए खोल दिया था शस्त्रागार

एटा : अवागढ़ का एतिहासिक किला सन 1857 के बाद स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई का केंद्र ¨बदु बना रहा। इस एतिहासिक किले में आज भी शस्त्रागार मौजूद है, जिसे वहां के राजा बलवंत सिंह  ने क्रांतिकारियों के लिए खोल दिया था। राजा ने मथुरा जाते वक्त अंग्रेजों से मोर्चा लिया और जिसमें कई अंग्रेज सैनिक मारे गए और राजा की सेना के जवान भी शहीद हुए। एक ब्रिटिश कमिश्नर को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया था। किले की दीवारें आज भी आजादी के दीवानों की शौर्य गाथा कहती हैं। महात्मा गांधी का भी इस किले में एक बार आगमन हुआ था।

अवागढ़ की राजशाही का इतिहास सन 1831 से देखने को मिलता है, लेकिन 1857 के बाद यह किला क्रांतिकारी गतिविधियों में तब्दील हो गया। 1884 में जब राजा बल्देव ¨सह के हाथ में अवागढ़ का शासन आया, उस समय क्रांतिकारी आंदोलन शुरू हो चुका था। 1892 में राजा बलवंत ¨सह अवागढ़ के राजा बने। उन्होंने अपना साम्राज्य और जमींदारी आगरा, अलीगढ़ और मथुरा जिलों तक फैलाई। एक बार राजा बलवंत ¨सह को पता चला कि ब्रिटिश सेना उनका रास्ता रोके हुए है तो वे अपने सैन्य बल के साथ अवागढ़ से आगरा होते हुए मथुरा के लिए रवाना हुए। आगरा में वहां का ब्रिटिश कमिश्नर आगे आ गया।

चूंकि कमिश्नर किसी भी बहाने से राजा से लड़ना चाहता था इसलिए उसने अपनी गाड़ी सड़क से नीचे नहीं उतारी। राजा उस वक्त बग्गी पर सवार थे और सेना साथ चल रही थी। उन्होंने कमिश्नर को वहीं बंदी बना लिया और उसकी इतनी पिटाई लगाई कि वह अधमरा हो गया। इस दौरान दोनों तरफ से संघर्ष हुआ, राजा बहादुर थे। लिहाजा वे कमिश्नर और उसके फोर्स को परास्त कर मथुरा निकल गए, जहां उनकी फिर घेराबंदी की गई, लेकिन बड़ी ही सूझबूझ से दुश्मन के जाल से निकल आए। राजा बलवंत सिंह के नाम पर आज भी आगरा में वर्ष 1885 में स्थापित हुआ राजा बलवंत ¨सह कॉलेज बना हुआ है। यह कॉलेज भी क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बना रहा।

इनके बाद राजा सूरजपाल सिंह शासक बने। उनके जमाने में आजादी का आंदोलन चरम पर पहुंच चुका था। राजा सूरजपाल ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया। आए दिन किले में क्रांतिकारियों की बैठक होती थी। यहां तक कि बताया जाता है कि राजा ने क्रांतिकारियों को हथियार तक उपलब्ध कराए। किले में एक शस्त्रागार है, जिसमें अभी भी तमाम ऐसे शस्त्र रखे हैं जिन्हें क्रांतिकारियों ने इस्तेमाल किया और आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर योगदान दिया। आज भी हैं बहादुरी के अवशेष:

अवागढ़ किले में आज भी शासकों की वीरता के अवशेष मौजूद हैं। राजा बलवंत ¨सह की तलवार आज भी किले में मौजूद है। राजा सूरजपाल सिंह ने भी क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया था। अवागढ़ किले पर अंग्रेजों ने कई बार किले की घेराबंदी की, लेकिन कभी भी वे सफल नहीं हो पाए। इस दौरान तीन तोप किले के ऊपर रखी थीं, लेकिन अब इन तोपों के सिर्फ स्तंभ ही दिखाई देते हैं। किले में राजवंश परंपरा अभी भी कायम है।