केदारनाथ यात्रा अब होगा और आसान

देहरादून/ बुशरा असलम। चारधाम यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्री इस वर्ष आसानी से केदारनाथ पहुंच जाएंगे क्योंकि केदारनाथ के मार्ग में सोनप्रयाग पर स्थायी पुल बन गया है। वहां पिछले तीन वर्ष में दो बार बह जाने वाले पुल के स्थान पर आधुनिक आपातकालीन ‘एक्रो’ पुल बना दिया गया है।
60 मीटर चैड़े इस पुल पर दोनों ओर यातायात चल सकता है और यह पानी की सबसे ऊंची सतह से भी पूरे पांच मीटर ऊपर है। राष्ट्रीय राजमार्ग के मानदंडों को पूरा करने वाला यह पुल 80 वर्ष तक काम करता रहेगा। एक महीने से भी कम समय में निर्मित यह पुल इस मई से शुरू होने वाली केदारनाथ यात्रा के लिए तैयार है। इससे क्षेत्र में वाणिज्यिक गतिविधियों को बल मिलेगा और आपातकालीन परिस्थितियों में अधिक तेज तथा भरोसेमंद समाधान मिलेगा।
सोनप्रयाग और गौरीकुंड के बीच मंदाकिनी नदी पर बनाए गए इस पुल को अमेरिका की पुल कंपनी ईक्रो ने उतराखंड डिजास्टर रिकवरी प्रोजेक्ट के अंर्तगत विश्व बैंक से वित्तीय मदद लेकर और भारतीय बुनियादी ढांचा एवं परियोजना सलाहकार कंपनी आईसीटी के सहयोग से केवल 30 दिन में पूरा किया है।
गौरतलब है कि केदारनाथ घाटी में 2013 में आई आपदा ने इस क्षेत्र को तबाह कर दिया था। सरकार द्वारा पुनर्वास के लिये लगातार काम किया गया, लेकिन केदारनाथ यात्रा को फिर आरंभ करने से संभवतः स्थानीय लोगों में एक बार फिर आजीविका सुरक्षित होने का भरोसा जगा है। गौरीकुंड से केदारनाथ की 16 किलोमीटर की आखिरी यात्रा आरंभ होती है, पहुंचने के लिए सोनप्रयोग पर सड़क पुल महत्वपूर्ण है। मंदाकिनी और सोनगंगा नदियों के संगम के निकट बना यह पुल 2013 में बह गया था और 10 मीटर मोटे गाद तथा कचरे ने नदी के बहाव की दिशा ही बदल दी थी। इसे तुरंत ठीक किया गया, लेकिन वह अस्थायी था। बीआरओ ने 27 मीटर चैड़ा बेली पुल बनाया, जिसमें एक ही दिशा में यातायात चल सकता था और अधिकतम 12 टन वजन ले जाया जा सकता था। जून 2015 में एक बार फिर बाढ़ आई और वह पुल भी बह गया। आपात परिस्थितियों में फौरी जरूरतें पूरी करने के लिए देश बेली पुल पर और जल्द निर्माण करने वाले सेना के कुछ उपकरणों पर ही निर्भर रहता आया है। लेकिन ये अस्थायी समाधान हैं। अधिक स्थायी समाधान कई वर्ष लेते हैं।
बेली पुल बहने से लगे झटके का उत्तराखंड आपदा पुनर्वास परियोजना (यूडीआरपी) ने बेहतर तरीके से समाधान कर दिया। दूसरा बेली पुल बनाने के साथ ही पेशेवर सलाहकारों तथा विश्व बैंक की वित्तीय मदद के साथ अधिक स्थायी समाधान के त्वरित विकल्प भी उन्होंने तलाशे। इसके कारण रिकार्ड समय में ही 60 मीटर का एक्रो पुल तैयार हो गया। यह पुल वास्तव में द्वितीय विश्व युद्ध के समय बनाए गए पुराने बेली पुल का ही नया रूप है। इसे बेली पुल के मजबूत और दीर्घकालिक सिद्धांत पर ही तैयार किया गया है। इसमें पुल के हिस्सों का मानकीकरण कर दिया गया है, जिन्हें एक स्थान पर जोड़ दिया जाता है। पिन ज्वाइंट के साथ बांधने से इसे जल्दी ही जोड़ दिया जाता है। इस पुल को हल्की बल्लियों के साथ बनाया गया है और रोलरों पर सावधानीपूर्वक इसका संतुलन बनाया गया है ताकि बेली पुल की ही तरह यह बोझ सह सके। किंतु क्षमता और प्रदर्शन में यह पुल बहुत बेहतर है।
एक्रो के हिस्सों को उत्कृष्ट इस्पात से बनाया गया है। उन्हें दो लेन और तीन लेन वाले पुलों के बारे में राष्ट्रीय राजमार्ग के मानकों को पूरा करने के लिए यातायात के अधिक बोझ को सहने के लिहाज से बेहतर बनाया गया है। निर्माण के लिए आम तौर पर उपलब्ध मशीनें श्रमशक्ति और समय घटा देती हैं। डिप गैल्वनाइज्ड फिनिश से ढांचा लंबे समय तक चलता है, जो स्थायी पुल के लिए आवश्यक होता है। दुनिया भर में विभिन्न विशेषज्ञ नई पीढ़ी के आपातकालीन पुलों के लिए ऐसे पुल की सिफारिश लंबे अरसे से करते आए हैं। सुदूर और बेहद दुर्गम क्षेत्र में तकनीकी रूप से अधिक चुनौतीपूर्ण स्थान पर इसे बनाकर इसकी व्यावहारिकता साबित की गई है।
इंटरनेशनल रोड फेडरेशन के चेयरमैन और बुनियादी ढांचा सलाहकार कंपनी आईसीटी के चेयरमैन श्री के के कपिला ने कहा, “उस जगह पर बड़ी चुनौतियां थीं। हाल ही में आई बाढ़ के कारण पुल को कम से कम 7 मीटर ऊंचा करना था यानी उसका फैलाव कम से कम 60 मीटर होना था। यहां बार-बार बाढ़ आने के कारण सुरक्षा पर अधिक ध्यान देना पड़ा। पुल को भूस्खलन और संगम से दूर रखना था, जिसके लिए कठोर पहाडि़यों को तराशकर रास्ता बनाना पड़ा। निर्माण के लिए केवल 22 मीटर चैड़ी जगह थी, जिसके लिए खास तरीके से काम करना पड़ा। ऋषिकेश से 250 किलोमीटर दूर सोनप्रयाग में पुल लाना कोई आसान काम नहीं था। इन सभी चुनौतियों के साथ इस वर्ष की यात्रा की समयसीमा का भी ध्यान रखना था।”
आज जो एक्रो पुल खड़ा है, उसे यूडीआरपी द्वारा आशय पत्र पर दस्तखत किए जाने के दो महीने के भीतर अमेरिका के न्यू जर्सी से लाया गया। पुल के हिस्सों को कंटेनर जहाज से बंबई लाया गया और उसके बाद ट्रेन से तुलगकाबाद के इनलैंड कंटेनर डिपो लाया गया, जहां से सड़क के रास्ते कंटेनर लारियों में उसे ऋषिकेश ले जाया गया। अंत में सोनप्रयाग तक उसे छोटे ट्रकों में ले जाना पड़ा। कुल मिलाकर यह ढुलाई की हैरत में डालने वाली अनूठी कवायद थी, जिसे इसके लिए बनाए गए उपकरणों एवं ढुलाई की टीम, पीडब्ल्यूडी तथा सलाहकारों के बीच तालमेल के कारण एकदम सटीक तरीके से पूरा किया गया। 15 अक्टूबर तक पहुंच चुके पुल को जोड़ने का काम फरवरी 2016 के आरंभ में ही शुरू हो पाया क्योंकि जगह कम होने के कारण अस्थायी पाये लगाने का लंबा-चैड़ा काम किया जाना था।
पुल 30 दिन में तैयार कर दिया गया। कम स्थान, अनिश्चित मौसम और दुर्गम क्षेत्र होने के कारण भी अधिक समय लगा। सामान्य स्थान होता तो यह काम दो सप्ताह में ही पूरा हो जाता। अब हमारे पास सड़क वाला, दोतरफा यातायात झेलने में सक्षम पुल है, जिस पर 100 टन तक वजन जा सकता है और दोनों तरफ पैदल चलने का मार्ग भी है।
पुल की लागत एक लेन वाले बेली पुल के मुकाबले कम है क्योंकि इसमें दोतरफा यातायात चलता है और दोगुना अधिकतम वजन जा सकता है यानी द्वितीय विश्व युद्ध वाले पुराने पुल के मुकाबले चार गुना अधिक फायदा है। पुल की जीवन अवधि दोगुनी होना भी एक फायदा है। पारंपरिक पुलों के मुकाबले इसे जिस तेजी के साथ तैयार किया गया, उससे लागत की भरपाई हो जाती है। इससे होने वाले वाणिज्यिक फायदे केदारनाथ तक के पुल की पूरी लागत साल भर से भी कम समय में वसूल देंगे। देश के अन्य अधिक महत्वपूर्ण मार्गों पर तो इस पुल की लागत वहां के वाणिज्यिक एवं आर्थिक फायदों को देखते हुए छह महीने से भी कम समय में वसूल हो जाती।
सिविल कामकाज का समय कम करके और उसी समय में पुल बांधने का काम करके निर्माण की गति को और बढ़ाया जा सकता है। उससे बाद ठेका मिलने के बाद 3-4 महीनों में ही ये पुल तैयार हो सकते हैं। स्थानीय स्तर पर ही थोक में बनाए जाने पर लागत और भी कम की जा सकती है और भविष्य में ऐसा ही होना चाहिए। ऐसे पुलों की संभावना तथा मांग को समझने से हमारे बुनियादी ढांचे को तेज रफ्तार से बनाने में मदद मिलेगी।
श्री कपिला ने कहा, “नाजुक हालात में बुनियादी ढांचा निर्माण को तेज करने में एक्रो जैसे पुलों की मदद लेने का और यह दिखाने का कि केदारनाथ जैसा एक्रो पुल बेहद चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में कितना कागर है, यह एकदम सही वक्त है। विश्व बैंक तथा राज्य प्रशासन की भरपूर सहायता और परियोजना सलाहकार आईसीटी की सामयिक तथा नई सलाह की मदद से लिया गया यूआरडीपी दल का यह साहसिक फैसला सराहनीय है।”